<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813</id><updated>2012-01-06T04:12:33.839-08:00</updated><category term='सामायिकी'/><category term='यादें'/><category term='कालेज'/><category term='यात्रा वृतांत'/><category term='स्कूल'/><category term='हिन्दी'/><category term='चेतन भगत'/><category term='बचपन'/><category term='हास्य-व्यंग्य'/><category term='सुबु'/><category term='पुस्तक समीक्षा'/><category term='मजनू पुराण'/><category term='कन्या पुराण'/><category term='अनु‍गुंज'/><category term='संस्मरण'/><category term='समाचार'/><category term='चिंतन'/><title type='text'>खाली-पीली</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>69</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-3202119519683597745</id><published>2006-08-23T21:25:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T21:31:42.647-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कन्या पुराण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्य-व्यंग्य'/><title type='text'>हम , वो और बरसात</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;एक शाम मैं अपने रूम पर अकेला ही था। बादल घिरे हुये थे। मौसम ठंडा हो गया था। अंधेरा छा रहा था। देखते देखते ही बुंदाबांदी शुरू हो गयी। बालकनी पर खडा बारिश की भटककर आती हुये बुंदो का आनंद लेते हुये रीम झीम बारिश के निनाद का आनंद ले रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर बाद ऐसे ही टीवी चालू किया हिमेश बाबू नाक दबा कर गा रहा था&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“एक बार आजा आजा.. झलक दिखला जा……"&lt;/blockquote&gt;गुस्से मे आकर टी वी बंद कर दिया और आकाशवाणी की शरण ली…&lt;br /&gt;विविध-भारती के क्या कहने….. सुभा मुदगल गा रही थी…..&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“अब के सावन ऐसे बरसे……”&lt;/blockquote&gt;पूरा मुड़ हो गया बारिश मे भिगते हुये झुमने का… अपना तो ऐसा है कि मन हुआ नही कि शुरू भी जाते है …सामने के मकान वाले अंकल-आंटी मुझे घुर घुर कर देख रहे थे… क्या लड़का है.. अभी तक बचपना नही गया….बारिश मे भीग रहा है…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने मे एक मधुर आवाज़ आयी&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“कोई घर पर है ?”&lt;/blockquote&gt;हमने रेडियो को घुरा… शुभा मुदगल की मस्ती भरी आवाज़ के बीच मे ये मधुर आवाज़ कंहा से आयी… हमने सोचा की अपने कान बज रहे होंगे….इतने मे दरवाज़े की घंटी के साथ आवाज़ भी आयी&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“कोई घर पर है ?”&lt;/blockquote&gt;हमने दरवाजे पर जाकर देखा और देखते रह गये। अहाहा ! बारिश मे भीगा हुआ एक खूबसूरत शिल्प कंधे पर एक बैग लटकाये हुये खड़ा था।&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“घर मे कोई है क्या ?”&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;आवाज़ से हमारी समाधी भंग हुयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने कहा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“आईये आईये, आप भींग क्यो रही है ? अंदर आईये ?”&lt;/blockquote&gt;मोहतरमा के बैठने के लिये हमने कुर्सी सरकाई। पूछा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“आप काफी भींग गयी है, टावेल ला दूं“।&lt;/blockquote&gt;गर्दन मे हल्की सी जुंबीश हुयी और हमने आदेश का पालन किया। टावेल प्रदान किया। वह अपने केशराशी को सुखा रही थी और हम अपनी आंखों को ठंडक प्रदान कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम क्या कहे कुछ सुझ नही रहा था और उसकी बड-बड चालू थी&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“आज अचानक बारिश के कारण मुसीबत हो गयी. वो तो गनीमत थी की आपका दरवाजा खुला था…..”&lt;/blockquote&gt;ऐसे मौसम मे हम उसे चाय के एक प्याले के लिये पूछ लेते तो क्या बात होती लेकिन हाय री किस्मत… रूम मे चाय की पत्ती हमेशा की तरह नदारद थी…शक्कर का डिब्बा हमने खोलकर नही देखा…।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे अपने बालो को सुखाते देखकर हमारी इच्छा हो रही थी कि ऐसी ही बारीश होती रहे और हम गाते रहें “इक लडकी भीगी भागी सी…..“। इतने मे बारीश तेज हो गयी, वो एकदम से घबरा गयी। उसके बालों से एक पाने की बूंद गालो पर बह कर मोती के समान लग रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं क्या करता हूं, कहां काम करता हूं यह सब पूछते हुये उसने अपना बैग खोलना शुरू किया। उसने बैग से चाकलेट और बिस्कुट निकाले और मेरे हाथ मे रखे। मुझे लगा कि इस कन्या को भूख लगी होगी, काश मेरे रूम पर गैस होती… कम से कम इसे एक आमलेट तो खीला देता…।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये क्या इसका बैग तो भानुमति का पिटारा है.. साबुन निकाल रही है…. मेरे रूम पर स्नान भी करेगी क्या ?&lt;br /&gt;ब्रश भी निकाल लिया.. अरे बिस्कुट , पाउडर, कंघी भी….. अरे ये तो सेल्स गर्ल है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सुंदर कन्या कुछ बेचे और हम ना खरीदे ऐसे सन्यासी तो हम है नही। वो एक एक सामान निकाल रही थी, हम हां हां कहते हुये रखते जा रहे थे। अंत मे उसके पास उपलब्ध हर चिज का एक एक सामान हमने खरिद लिया। लग रहा था कि उसके पास और भी चिजें होती। वह जब एक एक सामान हमारे हाथों मे थमा रही थी, उसके स्पर्श से हमारा सारा शरीर रोमांच से कांप जा रहा था!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे ,ये क्या बारिश रूक गयी, उन्होने बिल नुमा बिजली हमारे सामने चमकायी। पूरे ५०० रूपये की ख़रीददारी हम कर चुके थे। हमने अपनी जेब टटोली, जेब मे कुल जमा ३०० रूपये ही निकले। पूरी इज्जत का भाजीपाला हो गया। लेकिन कन्या समझदार निकली, कहा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“कोई बात नही कल आकर बाकी पैसे ले जाउंगी…“।&lt;/blockquote&gt;हम भी खुश , चलो कल भी आयेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर हल्की बुंदा बांदी जारी थी। अबतक बारिश से घबरानेवाला भीगा हुआ शिल्प फिर से बारिश मे भीगने जा रहा था। काश मेरे पास छाता होता, कम से कम उसे बस स्टैंड तक छोड आता। एक छाते के निचे….”प्यार हुआ ईकरार हुआ ….”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज फिर बारिश हो रही है, वही रूम है, वही बालकनी है और वही मैं हूं… मुझे फिर इंतजार है उसका… मुझे चिढ हो रही है बारिश से…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;जिंदगी भर नही भुलेगी वो बरसात की रात।&lt;br /&gt;एक अंजान हसीना से मुलाकात की रात।&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;ना जी ना मुझे उससे फिर से मिलना नही है, उससे उसके बकाया पैसे भी नही देने है….मुझे तो उससे अपने ३०० रूपये वापिस लेने है। चूना लगा गयी है। उसके हुआ साबुन से झाग नही आता है, बिस्कुट तो पडोस का टामी भी नही खाता, पाउडर लगाने पर लोग पुछते है, आज नहाकर नही आया क्या ? अब&amp;nbsp;बाकी&amp;nbsp;चीजों&amp;nbsp;की क्या कहुं…..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिंदगी भर नही भुलेगी वो बरसात की रात।&lt;br /&gt;**********************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;13 टिप्पणीयां “हम , वो और बरसात” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आपकी किस्सागोई अच्छी लगी। आपके नक्षत्र बताते हैं कि आपको कन्याओं से बचकर रहना चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ई-छाया द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाह जी वाह, आपकी तो बल्ले-बल्ले हो गई जी!! दिन दहाड़े, बढ़िया बरसात में आपका तो “काम” हो गया!! &amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या बात है? आपके अँदा बदल गये। धाँसू लिखा है। अच्छी लगी यह आपबीती।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अतुल द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बढ़ियां अंदाज है किस्सागोही का. मजा आ गया आप का बरसाती विवरण पढ़कर.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;समीर लाल द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये लुटने का भी सुख सबको कहाँ मिलता है?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एकाध ऐसे झटकों से घबडाना नहीं चाहिये । प्रयास जारी रखें । सफलता अवश्य मिलेगी ।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;pratyaksha द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्य सेल्स गर्ल को अब तक आपकी दरियादिली की खबर लग गई होगी,शीघ्र ही आप के दर पर कोई और आने वाली होगी। उसके लिए हमारी शुभकामनाएं।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ratna द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाह वाह क्या मज़ेदार किस्सा है। मज़ा आया पढ़ के। वैसे कौन सी कम्पनी थी जो घटिया साबुन से ले कर घटिया चॉकलेट तक सब बनाती है &amp;nbsp;…बता दीजिये तो बच के रहें।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Nidhi द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजेदार वाकया सुनाया आपने भी !&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मनीष द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी पुरी फ़िल्मी है.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;विजय वडनेरे द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजेदार किस्से का मजेदार विवरणॅहै.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;rachana द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***अब सुंदर कन्या कुछ बेचे और हम ना खरीदे ऐसे सन्यासी तो हम है नही।&lt;br /&gt;मस्त लिखा है&lt;br /&gt;अगली बार फिर से बारिश में भीगने का इरादा नही लगता, एक छोटी सी बात को क्या मजेदार शब्दों में पिरोया मजा आ गया।&lt;br /&gt;यार एक बात बताओ, तुम्हारा प्रोवाइडर कौन है, १०० में से ९० बार आने पर पेज नॉट फाउंड का पेज नजर आता है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Tarun द्वारा दिनांक अगस्त 25th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ashish, hamesha ki tarah hansaya hai tumne…&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मानोशी द्वारा दिनांक अगस्त 25th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-3202119519683597745?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/3202119519683597745/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/08/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/3202119519683597745'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/3202119519683597745'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/08/blog-post.html' title='हम , वो और बरसात'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' 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तत्पश्चात वे प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमचंद मेरे प्रिय लेखक रहे हैं, उनके लगब्भग सभी उपन्यास और ढेरो कहानिया पढी है।प्रेमचंद को पढना तो बचपन से ही शुरू हो गया था। कक्षा दूसरी मे बालभारती मे उनकी कहानी पढी थी ‘&lt;b&gt;ईदगाह&lt;/b&gt;′, और ये सफर शुरू हुआ था। &lt;b&gt;हामिद का चिमटा&lt;/b&gt; आज भी भुल नही पायां हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;गूल्ली-डंडा, बडे भाई साहब&lt;/b&gt; जैसी कहानियां तो ऐसी लगती है जैसे मेरे ही बचपन से ली गयी हैं। &lt;b&gt;‘ठाकुर का कुंवा’, पूस की रात , सुभागी, बडे घर की बेटी &lt;/b&gt;जैसी कहानिया अपने आस पास ही घटते देखी है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पंच परमेश्वर &lt;/b&gt;का रूप मैने अपने गांव की चौपाल पर होने वाली पंचायत मे देखा है। वहीं मैकु जैसे शराबी भी देखे है जिनके बच्चे भुखे सोते रहे लेकिन शराब चाहिये ही। उनकी कहानी का हर पात्र मुझे अपने आस पास ही दिखायी दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिवन का ऐसा कौनसा अंग है जो उन्होने नही छुआ। ‘&lt;b&gt;समस्या&lt;/b&gt;’ के चपरासी गरीब का परिवर्तन हो, या कोरी अपवाह से एक ‘&lt;b&gt;बैंक का दिवाला&lt;/b&gt;’ निकलना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके द्वारा लिखे गये हास्य रस के तो क्या कहने “&lt;b&gt;&amp;nbsp;पंडित&amp;nbsp;मोटेराम शास्त्री का डायरी”, “शादी की वजह″,”कुछ दूख ना हो तो बकरी खरीद ला” &lt;/b&gt;पढीये और हंसते हंसते लोट पोट हो जायीये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;=========================================================&lt;br /&gt;&lt;b&gt;4 टिप्पणीयां “हिन्दी कहानी एवं उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द को जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजली” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;प्रेमचंद जी को श्रद्धांजलि।&lt;br /&gt;सोचता हूं १९३६ में ५६ वर्ष की अल्पायु में न गये होते और भारत की आजादी देखी होती उन्होने तो आजादी के बाद के भारत का वे कैसा वर्णन करते।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;eshadow द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये बढ़िया किया कि आज के दिन मुंशी जी को याद कर लिया।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोदान पढी थी जब दसवीं में थे. कई कहानिया स्कूल में पठ्य पुस्तकों में पढी . बूढी काकी , पँच पर्मेश्वर ,हामिद आज भी बहुत करीब हैं&lt;br /&gt;&lt;b&gt;pratyaksha द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमचंद्र के जन्म-दिन पर उनके बारे में लिखना उनके प्रति आदर है। साधुवाद। जब तक समाज में विसंगतियाँ रहेंगी तबतक प्रेमचंद्र समसामयिक रहेंगे। उनका यथार्थमय आदर्श हमेशा अधुनातन रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रेमलता पांडे द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-5606947157641973575?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/5606947157641973575/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2011/12/blog-post_07.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/5606947157641973575'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/5606947157641973575'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2011/12/blog-post_07.html' title='हिन्दी कहानी एवं उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द को जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजली'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-7627986718273457935</id><published>2006-07-30T21:09:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T21:15:09.516-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मजनू पुराण'/><title type='text'>एक प्रेम (?) कथा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;a href="http://abhivyakta.wordpress.com/"&gt;निधीजी  के चिठ्ठे पर एक मजनू के&lt;/a&gt; बारे मे पढा, मेरे आस पास तो मजनूओ की भरमार रही है। सोचा चलो एक के बाद एक मजनूओ के किस्से लिखना शुरू कर दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये किस्सा है उन दिनो का जब मै नया नया दिल्ली पहुंचा था। हम लोग कुल आठ लोग एक ही फ्लैट मे काल्काजी मे रहते थे। सभी के सभी नागपूर और उसके आसपास के क्षेत्र से थे। कुछ नौकरी करते थे, कुछ सघर्ष कर रहे थे। फ्लैट का खर्च  नौकरीशुदा लोगो की जिम्मेदारी थी। जो संघर्ष कर रहे थे, उनका एक काम था, दिन मे अपना बायोडाटा बांटना, साक्षात्कार देना और रात मे पढना। मौज मस्ती इन लोगो के लिये वर्जित थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजेश, प्रवीण और कमलेश दोनो नौकरी कर रहे थे, मैने मुंबई की नौकरी छोडकर गुडगांव मे एक कपंनी मे काम शुरू किया था। हम चारो का सप्ताहांत मे मौज मस्ती का कार्यक्रम होता था। दिन भर आवारागर्दी और शाम को किसी अच्छी जगह खाना। मै शराब पीता नही लेकिन मेरे अधिकतर दोस्त अखंड बेवडे रहे है। दारू की पूरी बोतल अंदर कर जाते हैं और हिलते भी नही हैं। शाम को मेरा काम होता था, बैरो को समझा बुझा कर शांत करना। अब क्यों ? अरे दारू पीने के बाद कमलेश और राजेश दोनो मे दिल्ली की सल्तनत के &lt;strong&gt;शहनशाहो की आत्मा &lt;/strong&gt;जो सवार हो जाती थी। उसके बाद टूटी बोतल , गिलास, प्लेटो की किमत के साथ खाने का बील का भुगतान करना। एक एक को लाते मारते हुये कार मे लादना, पुलीसवालो से बचते, हाथ पैर जोडते हुये अपने घर पहुंचना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ऐसी ही शनीवार की शाम मेरी मुलाकात हुयी सुरेश से(नाम् बदला हुआ है)। ६ बोतल बियर पिने के बाद उन्होने कम से कम &lt;strong&gt;‘२० रन’ &lt;/strong&gt;बनाये थे,मतलब कि खाने की मेज से टायलेट उल्टी करने के लिये। पता चला कि वो भी भंडारा(नागपूर से १०० की मी दूर) से है। उसकी मम्मी दिल्ली मे एक अस्पताल मे काम करती है। वो कभी कभी दिल्ली आता है, महिने दो महिने रह्ता है और वापिस चला जाता है। रात मे सुरेश मे घर जाने की हिम्मत तो थी नही, वो भी हम लोगो के साथ रूक गया। मै सुबह अपनी दौड लगाने के बाद वापिस आया तो वह उठ चुका था। बाकि सभी तो घोडे बेचकर सो रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुरेश ने मुझे कहा कि “&lt;strong&gt;ये सभी तो कम से कम दो तिन घंटे बाद सोकर उठेंगे , तु मेरे साथ घर चल। मम्मी से मिल लेना, साथ मे चाय नास्ता भी हो जायेगा&lt;/strong&gt;“। घर के खाने के नाम पर तो मै काल्का जी से एक शादीशुदा दोस्त के घर रोहीणी तक लगभग ३० किमी दूर भी चला जाता था। मै चल दिया उसके साथ। उसके साथ उसके घर के पास पहुंचे, सामने की फ्लैट की बालकनी पर एक खूबसूरत कन्या खडी थी। मेरी नजरे उसकी तरफ गयीं कि उसने एक उड्ता हुआ चुंबन उछाल दिया। मै चकराया ये क्या ? क्या आज मै इतना जम रहा हूं ? सुरेश ने गलतफहमी जलदी दूर कर दी &lt;strong&gt;“उछल मत , वो तेरे लिये नही मेरे लिये था!”&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;खैर उसके घर गया , &lt;strong&gt;‘काकू’&lt;/strong&gt;(सुरेश की मम्मी) से मिला। नाश्ता ही नही, दोपहर का खाना भी खाकर वापिस आया। फ्लैट मे आने पर&amp;nbsp;प्रवीण&amp;nbsp;ने पूछा कि मै कहां गया था। मैने बताया कि सुरेश के साथ उसके घर गया था। तब&amp;nbsp;प्रवीण&amp;nbsp;ने मुझे सावधान किया कि उसके घर जाने मे कोई परेशानी की बात नही है, लेकिन उसके साथ घुमना फिरना नही। बात मे मुझे पता चला कि सुरेश का बस एक ही शौक था। लडकीयो को अपने जाल मे फांसना और अपना काम निकालना, मतलब कि अय्याशी करना। काम निकलने के बाद , वह नये शिकार की तलाश मे लग जाता था। अब तक पता नही कि कितनी लडकिया उसके जाल मे फंस चूकी थी, ये किसी को नही मालुम था। पता नही उसमे ऐसा क्या था, लडकिया खिंची चली आती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम लोग को उसका साथ पसंद नही था लेकिन काकू का स्वभाव काफी अच्छा था। सुरेश जब दिल्ली मे नही होता था तब काकू लिये हम लोग ही सब कुछ थे। बस सांप छछूंदर वाली हालत, ना उगलते बने ना निगलते।  उपर से अपना नायक हर हफ्ते नयी लडकी और अय्याशी के किस्से लेकर आ जाता था। उसके किस्से सूनकर कोफ्त होती थी। प्रवीण तो उसे बूरी तरह झाड देता था लेकिन वो बाज नही आता था। उसमे अय्याशी की बूरी आदत होने के बावजूद वो हम लोगो की इज्जत करता था। अपने करीयर के हर निर्णय मे हमसे सलाह लेता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२००२ मध्य मे वह भडांरा अपने घर गया। कुछ महिनो बाद मै उससे नागपूर मे एक शादी मे मिला। उसने मुझे एक लडकी की तस्वीर दिखाई। मैने उसे चेतावनी दी “&lt;strong&gt;अबे अब तु शूरू हो गया, तो तेरा सर और मेरा जूता। तेरे अय्याशी के किस्सो मे मेरी कोई दिलचस्पी नही।&lt;/strong&gt;” सुरेश ने कहा “&lt;strong&gt;नही यार , ये वैसी लडकी नही है। इस लडकी को मैने छुवा तक नही है।&lt;/strong&gt;” मुझे विश्वास तो नही हुआ, वह जारी रहा “&lt;strong&gt;मै इससे शादी करने वाला हूं।&lt;/strong&gt;” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने उसे विश्वास दिलाया कि यदि वह इस लडकी के लिये यदि गंभीर है तो काकू को तैयार करना मेरी जिम्मेदारी होगी। वह खुश हो गया, उसने मुझसे कहा कि संभव हुआ तो वह मुझे उस लडकी से मिलायेगा। बाद मे मुझे ज्ञात हुआ कि दोनो के सामजिक स्तर मे काफी अंतर है। लडकी उंची जाति से है और सुरेश उससे&amp;nbsp;नीची&amp;nbsp;जाति से है। मैने उन लोगो के भविष्य मे आनेवाली समस्याओ का अनुमान लगा लिया था। मुझे मालूम था कि समाज अभी इतने खुले दिल का नही हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद मे मैने इस विषय पर राजेश और प्रवीण से चर्चा की, किसी ने गंभीरता से नही लिया। सभी को यही लगा कि कुत्ते की दुम सीधी नही हो सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस&amp;nbsp;बीच&amp;nbsp;मै चेन्नई आ गया था, राजेश लंदन मे था, प्रवीण डलास पहुंच गया था। सभी के सभी अपनी अपनी राह चल दिये थे। संपर्क का माध्यम फोन और ईमेल थे। कुछ दिनो के बाद सुरेश ने राजेश से कुछ आर्थिक सहायता की मांग की। राजेश ने कारण पूछा, जवाब था “&lt;strong&gt;शादी करनी है&lt;/strong&gt;“। हम लोगो (मै, राजेश और प्रवीण) की&amp;nbsp;आपातकालीन&amp;nbsp;चैट पर चर्चा हुयी और  निर्णय हुआ कि सुरेश को आर्थिक सहायता नही दी जाये। कारण ये था कि उसका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था और उसके परिवार मे लडकी स्वीकार्य थी। कोई परेशानी थी तो लडकी के घर से। हमने उसे सलाह दी कि अपने घर वालो से बात करे, जरूरत पढने पर हम बात कर सकते है। उसे यह भी कहा गया कि शादी से पहले कम से कम वह कोई नौकरी या काम् करना शुरू करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घटना को कुछ&amp;nbsp;महीने&amp;nbsp;गुजर गये बात आयी गयी हो गयी। उसका हमसे संपर्क टूट गया। हम लोगो ने भी इसे गंभीरता से नही लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक एक दिन भंडारा से एक दोस्त का मेल आया कि सुरेश ने आत्महत्या कर ली है। हम लोग सन्न रह गये। एकबारगी विश्वास नही हुआ कि सुरेश ऐसा कर सकता है। खोजबीन से पता चला कि इस बार सुरेश को उस लडकी ने गच्चा दिया था। उसके परिवारवालो को सुरेश स्वीकार नही था। उस लडकी ने परिवारवालो के दबाव मे या किसी अन्य कारणवश शादी से इंकार कर दिया। ये झटका सुरेश सहन नही कर पाया और आतमघाति कदम उठा बैठा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे आज भी विश्वास नही होता कि सुरेश जिसके लिये लडकी की किमत एक खिलौने से ज्यादा नही होती थी, एक लडकी के धोखा देने पर आत्महत्या कर बैठा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे सुरेश के लिये कोई दुःख नही है, वो तो कायर निकला। दुख है ‘&lt;b&gt;काकू&lt;/b&gt;’  के लिये। अब सुरेश तो नही है लेकिन हम लोगो मे से&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;कोई &amp;nbsp;उनके आसपास नही है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-7627986718273457935?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/7627986718273457935/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/07/blog-post_30.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/7627986718273457935'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/7627986718273457935'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/07/blog-post_30.html' title='एक प्रेम (?) कथा'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-1725225974873646828</id><published>2006-07-23T21:03:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T21:08:05.497-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सामायिकी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><title type='text'>चलो किसी बच्चे को हंसाया जाये</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये&lt;br /&gt;घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये,&lt;br /&gt;घर से मस्जिद है बहुत दूर ,चलो यू टर्न ले&lt;br /&gt;किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये ।&lt;/blockquote&gt;निदा फाजली की ये गजल मै कल फिर एक बार “&lt;b&gt;वाह वाह&lt;/b&gt;″ मे सुनी। जब उन्होने ये शेर पाकिस्तान मे एक मुशायरे मे पढे थे,उसके बाद कुछ श्रोताओ ने उनसे पूछा कि&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“मस्जिद&amp;nbsp;किसी&amp;nbsp;बच्चे से बडी कैसे हो सकती है।&lt;/blockquote&gt;उनका जवाब था&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;"मस्जिद तो इंसान के हाथ बनाते है, लेकिन बच्चो को तो खुदा के हाथ बनाते है !"&lt;/blockquote&gt;ये पंक्तिया फिर याद आ गयी जब गढ्ढे मे गिरे बच्चे प्रिंस को बचाने के लिये मंदिर, मस्जिद और गुरुद्बारे मे प्रार्थना की गयी और सेना ने उसे बचा भी लिया !&lt;br /&gt;**********************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;5 टिप्पणीयां “चलो किसी बच्चे को हंसाया जाये” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;मुंबई धमाकों की गूंज का जवाब देश के नागरिकों ने अपने जयघोष से आतंकियों और प्रतिक्रियावादी ताक़तों को दिया है. ये क़ौमी एकता का जयघोष है जो प्रिंस के पुनर्जीवन के साथ आपके और मेरे सामने मीडिया के ज़रिए सुनाई दिया.&lt;br /&gt;निदा साहब ने उक्त दो लाइनों में सारा निचोड़ दे दिया.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नीरज दीवान द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे खयाल से शब्द कुछ ऐसे हैंः&lt;br /&gt;घर से मसजिद है बड़ी दूर चलो यूँ कर लें&lt;br /&gt;रोते हुए किसी बच्चे को हँसाया जाये&lt;br /&gt;&lt;b&gt;anunad द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“यू टर्न ले!” पे हंसते हंसते हाल खराब.&lt;br /&gt;आशीष तुम्हारे खोपडी भी बडी फ़र्टाईल है! &lt;br /&gt;क्या इसे मन-बोल मे डाला जा सकता है?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;eswami द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशीष जी और अनुनाद जी, सही शब्द यह हैं :&lt;br /&gt;अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये&lt;br /&gt;घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये,&lt;br /&gt;….&lt;br /&gt;घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें&lt;br /&gt;किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये ।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Nidhi द्वारा दिनांक जुलाई 26th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशीष जी…. ‘ यू टर्न लें ‘ वाक़ई आपकी रचनात्मकता की हद हो गई! फ़ाज़ली साहब को सजेस्ट किया किसी ने?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अन्तर्मन द्वारा दिनांक जुलाई 27th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-1725225974873646828?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/1725225974873646828/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/07/blog-post_23.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/1725225974873646828'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/1725225974873646828'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/07/blog-post_23.html' title='चलो किसी बच्चे को हंसाया जाये'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-347156080488962973</id><published>2006-07-18T20:57:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T21:34:07.987-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बचपन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>बचपन की शरारतें भाग २</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;मेरा गांव जहां मेरा सारा बचपन और किशोरावस्था बीता एक आम भारतीय गांव था। गांव के पश्चिम मे पाठशाला थी ,उसके बाद एक बड़ा सा मैदान। इस मैदान को ‘&lt;b&gt;झंडा टेकरा&lt;/b&gt;’ कहा जाता था। पाठशाला के पिछे एक पहाड़ी, पहाड़ी और ‘झंडा टेकरा’ को विभाजित करती हुयी एक नहर। गांव के उत्तर मे था एक बडा बरगद का पेड़ और उसके पिछे एक बड़ा सा तालाब। बरगद के पेड़ और गांव को अलग करती एक पक्की सडक।&lt;br /&gt;ये बरगद का पेड़ गांव का हृदय-स्थल था, ये बस स्थानक तो था ही साथ मे चौपाल का भी कार्य करता था। गांव के सारे के सारे बेकार दिन और बाकी सभी शाम को यहीं पर पाये जाते थे। सुबह जब चरवाहा सारे गांव से गायो को एकत्र कर चराने के लिये ले जाता था, तब उन्हे कुछ देर के लिये इसी बरगद के निचे खडा करता था।बरसात मे जब खेतो के काम खत्म हो जाते थे ग्रामीण यहां आल्हा गाते थे। घनघोर बरसात मे आल्हा की वो तान&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;बढ़े लढैया गड मोहबे के जिनके बल को वार न पार&lt;/blockquote&gt;इस बरगद के पेड के निचे कुछ चाय और साइकिल मरम्मत की दुकानें भी थी। साइकिल की ये दुकानें साइकिल किराये से भी देती थीं। यहां पर हमे बच्चों के लिये छोटी साइकिलें किराये से मिल जाती थी। किराया होता था १० पैसे घन्टा !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छूट्टीयो मे हम सुबह सुबह साइकिल दुकान पहुंच जाते और साइकिले ले कर चल देते ‘&lt;b&gt;झंडा टेकरा&lt;/b&gt;’ । साइकिलों की दौड़ होती थी और ढेर सारे करतब किये जाते थे। इन करतबो मे शामिल थे एक साइकिल पर ज्यादा से ज्यादा सवारी ले जाना। क्या आप विश्वास करेंगे कि हम लोगो का रिकार्ड है, एक साइकिल पर ७ लोगो को सवार कर सारे गांव का चक्कर( लगभग २ किमी) लगाने का ! साइकिल चला रहा था हमारा गामा पहलवान ‘अमरचन्द’ ! २ पिछे कैरियर पर थे, २ सीट पर, २ डंडे पर और १ हैंडल पर सामने देखते हुये ! सारे गांव मे बच्चे ताली बजा रहे थे और बुजुर्ग डांट रहे थे। अमरचन्द अच्छे खासे डील डौल वाला था, अपनी उम्र से ५ साल बड़ा लगता था। कबड्डी मे वह पूरी की पूरी विपक्षी टीम को अकेले खिंच लाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साईकिलो के करतबो मे हैण्डल छोड़कर चलाना, उल्टे बैठकर साइकिल चलाना, कैरियर पर बैठकर चलाना, अगला चक्का हवा मे रखकर पिछले&amp;nbsp;पहिए&amp;nbsp;पर साइकिल चलाना और ना जाने क्या क्या करतब किये जाते थे। अब ऐसे करतब दिखांये, और गिरे पड़े ना ! ऐसा तो हो नही सकता था। घुटना और कोहनी छिलना तो रोज की बात थी। मुसीबत ये थी कि घर मे बता नही सकते थे कि आज साईकिल से गिर पड़े ! सबसे पहले पूछा जाता कि कि आज कौनसा करतब हो रहा था ? डांट तो पढती ही थी, पापा कभी कभी रात का खाना बंद करा देते थे। रात का इसलिये कि दिन मे तो हम घर के खाने कि चिंता करते ही नही थे। कहीं भी किसी के भी घर खा लिया। आम, अमरूद, इमली,हरे चने, मटर जैसे मौसमी चिंजे अलग। हम कितना भी छुपांये लेकिन छोटे भाई , बहन मे से कोई ना कोई गद्दारी कर ही जाता था। उन्होने गद्दारी नही कि तो जख्मो का दर्द गद्दारी कर जाता था। दर्द से जितनी तकलिफ नही होती थी, तकलीफ़ होती थी जब पापा डांट के साथ ‘टिंचर आयोडीन’ लगाते थे ! दर्द से यदि कराह निकली कि गाल पर भी दर्द सहना पढ़ता था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम लोगो का दूसरा खेल होता था तालाब मे तैरना! दोपहर मे जब तालाब मे कोई नही होता था, तब हम पहुंच जाते थे तालाब। घंटो तैरते रहते थे। तालाब के एक किनारे एक आम का पेड था जो तालाब पर झुका हुआ था। हम पेड़ पर चढकर तालाब मे कुदा करते थे। हम लोगो को भैंस की पुंछ पकड़ कर तालाब को पार करना सबसे मजेदार खेल लगता था। यह सब हम गांव वालो और घरवालों की नजर बचा कर किया करते थे। ये सावधानी बरती जाती कि किसी को पता ना चले कि हम तालाब मे मस्ती करते है। जरूरी ये होता था कि तालाब से बाहर निकलने के बाद कपडे और सर के बाल सूखे हो। बस हम तालाब मे नंगधडंग कूद जाते थे। कोई तालाब के आस पास फटका कि बाहर निकलो, कपड़े उठाओ और भाग लो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार हम लोग तालाब मे मस्ती कर रहे थे किसी ने मेरे घर मे खबर कर दी। जब पापा तालाब पहुंचे, हम लोग भैंस की पूंछ पकडे हुये दूसरे किनारे जा रहे थे। तालाब से निकल कर भागना संभव नही था। कपडे भी उस किनारे पडे थे, जंहा पापा खडे थे। सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम। लेकिन पापा ने हम लोगो से कुछ नही कहा, बस किनारे रखे सारे के सारे कपडे उठाये और चल दिये। अब क्या करें ? सारे के सारे नंगधंडंग पानी मे ! सब एक दूसरी की तरफ देख रहे थे। ऐसे ही पानी मे खडे खडे एक घन्टा गुजर गया, तब गामा पहलवान ‘अमरचंद’ आता नजर आया। जब उसे सारी बात पता चली तो वह आधा घण्टे तो हंसते हंसते लोट पोट होता रहा। उसके बाद उसे अगले हफ्ते साइकिल के किराये के पैसे देने के वादे की रिश्वत दी गयी, साथ मे ये भी वादा किया गया कि अगली अमरूदो की चोरी मे से उसके हिस्से के अलावा एक हिस्सा और दिया जायेगा। वो मेरे अलावा सबके घर जाकर सबकी मम्मीयों से उल्टे सीधे बहाने बनाकर कपडे ले आया। मेरे घर मे पापा ने उसे दरवाजे से ही भगा दिया। लेकिन गामा पहलवान कम नही था, वह मेरे लिये अपने कपडे ले आया था। सबने कपडे पहने। मैने अमरचन्द के कपडे पहने। उसके कपडे मुझ पर ऐसे लग रहे थे जैसे कि हैंगर पर कपडे सुखते है !&lt;br /&gt;शाम को मेरी मिंत्र मंडली जब कपडे लेने मेरे घर पहुंचे, उन्हे पापा ने कपडो साथ ‘&lt;b&gt;प्रसाद&lt;/b&gt;’ दिया और लम्बा चौडा भाषण पिलाया। मेरे साथ क्या हुआ ये अब मै ही बताउंगा क्या ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;5 टिप्पणीयां “बचपन की शरारतें भाग २” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;मतलब चीरहरण सिर्फ गोपियों का ही नहीं हुआ था। पिता भी कृष्ण की भूमिका कर सकते हैं जिनके लिये बच्चे गोपियां होते हैं।अच्छा लगा विवरण। आगे बताओ क्या हुआ तुम्हारे साथ?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जुलाई 18th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाह वाह, मजा आ गया और हँसी भी आई।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;eshadow द्वारा दिनांक जुलाई 19th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बढिया लगा .बहुत अच्छा लिखा . पूरा दृश्य आँखों के सामने आ गया&lt;br /&gt;&lt;b&gt;pratyaksha द्वारा दिनांक जुलाई 19th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बढ़िया किस्से हैं आशीष । लगता है बचपन में आप बहुत पिटे हैं । लड़के खैर शायद सभी पिटते हैं । आपकी ख़ुराफ़ातें पढ़ के लगा कि बचपन का भरपूर आनंद उठाया है आपने ।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;निधि द्वारा दिनांक जुलाई 22nd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्त लिखा है…आगे भी लिखें इसी सीरीज़ में!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अन्तर्मन द्वारा दिनांक जुलाई 27th, 2006&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-347156080488962973?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/347156080488962973/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2011/12/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/347156080488962973'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/347156080488962973'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='बचपन की शरारतें भाग २'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-4548594238158514192</id><published>2006-07-17T20:38:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T20:46:17.119-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनु‍गुंज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्य-व्यंग्य'/><title type='text'>अनुगुंज २१ : कुछ चुटकुले</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;लालु और&amp;nbsp;सूअर&amp;nbsp;का बच्चा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;लालुजी अपने ड्रायवर के साथ एक बार कार से जा रहे थे। एक गांव से पहले उनकी कार के निचे एक&amp;nbsp;सूअर&amp;nbsp;का बच्चा कुचल कर मर गया। लालुजी दुखी हुये। ड्रायवर को कुछ पैसे दिये और कहा कि “गांव मे जाओ और&amp;nbsp;सूअर&amp;nbsp;के मालिक को मुआवजा दे आओ”&lt;br /&gt;ड्रायवर&amp;nbsp;पैसे लेकर गांव चला गया। एक घंटा बीत गया, दो घंटे बीत गये ड्रायवर वापिस नही आया। लालुजी बैचेनी से टहलते रहे। तिसरे घंटे के आखिर मे ड्रायवर एक बोरा सिर पर लादे आते दिखा। पास आने पर लालुजी ने पूछा “का रे ड्रायबर , अतना देर काहे लगा दिये ? अउर इस बोरा मे का लाये हो”&lt;br /&gt;ड्राववर “इस बोरा मै पैसा है मालिक”&lt;br /&gt;लालु ” क्यो गांव मे का हुवा, तुम्हे अतना पईसा किसने और काहे दे दिया ?”&lt;br /&gt;ड्रायवर “हमको कुछ नाही पता, हम तो गांव मे जाके इतना ही बोला कि हम लालु का ड्रायवर हूं और हमने उ&amp;nbsp;सूअर&amp;nbsp;का बच्चा मार दिया हूं”&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;दवा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;कुत्ता और पत्नी दोनों के बीमार होने पर एक व्यक्ति दवा खरीदने गया। व्यक्ति ने दुकानदार से कहा, ‘दवाइयों को अलग-अलग लिफाफे में रखकर उस पर लिख दें कि कौन-सी मेरी बीवी के हैं और कौन-सी मेरे कुत्ते की। मैं नहीं चाहता कि दवा बदल जाए और मेरे कुत्ते को कुछ हो जाए।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मित्र&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;रेखा ने अपने पति रोहित से कहा, ‘हमारी शादी में तो आपके बहुत से मित्र आए थे, अब उनमें से कोई नहीं आता।’ रोहित ने कहा, ‘सुख के सब साथी, दुख में न कोय…।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पदयात्रा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;मत्री जी की पदयात्रा सुबह सुबह एक गांव से गुजरने वाली थी। दोपहर को निरज दिवान जी उस गांव मे भागते हुये पहुंचे और एक व्यक्ति से पोछा ” क्या नेताजी गुजर गये ?” उसने जवाब दिया “काश नेताजी गुजर जाते ?”&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;धुलाई&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;रमेश धोबी को डांटते हुए, ‘एक तो तुमने मेरी पेन्ट गुम कर दी, ऊपर से धुलाई के पैसे मांग रहे हो?’ धोबी ने कहा, ‘साहब, पेन्ट धुलने के बाद गुम हुई थी।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;स्कूल&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;कसाई बकरे को लेकर काटने जा रहा था। बकरा चिल्ला रहा था। इसे देख सोहन अपने पिता से बोला, ‘पिता जी, यह बकरा क्यों चिल्ला रहा है?’ पिता ने कहा, ‘बेटा, कसाई इसे काटने जा रहा है।’ सोहन ने कहा, ‘मैंने सोचा यह स्कूल जा रहा है।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;किराये का मकान&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;किरायेदार ने मकान मालिक से कहा, ‘भाई साहब, आपने कैसा मकान मुझे किराये पर दिया है, वहां चूहे ही दौड़ते रहते हैं।’ मकान मालिक ने कहा, ‘तो क्या इतने कम किराये में आप घोड़ों की रेस देखना चाहते हैं।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रेम&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;कमला ने हरीश से कहा, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती रमेश।’ हरीश ने कहा, ‘लेकिन मैं रमेश नहीं हरीश हूं।’ कमला ने कहा, ‘सॉरी डार्लिग, मैं भूल गई थी कि आज रविवार नहीं सोमवार है।’ हरीश ने कहा, ‘क्या कहा, सोमवार है? अब मैं चलता हूं, पता नहीं सीमा कब से मेरा इंतजार कर रही होगी।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नाम&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;एक ड्राइवर को तेज मोटर चलाने पर सिपाही ने रोका और डायरी निकालकर पूछा, ‘आपका नाम?’ ड्राइवर ने कहा, ‘मेरा नाम है कपालामत चंद्रा तसकल काततीमयु नाकु दा…।’ सिपाही ने कहा, ‘बस, बस। जाओ, आगे से इतनी तेज गाड़ी मत चलाना।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;गुस्सा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;सोहन ने राहुल से पूछा, ‘यार, तुम्हारी बीवी को जब गुस्सा आता था तो वह काटना शुरू कर देती थी। अब काटती है या नहीं?’ राहुल ने कहा, ‘नहीं।’ सोहन ने पूछा, ‘क्यों, क्या उसे अब गुस्सा नहीं आता?’ राहुल ने कहा, ‘ऐसी बात नहीं है। गुस्सा तो आता है, पर अब दांत नहीं रहे।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रश्नपत्र&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अध्यापक ने परीक्षा से पहले विद्याथियों से कहा, ‘बच्चों, परीक्षा नजदीक है, प्रश्न पत्र छपने के लिए जा चुके हैं। फिर भी अगर किसी को कुछ पूछना हो तो, वह पूछ सकता है।’ सौरभ ने कहा, ‘सर, एक प्रश्न है।’ अध्यापक ने कहा, ‘पूछो?’ सौरभ ने कहा, ‘सर, ये प्रश्नप्रत्र कहां छप रहे हैं।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मंहगाई&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;पिंकी की मां ने डाक्टर से कहा, ‘डाक्टर साहब, पिंकी बढ़ नहीं रही है, इसके लिए कोई दवा बताएं।’ डाक्टर ने दवा के बदले उपाय बताते हुए कहा, ‘इसका नाम बदल कर महंगाई रख लो, फिर इसे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मौके की तलाश&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;एक व्यक्ति बहुत देर से एक दुकान का चक्कर लगा रहा था। दुकानदान ने कहा, ‘भाई साहब, आखिर आपको चाहिए क्या?’ व्यक्ति ने कहा, ‘कुछ सामान ले जाने का मौका।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;दांत में दर्द&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;सिनेमा हॉल का गेट कीपर दांत के डाक्टर के पास गया। डाक्टर ने पूछा, ‘तुम्हारे कौन से दांत में दर्द हो रहा है?’ गेट कीपर ने कहा, ‘ऊपर की बॉलकानी में दूसरे नंबर के दांत में।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;फिजूलखर्च&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;कंजूस पति ने अपनी पत्नी से कहा, ‘तुम फिजूलखर्ची बहुत करती हो। भगवान न करे, यदि मुझे कुछ हो गया तो तुम्हें भीख मांग कर गुजारा करना होगा।’ पत्नी ने कहा, ‘तुम इसकी चिंता मत करो। तुम से मांगते-मांगते मुझे अब भीख मांगने की आदत पड़ गई है।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नजर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;एक मरीज की आंखे कुछ ज्यादा ही कमजोर थीं। एक भी अक्षर पढ़वा पाने में नाकाम डाक्टर ने हारकर मरीज से आंखों के ठीक सामने थाली अड़ाकर पूछा, ‘क्या यह चीज तुम्हें दिखती है?’ मरीज ने कहा, ‘जी, दिखती है।’ डाक्टर ने पूछा, ‘क्या है?’ मरीज ने कहा, ‘ठीक-ठीक नहीं बता सकता, चवन्नी है कि अठन्नी है।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;शर्म&lt;br /&gt;मिस्टर वर्मा ने भिखारी से कहा, ‘भीख मांगते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए। मेरे साथ चलो, मेरे घर काम करना। मैं तुम्हें दस रुपये दूंगा।’ भिखारी ने कहा, ‘अच्छा ठीक है, तुम मेरे साथ बैठ जाओ। मैं तुम्हें बीस रुपए दूंगा।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;दिल&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;एक व्यक्ति पायलट के लिए इंटरव्यू देने पहुंचा। इंटरव्यू में उससे पूछा गया, ‘आपका दिल कहीं कमजोर तो नहीं?’ व्यक्ति ने कहा, ‘जी नहीं साहब, मेरा दिल तो इतना मजबूत है कि पिछले तीन सालों ने मुझे तीन-तीन दिल के दौरे पड़े फिर भी मैं जिंदा हूं।’ उस व्यक्ति से फिर पूछा गया, ‘दौरे तुम्हें कब-कब पड़े?’ व्यक्ति ने कहा, ‘जी जब श्रीदेवी, माधुरी और काजोल की शादी हुई थी तब।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;कैदी&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;जेलर ने कैदी से पूछा, ‘जेल से छूटने के बाद क्या करोगे?’ कैदी ने उत्तर दिया, ‘जी, जौहरी की दुकान खोलूंगा।’ जेलर ने पूछा, ‘लेकिन जौहरी की दुकान खोलने के लिए इतना रुपया कहां से लाओगे?’ इस पर कैदी ने कहा, ‘जेलर साहब आप भी कमाल करते हैं, किसी जौहरी की दुकान खोलने के लिए तो मुझे सिर्फ एक हथोड़े की जरूरत होगी।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रिकार्ड&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;हरीश ने अपने मित्र से कहा, ‘यार, यह आदमी अपने-आप को जूते क्यों मार रहा है?’ मित्र ने कहा, ‘यह गिनीज बुक में जूते खाने का रिकार्ड अपने नाम करवाना चाहता है।’&lt;br /&gt;*****************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;लाल-पीला&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;बबलू ने राम से कहा, ‘यार, तुम छोटी-छोटी बातों पर लाल-पीले हो जाते हो।’ राम ने कहा, ‘क्या कंरू, मेरा जन्म ही होली के दिन हुआ था।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;==============================================&lt;br /&gt;&lt;b&gt;4 टिप्पणीयां “अनुगुंज २१ : कुछ चुटकुले” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;वाह ! वाह!!&lt;br /&gt;ठहाके दार डरे आप तो.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रवि द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;:-D&lt;br /&gt;&lt;b&gt;संजय बेंगाणी द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Thanx for Hansana &amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;SHUAIB द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[…] चुटकुलों के कुछ मंतव्य ने भी बहुत आनंद प्रदान किया, और हो� ों पर हँसी वापस आई. मिर्ची से� यानी की पंकज भाई . […]&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अवलोकन - चुटकुलों की 21 वीं अनुगूंज at अक्षरग्राम द्वारा दिनांक जुलाई 20th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-4548594238158514192?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/4548594238158514192/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/07/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/4548594238158514192'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/4548594238158514192'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/07/blog-post.html' title='अनुगुंज २१ : कुछ चुटकुले'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-347861596739066334</id><published>2006-07-16T20:46:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T20:52:40.026-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बचपन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><title type='text'>मेरे बचपन की कुछ शरारतें</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;ये किस्से उस समय के है जब मै प्राथमिक पाठ्शाला मे था। हम महाराष्ट्र के गोंदिया जिले मे एक गांव झालिया मे रहते थे, गांव के बाहर थी हमारी पाठशाला। पाठशाला के&amp;nbsp;ठीक&amp;nbsp;सामने एक बडा सा मैदान और एक कुंआ। एक तरफ ध्वजस्तंभ,जिसका प्रयोग साल मे दो बार १५ अगस्त और २६ जनवरी को होता था। पाठशाला के एक तरफ थी,पानी की नहर, पिछे एक छोटी सी&amp;nbsp;पहाड़ी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठशाला की इमारत का निर्माण इस तरह से किया गया था कि किसी भी कक्षा मे प्रवेश करने के लिये&amp;nbsp;तीन&amp;nbsp;सीढीया चढनी होती थी। पाठशाला का समय होता था ११ बजे सुबह से शाम ५ बजे शाम तक का । पहले २ शिक्षण अंतराल के बाद १५ मिनिट की छूट्टी, उसके बाद २ शिक्षण अंतराल होते थे। तपश्चात होता था भोजनावकाश। उसके बाद २ और शिक्षण अंतराल। अंत मे बारी आती थी खेलकुद की। ये था हमारी पाठशाला की दिनचर्या।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सवाल ये है कि पाठशाला के नक्शे और हमारी शरारतो का क्या संबध ? जी हां बिलकुल संबध है बस आप पढते जायीये ! रूकिये हम अपने शिक्षको से भी परिचय करवा दे। हमारे मुख्याध्यापक दे लिल्हारे गुरुजी और कक्षाध्यापक तो हर साल बदलते रहे, लेकिन कक्षा १ से ३ तक जांभुळ्कर गुरूजी, कक्षा ४ मे तिवारी गुरूजी, कक्षा ५ मे बडी शेख बहनजी, कक्षा ६ मे टाटी गुरुदेव और कक्षा ७ मे कुराहे गुरूजी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिल्हारे गुरुजी से सभी थरथर कांपते थे,&amp;nbsp;गणित&amp;nbsp;के अच्छे अध्यापक थे। लेकिन उनके थप्पड से गाल पर पंजाब का नक्शा बनना तय होता था। जांभुळ्कर गुरूजी सभी छात्रो को गांधीजी बनने की शिक्षा देते थे। उनका कहना रहता था कि एक गाल पर थप्पड पढने पर दूसरा गाल सामने करना चाहिये!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिवारी गुरूजी सबसे अलग थे। वे एक अच्छे नाट्य/नृत्य निर्देशक थे। उनके पास आईडियो और कहानीयों का खजाना होता था, उनके निर्देशन मे हमने शिवाजी द्वारा अफजल खान का वध का नाटक, आदिवासी नृत्य जैसे कार्यक्रमो मे भाग लिया था। बडी शेख बहनजी संगीत मे अच्छा ज्ञान रखती थी,कुराहे गुरुजी अंग्रेजी मे। टाटी गुरुदेव पर तो एक पूरा चिठठा लिखना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम ६ शिक्षण अंतराल के बाद होता था खेलकुद के २ अंतराल। हम सभी के सभी खेलमैदान पर होते थे। कबड्डी, खो खो और दौड भाग के खेल चलते रहते थे। अपने सहपाठीयो के कद काठी की तुलना मे,मै उस समय काफी छोटा था। मै सिर्फ खोखो खेलता था, कबड्डी मे मेरा तो कचमूर निकल जाता था। दौड भाग वाले खेल मे भी हमारे बूरे हाल थे। खोखो मे तो हम अपनी चपलता और छोटे कद के कारण ही चल जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेलकुद के&amp;nbsp;अंतराल के बाद छुट्टी की घंटी जब बजती थी, तब हाल देखने लायक होता था। सारे के सारे छात्र अपना बस्ता लेने दौड पढते थे अपनी अपनी कक्षा की ओर।&amp;nbsp;तीन&amp;nbsp;सीढी चढने के बाद दरवाजे से जो अंदर चला गया वो बस्ता लेकर बाहर आने की कोशीश करता, जो बाहर रह गये वो अंदर जाने की कोशीस करते थे। बस ना अंदर वाले बाहर आ पाते थे ना बाहर वाले अंदर जा पाते। इस धक्कामुक्की मे रोज कोई ना कोई सीढीयों से&amp;nbsp;नीचे&amp;nbsp;गिरता था। जैसे ही उसका रोना शूरू होता, लिल्हारे गुरुजी पहुंच जाते अपनी छडी लेकर। उन्हे देखते साथ कतार बन जाती , फिर भी दो तिन छात्र पिट जाते थे। वे बडबडाते चले जाते, इन्हे रोज कतार लगाना सिखाओ ,दूसरे दिन वही हाल हो जाता है। इस सारे हंगामे मे मेरे बूरे हाल हो जाते थे,मै तो सीढीयों से रोज गिरने वालो मे से एक था। मेरा एक ऐसा ही साथी था नरेंद्र।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने इसका एक जुगाड निकाला। कक्षा की पिछली खिडकीयो से एक सलाख को थोडा मोड दिया। कैसे ? गुरुदेव की कुर्सी का सदूपयोग करके। अब खिडकी मे इतनी जगह हो गयी थी कि हम आराम से अंदर आ सकते थे और बाहर जा सकते थे। बस फिर क्या था। हमारा रोज का धक्कामुक्की मे&amp;nbsp;सीढ़ियों&amp;nbsp;से&amp;nbsp;नीचे&amp;nbsp;गीरना बंद हो गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिनो के बाद लिल्हारे गुरुजी की नजर मे आगया कि हम लोग दरवाजे से अंदर नही जा रहे है ना बाहर आ रहे हैं। हमारा सीढीयों से&amp;nbsp;गिरकर&amp;nbsp;रोना जो बंद हो गया था। बस एक दिन हम अपनी मस्ती मे बस्ता लिये खिडकी से बाहर कुदने ही वाले थे कि&amp;nbsp;नीचे&amp;nbsp;से आवाज आयी&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“आओ बेटा इधर आओ”&lt;/blockquote&gt;नीचे&amp;nbsp;देखा लिल्हारे गुरुजी अपनी छ्डी के साथ खडे है, बाजू मे नरेंद्र सहमा हुआ खडा है। हमारी समझ मे आ गया कि नरेंद्र ने विभीषण , जयचण्द और मीरजाफर की परंपरा को आगे बढाया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आगे क्या लिखूं आप समझ जाईये…..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा घर पाठ्शाला से ५०० मीटर की दूरी पर था। मै पाठ्शाला के&amp;nbsp;पीछे&amp;nbsp;से पहाडी के सामने होते हुये भोजनावकाश मे घर जाता था और भोजन के बाद वापिस आता था। जब मै भोजनावकाश के बाद वापिस आता था उसी समय एक रेल गुजरती थी। रेल की सिर्फ आवाज आती थी दिखायी नही देती थी। एक दिन&amp;nbsp;पहाड़ी&amp;nbsp;पर चढ गये, सबसे उपरवाले पत्थर पर पर चढकर देखा, दूर रेल जाते हुये माचिस के डिब्बो के आकार मे दिखायी दे रही है। बस क्या था? रोज का काम हो गया। पहले मै अकेला जाता था, लोग साथ आते गये और कांरवां बनता गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब पता नही कैसे लिल्हारे गुरुजी को पता चल गया कि भोजनावकाश के बाद बच्चे पहाडी के आसपास से आते है। एक दिन ऐसे ही रेल देखने के बाद हम पहाडी से निचे उतर रहे थे वही आवाज आयी&lt;br /&gt;“आओ बेटा, इधर आओ………………”&lt;br /&gt;जारी अगले अंको मे…………………&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;================================================&lt;br /&gt;&lt;b&gt;6 टिप्पणीयां “मेरे बचपन की कुछ शरारते.” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आशीष जी,&lt;br /&gt;बढ़िया संस्मरण हैं। अगली किश्त का इन्तज़ार है&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Laxmi N. Gupta द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खूब लिखा है। आगे टाटी गुरू के बारे में लिखा जाये जल्दी।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत रोचक लिखा है आशीष भाई. आपकी कक्षा ७ तक की शिक्षा मराठी माध्यम में हुई थी क्या?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अमित द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नही अमित, मराठी मेरी तृतिय भाषा थी। मेरी शिक्षा १० तक हिन्दी माध्यम से और उसके बाद अंग्रेजी माध्यम से हुयी है।&lt;br /&gt;वैसे मै मराठी पढ लिख और बोल लेता हूं !&lt;br /&gt;&lt;b&gt;आशीष श्रीवास्तव द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत खूब, रोचक लेख है&lt;br /&gt;&lt;b&gt;SHUAIB द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा लगा।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;eshadow द्वारा दिनांक जुलाई 18th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-347861596739066334?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/347861596739066334/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/07/blog-post_16.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/347861596739066334'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/347861596739066334'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/07/blog-post_16.html' title='मेरे बचपन की कुछ शरारतें'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-5126276752877142821</id><published>2006-07-11T20:53:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T20:56:28.209-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बचपन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>गुरु पूर्णिमा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;आज गुरु पूर्णिमा है, वेद व्यास का जन्मदिन ! गुरु पूर्णिमा एक ऐसा पर्व है जिसमें हम अपने गुरुजनों, श्रेष्ठजनों व माता-पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं तथा उनका आदर करते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दिन के साथ बचपन की काफी सारी खट्टी मीठी यादे जुड़ीं हुयी हैं। मुझे याद है कि मेरा स्कूल मे प्रवेश इसी दिन कराया गया था। सुबह कलम -पाटी पूजा हुयी थी, तिलक लगाया गया था। पाटी पर एक बड़ा सा ॐ बनाया गया था। एक मंत्र भी पढ़ा गया था&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;ॐ नमः सिद्धम ।&lt;/blockquote&gt;ॐ नमः सिद्धम । इस मंत्र से याद आया कि हमारे गांव मे एक बुजुर्ग हुआ करते थे, वे इस मंत्र को बिगाड़ कर कहते थे&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;आनामाशी धम, ना बाप पढ़े ना हम ।&lt;/blockquote&gt;पापा ने उसके बाद मुझे स्कूल लेकर गये थे। हंसते हंसते पापा की साईकिल पर बैठकर स्कूल गये थे और रोते रोते वापिस आये थे। अब रोते हुये इसलिये आये थे कि पापा तो नाम लिखा कर हमे झांसा देकर खिसक लिये थे। कुछ देर बाद पापा दिखायी नही दिये तब रोना शुरू! वो तो गनीमत थी (शिक्षिका बहनजी के लिये) कि मेरे पड़ोस की प्रभा दीदी भी उसी स्कूल मे पढ़ती थी। उन्होने हमे सम्हाला और शाम को घर वापिस लेकर आयी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल मे हर साल यह दिन धूमधाम से मनाया जाता था। हम पाटी पर , बाद मे पूस्तिका पर ॐ बनाकर स्कूल जाते थे। स्कूल मे वेदव्यासजी और ॐ की पूजा होती थी। शिक्षकों के भाषण होते थे और छुट्टी। मेरी शिक्षिकाओ मे से दो मुस्लिम थी (छोटी शेख बहनजी और बडी शेख बहनजी)। स्कूल मे हर शुक्रवार सरस्वती पूजा भी होती थी, लेकिन उन्होने हमेशा हर पूजा मे सक्रिय रूप से भाग लिया था। उस समय मुझे सब कुछ सामान्य लगता था। आज जब मै स्कूलों मे पूजा पाठ, प्रार्थना और तो और राष्ट्रगान(वंदे मातरम) पर विवाद के बारे मे पढ़ता हूं तो आश्चर्य होता है कि मेरे बचपन मे सरस्वती और वेद व्यास की पूजा छोटी शेख बहनजी और बडी शेख बहनजी ने करवाई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समझ मे नही आता कि ऐसा धार्मिक सौहार्द पता नही क्यो राजनिति की बली चढ जाता है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे एक शिक्षक थे टाटी गुरू(जी), मै उनके प्रिय छात्रो मे से एक था। उन्हे मुझसे काफी आशायें थी। वे मुझसे पूछा करते थे कि “मै तेरा क्या हूं,गुरू या गुरुजी”। उस समय मेरी समझ मे नही आता था कि उनका इस अजीब से प्रश्न का मतलब क्या है ? मै जवाब देता था “गुरु जी”। हमारी आदत थी कि सम्मान देने के लिये हर वाक्य के बाद ‘जी’ लगा दो और हम ‘गुरु’ के बाद ‘जी’ लगा देते थे। वे थोडे निराश हो जाते थे। बाद मे जब बडे हुये और इस प्रश्न का मतलब समझ मे आया तबसे हम उन्हे टाटी गुरुदेव ही कहते हैं। उन्होने हमे गुरू का अर्थ बताया था जो आज भी याद है&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;जीवन में अज्ञान के अंधकार को दूर कर सके वही गुरु है।&lt;/blockquote&gt;उनका एक और कथन मुझे याद आ रहा है&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“गुरु मे वह शक्ति होती है जो एक चरवाहे को मगध सम्राट बना सकती है।“&lt;/blockquote&gt;समस्त गुरुजनो को सादर नमन !&lt;br /&gt;*********************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;5 टिप्पणीयां “गुरु पूर्णिमा” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा भी नमन शामिल है गुरुजन के लिये!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संसार के समस्त गुरुओं को मेरा नमन्&lt;br /&gt;गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागूं पांय&lt;br /&gt;बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताय&lt;br /&gt;&lt;b&gt;eshadow द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बढिया लिखा. गुरु पूर्णिमा पर इससे बेहतर लेख नहीं हो सकता था&lt;br /&gt;&lt;b&gt;pratyaksha द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञान की जगह शायद अज्ञान हो।(भूले से लिखा गया) ज्ञान का प्रकाश होता है। लेख बहुत ही अच्छा है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रेमलता पांडे द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ठीक है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रेमलता पांडे द्वारा दिनांक जुलाई 13th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-5126276752877142821?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/5126276752877142821/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/07/blog-post_11.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/5126276752877142821'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/5126276752877142821'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/07/blog-post_11.html' title='गुरु पूर्णिमा'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-3348072688606854189</id><published>2006-06-09T18:30:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T18:38:11.388-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्य-व्यंग्य'/><title type='text'>प्रगति का मार्ग</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;हमारा देश हमेशा प्रगति के मार्ग पर रहता है, इसका मूल कारण यह है कि मार्ग पर हमेशा कार्य चलते रहता है। मार्ग पर कार्य रूकने का मतलब होता है प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो गया है। हर तरफ पहले गहरे गड्डे खोदना, उसमे से अलग अलग तरह के पाईप निकाल कर रख देना। कितने ही तरह की पाईप-लाईन होती है&amp;nbsp;पीने&amp;nbsp;के पानी की, गटर लाईन(&lt;i&gt;ये दोनो पास पास ही होती है, आवश्यकता होने पर एक दूसरे की मदद करती है&lt;/i&gt;),टेलीफ़ोन की, बिजली की, गैस की,टाटा की, रिलायंस की… वगैरह वगैरह। इन सभी पाईपलाईने किसी हसीना की चोटी के बालो की तरह एक दूसरे से गुंथी हुयी रहती है। ये गुंथन वे कैसे सुलझाते है, यह प्रश्न मुझसे सुलझाते नही बनेगा। हां तो मै कह रहा था कि रास्ते खोदकर, बाजु मे मिट्टी के पहाड खड़े कर दिये जाते है। अभी स्कूलों मे छुट्टियाँ है। बच्चों के लिये हर जगह शिविर लगे हुये है। रास्ते के किनारे ये मिट्टी के पहाडो का उपयोग पर्वतारोहण के शिवीर के लिये किया जा सकता है। समय भी बचेगा और पैसा भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले रास्तो के किनारे गढ्ढे खोद कर दुर्घटना से बचने बांस से एक कठघरा बना दिया जाता था। लेकिन इस कठघरों से टकरा कर दुर्घटना ज्यादा होती थी। अब कठघरा ना होने के बावजूद दुर्घटना कम हो गयी है। इसका कारण यह है कि कठघरा ना होने से लोग पूरी सावधानी से चलते है ! रास्ते पर एक समय मे अनेक तरह के कार्य चलते रहते है, साथ मे यातायात भी चलते रहता है। इस कारण अनेक बाधाओं का निर्माण होता है। इन बाधाओ(गढ्ढो और मिट्टी के ढेरो) के&amp;nbsp;बीच&amp;nbsp;से चलना एक चमत्कार है। यदि इस जगह बाधा दौड की तैयारी करवायी जाये तो २००८ मे बीजिंग ओलंपिक का स्वर्ण पदक हमारी झोली मे ही आयेगा। स्वर्ण इतिहास लिखने की यह एक स्वर्ण संधि है यह !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले छोटे मोटे कारणो से “&lt;b&gt;रास्ता रोको&lt;/b&gt;” आयोजित होता था,पानी के जैसे क्षुद्र कारणो पर भी ! उससे पहले पानी के मुद्दे पर नलो पर सिर्फ झगडे हुआ करते थे। इस ‘&lt;b&gt;रास्ता रोको&lt;/b&gt;’ आंदोलनो से आंदोलनकारीयो को छोड़कर सभी को परेशानी हुआ करती थी। अब ये आंदोलन अपने आप बंद हो गये है। कारण यह है कि रास्तो पर चल रहे कार्य के से हर तरफ ट्रैफिक जाम है। सभी वाहन पहले से ही रुके हुये है,अब रास्ता रोक कर क्या करे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई कहेगा कि ऐसे ट्रैफिक जाम से देश का कीमती समय, शक्ति और पैसा व्यर्थ जाता है। लेकिन इन लोगो यह समझ मे नही आता कि सारी तरफ यातायात रूक जाने से पेटोल की कितनी बचत होती है। कितनी विदेशी मुद्रा बचतीं है। “&lt;b&gt;पेट्रोल की बचत यानी पेट्रोल का निर्माण&lt;/b&gt;” ! इस तरह से हम पेट्रोल का निर्माण करते रहे तो एक दिन ऐसा आयेगा की हम अरब राष्ट्रों को पेट्रोल बेचेंगे! वैसे भी हमारी शक्ति व्यर्थ नही जाती है। ट्रैफिक मे फंसकर एक जगह बैठे होने से शक्ति कैसे बर्बाद होगी ? उल्टे लोग सुबह सुबह जागींग कर अपनी शक्ति(कैलरी) बर्बाद करते है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगबाग आजकल काफी सोना(स्वर्ण) ख़रीद रहे हैं ,सोने की किमंते आसमान छूने के बाद भी। इसका असली कारण ट्रैफिक जाम मे छुपा है। इस ट्रैफिक के कारण चोरो की संख्या मे कमी आयी है, खास कर सोने की चेन या मंगलसुत्र खींच के भाग जानेवालों की। बेचारा चोर घट्ना स्थल पर ही माल के साथ बरामद हो जाता है। जिस ट्रैफिक मे हम ढंग से चल नही सकते,चोर भागेगा कैसे ? चोरो और चोरी मे कमी का श्रेय पुलिस का नही ट्रैफीक जाम का है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पकडे गये चोरो का या अपराधियों का मुंह खुलवाने पुलिस ‘&lt;b&gt;थर्ड डिग्री&lt;/b&gt;’ का प्रयोग करती है।(शिक्षण मे ही नही, नौकरी मे, कहीं भी थर्ड डिग्री का ही बोलबाला है !) पुलिस अब थर्ड डिग्री की बजाये अपराधी को ट्रैफिक जाम मे फंसा देते है, बेचारा परेशान हो कर अपराध कबूल कर लेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी कभी ऐसे ट्रैफिक जाम मे रूग्णवाहीनी फंस जाती है, जाने के लिये जगह नही होती। मरीज उपर जाने के मार्ग पर होता हओ। इस परिस्थिती मे रूग्णवाहिनी शववाहिनी मे रूपांतरीत ना हो ऐसी मनोभावना होती है। लेकिन नियति के आगे किसकी चलती है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ जगह पर रास्ता चौडे करने के लिये जगह ही नही बची है,उड्डान पूल बनाना मजबूरी है। लताजी कहती हैं कि इससे उन्हे परेशानी होगी। अब इसमे गलत क्या है ? लोगो ने खिडकी के किनारे गाडी खडी कर आटोग्राफ मांगना शूरू कर दिया तो ? उड्डान पूल पर ही ट्रफिक जाम हो जायेगा ! क्या मतलब रहा पैसे बरबाद कर पूल बनाने का ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखा गया है कि शापिंग माल के आसपास ट्रैफिक जाम ज्यादा होता है। वैसे ये नजारा फुटपाथ की दूकानो के बाहर ‘माल′ के कारण भी पैदा होता है। लेकिम ट्रैफिक जाम और शापिंग मे एक अटूट रिश्ता है।आप अपनी सीट पर डमी बिठाकर शान से शापिंग कर के वापिस आ सकते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस्तिको की मदत के लिये लोगो ने फुटफाथ पर छोटे छोटे मंदिर बना दिये है। लोग रास्ते मे चप्पलो जूते सहित खडे खडे पूरे मन से भगवान के दर्शन कर सकते है। पैरो मे चप्पल/जूते होने से मन भगवान प्रतिमा की तरफ ही होता है,चप्पल/जूते चोरी होने का डर जो नही होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है कि रास्ते चौडे हो रहे है। इसके लिये सडक किनारे के पेड काटे जायेंगे। भविष्य मे स्वच्छ हवा की जरूरत महसूस होने पर एक और पाईप लाईन डाल दी जायेगी। रास्ते चौडे होंगे, नये वाहनो के लिये भरपूर जगह उपलब्ध होगी। ये मालूम होने पर कार कंपनीयां अपना उत्पादन बढा रही हैं। बाजार मे कारो के नये नये माडेल आये हैं। अनेक बैंक लोगो के&amp;nbsp;पीछे&amp;nbsp;हाथ धोकर पिछे लगे है। आप कार लिजिये, हम कर्ज देते है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल मुझे एक बैंक से फोन आया। एक कर्णप्रिय मधूर आवाज “मै लेनादेना बैंक से बोल रही हूं”&lt;br /&gt;हम : “हां जी कहिये !”&lt;br /&gt;उसने प्रश्न पूछा “आपके पास गाडी है ?”&lt;br /&gt;हम : ” हांजी है”&lt;br /&gt;वह : “कौनसी गाडी है ?”(जैसे कह रही हो तुम्हारे पास मारूती या होंडा हो तो उसे बेच डालिये और रोल्स रायस , बेण्टले, बी एम डब्ल्यु या मर्सडीज खरीदीये। हम कर्ज देते है।)&lt;br /&gt;हमने उत्तर दिया “बैलगाडी, अभी तो मैने उसे अपने गांव मे ही रखी है।”&lt;br /&gt;उत्तर मे आवाज आयी “भडाक” !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी समझ मे आज तक ये नही आया कि कन्याये फोन को इतनी बेदर्दी से क्यों पटकती है !&lt;br /&gt;****************************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;5 टिप्पणीयां “प्रगति का मार्ग” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे यार क्या लिखते हो माउसतोड़ के! खासकर ये पढ़कर-&lt;br /&gt;पुलिस अब थर्ड डिग्री की बजाये अपराधी को ट्रैफिक जाम मे फंसा देते है, बेचारा परेशान हो कर अपराध कबूल कर लेता है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 9th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;…पिछले कमेंट के आगे&lt;br /&gt;बहुत मजा आया।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 9th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हकीकत बयान की है आपने।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;e-shadow द्वारा दिनांक जून 10th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ही ही ही, सही लिखे हो आशीष भाई!!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक जून 10th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[…] क्या आशीष खाली-पीली चिंता कर रहे हैं? सुना है कि रास्ते चौडे[यथा] हो रहे है[यथा]। इसके लिये सडक[यथा] किनारे के पेड[यथा] काटे जायेंगे। भविष्य मे स्वच्छ हवा की जरूरत महसूस होने पर एक और पाईप लाईन डाल दी जायेगी। रास्ते चौडे[यथा] होंगे, नये वाहनो[यथा] के लिये भरपूर जगह उपलब्ध होगी। […]&lt;br /&gt;&lt;b&gt;DesiPundit » Archives » प्रगति पर उतारू भारत द्वारा दिनांक जून 11th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-3348072688606854189?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/3348072688606854189/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/06/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/3348072688606854189'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/3348072688606854189'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/06/blog-post.html' title='प्रगति का मार्ग'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-4497694685102659141</id><published>2006-06-07T18:39:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T19:04:26.619-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यात्रा वृतांत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><title type='text'>सुदूर भारत के दक्षिण मे ‘’कन्याकुमारी'’</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;चेन्नई मे कार्य करते हुये एक वर्ष बीत चुका था । एक ही कार्य की नीरसता से मन उब गया था । किसी परिवर्तन की आवश्यकता महसुस हो रही थी । ऐसे मे&amp;nbsp;प्रदीप&amp;nbsp;ने एक शाम खाने के समय कहा चलो कन्याकुमारी चलते हैं । अंधा क्या चाहे , दो आँखें । बिना सोचे विचारे कह दिया, चलो चलते है । अगले दिन आँफिस आ कर सहकर्मीयों से बात की। तब एक और महाशय&amp;nbsp;श्रीनिवास&amp;nbsp;भी तैयार हो गये । आनन फानन कार्यक्रम बना । चल दिये हम तीनों सुदूर भारत के दक्षिण मे ‘’&lt;b&gt;कन्याकुमारी&lt;/b&gt;'’ ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा ‘’&lt;b&gt;चेन्नई कन्याकुमारी'&lt;/b&gt;’ एक्सप्रेस से आरक्षण था । जो चेन्नई से शाम 5:15 बजे चल कर दूसरे दिन सुबह 8:00 बजे कन्याकुमारी पहुंचती है । रेल नीयत समय पर&amp;nbsp;चेन्नई&amp;nbsp;से रवाना&amp;nbsp;हुई&amp;nbsp;। हमारे डिब्बे मे&amp;nbsp;अधिकतर&amp;nbsp;लोग दक्षिण भारतीय थे , जो अपने अपने कार्यो से मदुरै या किसी और जगह जा रहे थे । पर्यटन की दृष्टि से यात्रा करने वाले सिर्फ हम तीनों थे । चेन्नई से बाहर निकलते ही मन काफी हल्का हो गया । दैनिक जीवन का सारा मानसिक बोझ शहर मे ही छूट गया ऐसा महसूस हो रहा था । हम तीनों काफी देर तक बच्चो की तरह खिड़की के बाहर देखते रहे , और बाते करते रहे । रात्री के 10:00 बजे के आसपास हम लोगो ने भोजन&amp;nbsp;किया&amp;nbsp;और सो गये ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह 6:00 बजे प्रदीप ने मुझे यह कहते हुये जगाया ‘&lt;b&gt;’भाई साहब , सपने देखना बंद करो और बाहर के नज़ारे देखो'&lt;/b&gt;’ । मैने भुनभुनाते हुये आँखें खोलकर बाहर देखा और देखता ही रह गया । रेल उस वक्त पहाड़ों के किनारे किनारे धान के खेतो के बीच से ग़ुज़र रही थी । जिधर नजर उठावो उधर धान के खेत और नारियल के उंचे उंचे पेड नजर आ रहे थे । पृष्ठ-भाग मे पहाड़ों की चोटियों पर अठखेलियां करते बादल हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों सा नज़ारा पेश कर रहे थे । कुदरत ने अपनी खूबसूरती यहां दिल खोल के बाटीं है । थोडा आगे चलने पर रेल मार्ग के दोनो ओर पवन चक्कीयों की कतारे दिखाई देने लगी । पहाड की तलहटी मे धान के खेत और, दोनो ओर से पवन चक्कीयों की कतारो के बीच से होते हुये हमारी रेल गुजर रही थी । कन्याकुमारी के पहले एक स्टेशन है ‘’&lt;b&gt;नागर कोइल&lt;/b&gt;′’,इस स्टेशन पर हमारी रेल पुरी खाली हो चुकी थी । हमारे डिब्बे मे हम तीनों ही बचे थे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हम कन्याकुमारी पहुचें तब हम लोग आश्चर्य मे पड गये । हमे लगा था कि स्टेशन पर उतरते ही हमे कुली , टैक्सी वाले घेर लेगें ज़ैसा कि अन्य पर्यटन&amp;nbsp;स्थलों&amp;nbsp;पर होता आया है। स्टेशन पर चाय , काफी और नाश्ते की आवाज लगाते दुकानदार होंगे । आशा के विपरीत कन्याकुमारी का रेलवे स्टेशन उजाड और&amp;nbsp;वीरान&amp;nbsp;सा था । स्टेशन पर सिर्फ दो प्लेटफॉर्म और एक चाय पान की दुकान थी । हमे सबसे पहले ठहरने के लिये एक होटल या धर्मशाला की तलाश थी । रेलवे स्टेशन पर ही विवेकानंद स्मारक का कार्यालय बना हुवा है जहां से विवेकानंद स्मारक आश्रम मे कमरे किराये से लिये जा सकते है । उस वक्त वो भी बंद पडा हुवा था पुछने पर पता चला कि आज कल वो बंद ही रहता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेलवे स्टेशन से बाहर आकर हमने विवेकानंद स्मारक आश्रम के लिये आटो&amp;nbsp;किया&amp;nbsp;। ये आटोवाले कन्याकुमारी मे कही भी 20 रू मे पहुंचा देते है । रास्ते मे आटोवाले ने हमसे पूछा कि हम विवेकानंद स्मारक आश्रम ठहरने जा रहे है या देखने । जब हमने उसे कहा कि हम वहां ठहरने जा रहे है तब उसने हमे सलाह दी कि विवेकानंद स्मारक आश्रम मे ठहरने की बजाय हम त्रिवेणी संगम के पास किसी होटल मे ठहरे जिससे सूर्योदय और सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य देखने मे आसानी होगी । हमने उसकी बात मानते हुवे त्रिवेणी संगम के पास ठहरने का निश्चय किया । आटोवाला हमे एक सस्ते और अच्छे होटल मे छोड़ गया। होटल मे नहा धोकर तैयार होने के बाद हम कन्याकुमारी घूमने निकले ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कन्याकुमारी एक काफी छोटा सा कस्बा है । कन्याकुमारी मे सारे दर्शनीय स्थल 500 वर्ग मी मे ही है। देवी कुमारी का मंदिर ग़ांधी स्मारक विवेकान्द शिला और ॠषी थिरूवल्लुवर प्रतिमा एक दुसरे से सटे हुवे है ।सिर्फ विवेकानंद स्मारक आश्रम ही&amp;nbsp;थोड़ी&amp;nbsp;दूरी&amp;nbsp;1 की मी पर स्थित है। हमने देवी कुमारी के मंदिर से शुरूवात की। दक्षिण भारतीय मंदिरो की तरह यहां दर्शन के लिये बदन पर आप अगंवस्त्र या अंगोछा पहन कर ही जा सकते है ।&amp;nbsp;मंदिर&amp;nbsp;के पुजारी ने बताया कि कुछ वर्षो पहले तक पुरूषो के लिये धोती या लुंगी तथा अगंवस्त्र और महिलाओ को&amp;nbsp;साड़ी&amp;nbsp;ही पहन कर दर्शन की ही अनुमती थी । अब पुरूषो को पतलुन की छुट मिल गयी है लेकीन बदन उघाडा या अगंवस्त्र से ढंका चाहिये । महिलाओ को साडी या सलवार की&amp;nbsp;अनुमति&amp;nbsp;है। जब हम मदिंर के अंदर पहुचे देवी का स्नान चल रहा था । देवी स्नान के लिये चंदन चुरा, जल और भी काफी सारी चीजों का&amp;nbsp;उपयोग&amp;nbsp;किया&amp;nbsp;जाता है । गर्भगृह मे शहनाई तथा पखावज का वादन हो रहा था । मै खुद को 12 वी सदी मे महसुस कर रहा था । यह मंदिर ज्यादातर दक्षिण भारतीय मंदिरो की तरह चार प्रवेशद्वारों से सुसज्जीत है । पुजारी ने बताया की&amp;nbsp;पूर्व&amp;nbsp;का दवार अब बंद ही रहता है क्योकि&amp;nbsp;समुद्र&amp;nbsp;के नाविक देवी के नाक की हीरे की नथ की चमक से दिशा भ्रमीत हो जाते थे । यह मंदिर काफी पुराना और खूबसूरत है । मंदिर दर्शन के लिये सबसे उपयुक्त समय 11:00 सुबह का है इस समय देवी की आरती होती है । आरती मे दक्षिण भारतीय वादय यन्त्रो का&amp;nbsp;उपयोग&amp;nbsp;होता है। मन तथा वातावरण भक्ती के रस से सराबोर हो जाता है। मेरे जैसा नास्तिक इस गीत ,संगीत, आरती के आल्हादक वातावरण से प्रभावित हुये&amp;nbsp;बिना&amp;nbsp;नही रह सका ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवी दर्शन के बाद हमने शुछिन्द्र मंदिर जाने का विचार किया। यह मंदिर करीब 1300 साल पुराना है । इसे चोल राजाओ ने बनवाया था। मंदिर कन्याकुमारी से 18 कि मी की दुरी पर है। यहां आप बस या टैक्सी से जा सकते है । हम लोगो ने एक टैक्सी तय कर ली । मदिर का मार्ग हरियाली से भरपुर और रमणीक है । हमारा टैक्सी चालक काफी बातुनी था । वो रास्ते मे पडनेवाली हर&amp;nbsp;चीज&amp;nbsp;के बारे मे बताते जा रहा था । हम लोग 20 मी मे मंदिर पहुच गये। टैक्सी चालक ने हमे चप्पलें और कमीज टैक्सी मे ही छोड देने कहा । जैसे ही हम मंदिर परिसर के अंदर पहुचे एक गाइड हमारे साथ लग गया । वो हमे मार्ग दिखाते हुवे हर&amp;nbsp;मूर्ति&amp;nbsp;के बारे मे बताने लगा । मंदिर परिसर काफी विशाल है । सबसे पहले हम हनुमान जी की 80 फीट उचीं एक ही पत्त्थर मे तराशी मुर्ती के पास पहुचे । इस मुर्ती पर पान की माला और मख्खन चढाया जाता है । कहा जाता है हनुमान जी ने लकां दहन के बाद यहीं पर अपनी&amp;nbsp;पुंछ&amp;nbsp;की आग बुझायी थी । हम लोगो ने भी मुर्ती पर पान की माला और मख्खन चढाया । पश्चात हम लोग अंदर पहुचे । गाइड हमे मदिर के अंदर घुमाता हुवा हर&amp;nbsp;मूर्ति&amp;nbsp;के बारे मे बताता जा रहा था । यहा एक ही पत्त्थर मे तराशी हुइ नदीं, ग़णेश, क़ार्तीकेय की विशालकाय&amp;nbsp;मूर्तिया है । इन&amp;nbsp;मूर्तियों&amp;nbsp;को देख कर आश्चर्य होता है कि उस काल मे जब तकनीक इतनी&amp;nbsp;विकसित&amp;nbsp;नही थी यह निर्माण किस तरह से कीया गया होगा । हम लो चोल राज की एक&amp;nbsp;मूर्ति&amp;nbsp;के पास पहुंचे देख कर विश्मय मे पड गये ।यह&amp;nbsp;मूर्ति&amp;nbsp;भी एक ही पत्त्थर मे तराशी हुइ है क़ितुं इसमे चोल राजा, रानी, दो दरबान तथा&amp;nbsp;पूरा&amp;nbsp;मडंप संम्मीलीत है । हम शिव&amp;nbsp;मंदिर&amp;nbsp;पहुचे । शिव&amp;nbsp;लिंग&amp;nbsp;के दर्शन किये । यह मदिर सुबह 6:00 से 11:00 तक तथा शाम 4:00 से 6:00 बजे तक ही खुला रहता है । इस&amp;nbsp;मन्दिर&amp;nbsp;परिसर&amp;nbsp;के खम्बो को बजाने पर&amp;nbsp;संगीतमय&amp;nbsp;ध्वनीयां&amp;nbsp;निकलती&amp;nbsp;है । गाइड ने हमे इन खम्बो पर जलतरंग तथा सरगम बजा कर आर्श्चयचकीत कर दिया । गाइड हमे मंदिर परीसर से बाहर ले आया। हमने गाइड को उसका पारिश्रमीक दिया और चल दिये अपने अगले&amp;nbsp;पड़ाव&amp;nbsp;की ओर ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-MuYGGWprA0s/TuAo6P3kvaI/AAAAAAAABow/mokRU6-SSzM/s1600/sanjivanaitemplekanyak.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="133" src="http://4.bp.blogspot.com/-MuYGGWprA0s/TuAo6P3kvaI/AAAAAAAABow/mokRU6-SSzM/s200/sanjivanaitemplekanyak.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;टैक्सी चालक हमे वापस कन्याकुमारी की ओर ले चला । मार्ग मे उसने एक पहाडी के निचे टैक्सी खडी कर हमे बताया कि यह संजीवनी पर्वत है, उपर एक शिव मंदिर है । यहां पर बाहर यहां काफी कम लोग आते है। हम लोग चल दिये शिव मदिर की ओर । लगभग 500 सीढीया चढने के बाद हम मंदिर तक पहुच गये । यह मंदिर एक प्राकृतिक गुफा मंदिर है । गुफा के अंदर एक शिव लींग है । शिव लींग के दर्शन कर बाहर निकलने पर सामने उचांई से कन्याकुमारी का मनमोहक नजारा दिखाई दिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद हमारा अगला पडाव था विवेकानंद आश्रम।यह आश्रम अब उजाड सा है। आश्रम मे एक विश्रामगृह और प्रदर्शनालय है। प्रदर्शनी मे स्वामी विवेकानंद की कुछ वस्तुये रखी हुयी है। यहां पर विवेकानंद साहित्य भी&amp;nbsp;बिक्री&amp;nbsp;के लिये उपलब्ध है। मन आश्रम की हालत को देख कर निराश हो गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-ZLNmF_Z72YE/TuAoRq0YKoI/AAAAAAAABoo/M_z2yyyw3YQ/s1600/gandhismarak.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://3.bp.blogspot.com/-ZLNmF_Z72YE/TuAoRq0YKoI/AAAAAAAABoo/M_z2yyyw3YQ/s200/gandhismarak.jpg" width="136" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;वापिस कन्याकुमारी पहुंचने पर हमारे पास देवी कुमारी मंदिर के आसपास के दो&amp;nbsp;तीन&amp;nbsp;स्थल बचे हुये थे। सबसे पहले गांधी स्मारक पहुंचे। महात्मा गांधी की अस्थियां सागर मे विसर्जन से पहले यहां रखी गयी थी। उस जगह एक चबुतरा बना हुआ है। यह मंदिर का निर्माण कुछ इस तरह से किया गया है कि यह मण्दिर मस्जिद और चर्च सभी का आभास देता है। दो अक्तुबर को दोपहर मे&amp;nbsp;ठीक&amp;nbsp;बारह बजे मंदिर के छत पर बनाये गये एक सूराख से चबुतरे पर&amp;nbsp;सूर्य&amp;nbsp;किरणे पडती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बारी थी विवेकानंद शीला और थिरूवल्लुवर प्रतिमा की। यहां जाने के लिये आपको नाव से जाना होता है। ये नाव आपको हर २०&amp;nbsp;मिनट&amp;nbsp;मे मिल जायेगी। नाव पहले विवेकानंद स्मारक और उसके बाद थिरूवल्लुवर प्रतिमा जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-ax2CEjwh92U/TuAoBMUYFaI/AAAAAAAABog/24aOq3C1ysA/s1600/vivekanadrock.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="214" src="http://4.bp.blogspot.com/-ax2CEjwh92U/TuAoBMUYFaI/AAAAAAAABog/24aOq3C1ysA/s320/vivekanadrock.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;विवेकानंद शीला एक काफी बडी सी चट्टान है। इस पर एक देवी कुमारी का मण्दिर और विवेकानंद स्मारक है। इस जगह पहुंचने के बाद सबसे पहले हमने एक कक्षा मे शामिल हुये,। यहां इस स्मारक के बारे मे जानकारी दी जाती है। कक्षा के बाद देवी कुमारी पहुंचे। मण्दिर मे देवी कुमारी के एक पांव का निशान है। कहा जाता है कि देवी कुमारी ने शिव की पति के रूप मे प्राप्ति के लिये यंहा एक पांव पर तपस्या की थी। स्वामी विवेकांनन्द ने जहां पर&amp;nbsp;तीन&amp;nbsp;दिनो के लिये समाधी ली थी, वहां पर एक&amp;nbsp;बड़ा&amp;nbsp;सा कमरा है, लोग वहां पर जाकर कुछ देर तक मौन धारण कर साधना या प्रार्थना करते है। यहां पर से भी आप विवेकानन्द साहित्य खरीद सकते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-MRwI83jZTlc/TuApJqabxMI/AAAAAAAABo4/54WNtmCyPz0/s1600/devikumaritemplekk.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="131" src="http://3.bp.blogspot.com/-MRwI83jZTlc/TuApJqabxMI/AAAAAAAABo4/54WNtmCyPz0/s200/devikumaritemplekk.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अगला पडाव थिरूवल्लुवर प्रतिमा थी, यह प्रसीद्ध तमिळ कवी की प्रतिमा है । तमिळ्नाडु मे उन्हे वाल्मिकी के बराबर दर्जा दिया जाता है। यह प्रतिमा विशालकाय है। प्रतिमा के अंदर कुछ उंचाई तक चढकर जाया जा सकता है। यंहा हवा इतनी तेज चलती है कि खुद को सम्हालना मुश्किल हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा कन्याकुमारी भ्रमण पूरा हो चुका था, अब इंतजार था शाम का, जब अरब सागर मे&amp;nbsp;डूबते&amp;nbsp;सुरज का मनोहारी दृश्य देखना था। हमारी किस्मत खराब थी। बाद्ल नही छाये थे, सुरज उत्तरायण मे था। सुरज सागर मे डुबते दिखायी देने की बजाये&amp;nbsp;पहाड़ियों&amp;nbsp;के&amp;nbsp;पीछे&amp;nbsp;छुप रहा था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कन्याकुमारी की यात्रा पूरी करने के बाद हम चल दिये त्रिवेन्द्रम। यह अगले यात्रा वृतांत मे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;4 टिप्पणीयां “सुदूर भारत के दक्षिण मे ‘’कन्याकुमारी'’” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;वाह! आशीष,&lt;br /&gt;बहुत खुब वर्णन किया है, और फ़िर छायाचित्रों के साथ तो यह प्रविष्टी परिपूर्ण ही हो गई है.&lt;br /&gt;वाकई, बहुत अच्छा लिखे हो, बस, मात्राओं की तरफ़ थोड़ा और ध्यान दे देने की आवश्यकता लग रही है.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;विजय वडनेरे द्वारा दिनांक जून 7th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत खूब । बढ़िया लिखा।हमारे पास तो कन्याकुमारी तथा त्रिवेन्द्रम की काली-सफेद फोटो हैं। तुम्हारे फोटो से काम चलाते हुये अपना यात्रा विवरण लिखा जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 7th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशीष भाई, बहुत सुंदर लिखा है आपने। ऐसा लगा कि मै पिछले बीस मिनट तक कन्याकुमारी में विचरता रहा। धन्यवाद।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;e-shadow द्वारा दिनांक जून 8th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन्दर&lt;br /&gt;&lt;b&gt;उन्मुक्त द्वारा दिनांक जून 8th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-4497694685102659141?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/4497694685102659141/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/06/blog-post_07.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/4497694685102659141'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/4497694685102659141'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/06/blog-post_07.html' title='सुदूर भारत के दक्षिण मे ‘’कन्याकुमारी&apos;’'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-MuYGGWprA0s/TuAo6P3kvaI/AAAAAAAABow/mokRU6-SSzM/s72-c/sanjivanaitemplekanyak.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-326354761899234653</id><published>2006-06-05T14:05:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T19:17:01.249-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कन्या पुराण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><title type='text'>रांग नंबर</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;“&lt;b&gt;रांग नंबर&lt;/b&gt;” यह फोन पर वार्ता का सबसे मह्त्वपूर्ण शब्द है। ऐसे तो हमारे फोन इतिहास मे ना जाने कितने रांग नंबर आते है ,लेकिन कुछ रांग नम्बर हमेशा याद रह जाते है…&lt;br /&gt;ऐसा ही एक रांग नम्बर मुझे आया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक घनघोर अंधेरी रात, बारिश हो रही थी और बिजली जा चुकी थी। बिजली जाने पर हमेशा की तरह मै मोमबत्ती ढूंढ रहा था।वैसे भी मुझे मोमबत्ती हमेशा बिजली आ जाने के बाद ही मिलती है। मै मोमबत्ती शोध&amp;nbsp;मुहिम&amp;nbsp;मे व्यस्त था कि मेरा फोन बजा। फोन उठाने पर एक कर्णप्रिय मधुर आवाज आयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हैलो, बिजली आफिस ”&lt;br /&gt;&amp;nbsp;“नही, रांग नंबर”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने जवाब दिया और अपनी मुहीम जारी रखी। (कर्णप्रिय, मधूर आवाज ! समझ गये ना ? )&lt;br /&gt;एक बार फिर से घंटी बजी, वही प्रश्न और वही उत्तर। मैने फोन रखा और मुझे मोमबत्ती मिल गयी। लेकिन अब नयी शोध मुहीम; माचिस ढूढनी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर एक बार फोन बजा , फिर वही मधुर आवाज ।मैने संयम ना छोडते हुये, उसे उत्तर देने का निश्चय किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&lt;/b&gt; “हां जी कहिये ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह&lt;/b&gt;: “क्या कहिये.. हमारी बिजली चली गयी है?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“बिजली गयी तो क्या ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह:&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“तो क्या का क्या मतलब ? आप कर क्या रहे है ?” (तब तक मुझे माचिस मिल गयी)&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह:&lt;/b&gt; “अरे सो गये क्या ? हम लोगो को अंधेरे मे रखकर सोने के अलावा आप लोगो के पास कोई और काम नही है क्या ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“अभी तो मै माचिस जला रहा हूं”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “क्या ? देखिये। ये आपका रोज का नाटक हो गया है। दिन मे लोड शेडीग और अब रात मे भी !”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“देखिये बहन जी….”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“बहन जी, क्या बात करते है आप ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&lt;/b&gt; “देखिये आप जो भी कोई है, जो नंबर आपने डायल किया है…”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “वह मुझे कुछ नही मालूम , पहले ये बताईये बिजली कब आयेगी”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कुछ सुनने के लिये तैयार नही थी। अब मेरा शैतानी दिमाग जाग गया और मैने भी मौज लेना शुरू किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै : &lt;/b&gt;“अच्छा, ये बताईये कब गयी ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “सात से आठ के बिच”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै:&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“साथ मे कोई था?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “मतलब ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै:&lt;/b&gt; “जब गयी तो कौनसे कपडे पहने हुये थी ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “क्या बात कर रहे है आप?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“क्या उमर होगी उसकी ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “दिमाग घूम गया है क्या आपका ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“वह तो एक्दम&amp;nbsp;ठीक&amp;nbsp;है, मुझे लगा कि आपके घर का कोई सद्स्य कहीं चला गया है ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “बिजली गयी है बिजली”(एक चिढी़ हुयी आवाज, सारी&amp;nbsp;मधुरता&amp;nbsp;गायब)&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै:&lt;/b&gt; “ऐसा क्या, आपके बोलने से तो ऐसा लगा कि आपकी सास कहीं चली गयी है।”&lt;br /&gt;वह :“मेरी अभी तक शादी नही हुयी है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हूर्रे….बल्ले …. बल्ले…….&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&lt;/b&gt; “ऐसा क्या, तब तो ये रांग नंबर लग रहा है.. मै तो गुमशूदा विभाग से बोल रहा हूं!”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“रांग नंबर… तो आपने पहले क्यो नही बताया?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;येल्लो और कर लो बात…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“सारी…”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&lt;/b&gt; “कोई बात नही, ऐसे ही रांग नंबर लगा दिया किजिये।”&lt;br /&gt;भडाक(फोन पटकने की आवाज आयी)। बिजली भी आ गयी थी !&lt;br /&gt;******************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और किस्सा। पता नही क्यो, मुझे आने वाले अधिकतर रांग नंबर कन्याओं के क्यो होते है?&lt;br /&gt;घंटी बजी, मैने फोन उठाया। आवाज आयी “हैलो सुरेश !” मैने फोन नही रखा, मालूम था कि अधिकतर रांग नंबर&amp;nbsp;दोबारा&amp;nbsp;कम से कम एक बार और आते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “हैलो सुरेश !”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&lt;/b&gt; “आधा चाहिये या पूरा ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “आप कहां से बोल रहे है ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&lt;/b&gt; “पृथ्वी नामक ग्रह से ”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “हां हां वह ठीक है, लेकिन आप बोल कहां से रहे है?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“क्या मैडम, आप भी। सभी तो मुंह से ही बोलते है ना !”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “ज्यादा होशियारी मत दिखाओ, आप है कौन ?”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&lt;/b&gt; “एक भारतिय प्राणी”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“लेकिन इस प्राणी का कोई नाम तो होगा”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&lt;/b&gt; “नाम मे क्या रखा है , शेक्सपीयर ने कहा था”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;“तुम सीधे सीधे बताते हो या फोन रखूं”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मै :&lt;/b&gt; “ये हुयी ना अकलमंदी की बात,’रांग नंबर’ पर इतनी देर तक बात कर रही थी आप”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वह :&lt;/b&gt; “ओह नो,रांग नंबर क्या ?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ऐसे होते है रांग नंबर….&lt;br /&gt;*******************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;9 टिप्पणीयां “रांग नंबर” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;रांग नंबर का चस्का लग गया है तुम्हें। अब कभी सही नंबर लग गया तो बात करने में तकलीफ होगी।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता है कि बहुत प्रार्थना करते होगे कि कोई रोंग नम्बर लगे और कोई मधुर आवाज़ में कुछ पूछे. होशियार रहना, कभी कभी पत्नी या प्रेमिका भी रंगीनदिल आदमी की जाँच करने के लिए सहेलियों से फ़ोन करवा देतीं हैं, इसलिए तमीज़ से बात करने में ही भला है!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सुनील द्वारा दिनांक जून 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हा हा मजेदार वाकये थे !&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Manish द्वारा दिनांक जून 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुँह से बोलते हैं क्या ः)) अच्छा लगा&lt;br /&gt;&lt;b&gt;e-shadow द्वारा दिनांक जून 6th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या ईलाहि, हम ना हुये!!!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;विजय वडनेरे द्वारा दिनांक जून 6th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हा हा हा मज़ेदार लेख है&lt;br /&gt;अब चुटकुला सुनें&lt;br /&gt;पत्नी आधे घंटे तक फोन से लगी रही। पती ने पूछा किसका फोन है? पत्नी ने कहाः रांग नंबर था।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;SHUAIB द्वारा दिनांक जून 7th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्लचस्प वाकिये हैं|&lt;br /&gt;हमारे साथ भी अक्सर ऐसा होता है लेकिन इतनी देर रांग नम्बर को झेलना हमारे बस कि बात नहीं|&lt;br /&gt;&lt;b&gt;rhythums द्वारा दिनांक जून 7th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्लचस्प वाकिये हैं|&lt;br /&gt;हमारे साथ भी अक्सर ऐसा होता है लेकिन इतनी देर रांग नम्बर को झेलना हमारे बस कि बात नहीं|&lt;br /&gt;&lt;b&gt;संगीता मनराल द्वारा दिनांक जून 7th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Very interesting Story,&lt;br /&gt;did electrick Lady called has came after that,&lt;br /&gt;Ab kabhi bhi esa phone aye tu kahena telephone exchange se bool laha ho, apna no bataye&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Rohit द्वारा दिनांक जून 15th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-326354761899234653?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/326354761899234653/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/06/blog-post_05.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/326354761899234653'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/326354761899234653'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/06/blog-post_05.html' title='रांग नंबर'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-8982434149512465382</id><published>2006-06-01T19:18:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T19:55:24.108-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनु‍गुंज'/><title type='text'>अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;बहुत पुरानी बात है, जब हम प्राथमिक स्कूल के छात्र थे। हमारा एक सहपाठी था &lt;b&gt;मुन्नाभाई&lt;/b&gt;!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नाभाई हमारी कक्षा का नेता था, मतलब कि कक्षा कप्तान था। स्कूल के उसके दैनिक कार्यो मे होता था, सुबह सबसे पहले पहुंच कर दरीयों पर कब्जा करना। जी हां आपने सही पढा दरीयों पर कब्जा करना। हमारे स्कूल मे डेस्क बेंच नाम की वस्तुएँ नही हुआ करती थी। १०-१२ फुट लंबी और एक फुट चौडी दरीयां, दरीयां छात्रों की संख्या के हिसाब से उसी तरह कम हुआ करती थी, जिस तरह आई आई टी और आई आई एम की सीटें कम होती है। मुन्नाभाई एक साधारण परिवार से ही था, लेकिन उसके पिताजी सरकारी सेवा मे थे। उसके पास कोई और काम नही होता था,सो स्कूल सबसे पहले पहुँचता था। बाकी जनता का तो ऐसा था पालतू जानवरो को नहला धुला कर, चारा देकर, खेती के मौसम मे खेतो मे कुछ देर काम करने के बाद स्कूल आने का मौका मिल पाता था। जब तक वे पहुंचते ,स्कूल मे दरीयो पर मुन्नाभाई और मित्र मंडली का कब्जा होता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नेतागिरी&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;इसके पश्चात शुरू होती थी उसकी नेतागिरी। हर किसी से कुछ ना कुछ लेने के बाद वह दरीयो मे कुछ हिस्सा आंवटीत कर देता था।अब इस कुछ ना कुछ मे किसी से अमरूद लाने का वादा, किसी से आम का, किसी से मोरपंख लेना, किसी से गृहकार्य करवाना वगैरह वगैरह.. । कुल मिला कर ऐश होती मुन्नाभाई की इस नेतागिरी की वजह से। भारत सरकार की तरह उसने भी दरियो के आंवटन मे एक कोटा निर्धारित किया हुआ था, एक दरी पर वह और उसकी मित्रमडलीं बैठती थी। यह मुन्नाभाई का ऐस वोट बैंक था जो कभी उससे विमुख नही हो सकता था। जिस तरह बिहार और उत्तरप्रदेश मे आपको सत्ता मे रहने के लिये डी पी यादव, मुख्तार अंसारी, शहाबुद्दीन जैसे लोग चाहिये होते है वैसे ही उसने एक दरी दादा किस्म के लडको के लिये आरक्षित रखी थी। लेकिन वह भारत सरकार से एक मामले मे बेहतर था, उसने कुल लडकियो मे से ३३% को आरक्षण दे रखा था, एक दरी लडकियो के उस समुह के लिये आरक्षित होती थी, जिसमे उसकी वो होती थी। बाकी बचती थी एक दरी और बाकी दरीयो पर बची रिक्त जगह जिसके लिये उसी तरह मारामारी होती थी , जिस तरह से अनारक्षित सीटो लिये होती है। मुन्नाभाई का कोई विरोध इसलिये नही करता था क्योंकि वह कक्षा का कप्तान भी हुआ करता था। अपने वोट बैंक (लडकीया और दादाओ) के बदौलत वह हर साल कप्तान चुना जाता था। कुल मिलाकर इस तरह से कोटा और दादागिरी के भरोसे मुन्नाभाई की नेतागिरी चल रही थी।&lt;br /&gt;मुन्नाभाई की तरह से हम स्कूल पहुंचने वालो मे सबसे पहले हुआ करते थे, लेकिन हमे बैठने के लिये मुन्नाभाई जी की मेहरबानीयो पर रहना होता था। वह मुझे ईमानदारी से जगह दे देता था क्योंकि मै उसे&amp;nbsp;परीक्षा&amp;nbsp;मे नकल जो करवाता था। अब हम सौरभ गांगूली तो थे नही कि ग्रेग चैपल से पंगा लेकर टीम से लतिया दिये जाये। अब ऐसा था कि जमिन पर बैठने की बजाये उसकी दादागिरी सहन करो और टीम मे बने रहो, मेरा मतलब है कि दरी पर बैठो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;राजनीति&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हम कक्षा १ से १० तक साथ मे पढे। कक्षा ११ से हम दोनो ने अलग अलग स्कूल मे जाना शुरू किया। पढाई लिखायी तो वो ऐसे भी नही करते थे। उसके पिताजी भी उम्मीद छोड चुके थे। लेकिन मैने नही छोडी थी,मुझे मालूम था कि ये बहुत आगे जायेगा। ये कलयुग है, कलयुग मे आगे बढने के लिये जिन गुणो की जरूरत होती है,वह सभी गुण मुन्नाभाई मे हैं। हर किसी से अपने मतलब का काम निकालना उसे अच्छे से आता था। जिस तरीके से अमरीका ने दूसरे के पैसो पर अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत कर रखी है उसी तरह मुन्नाभाई भी इसकी टोपी उसके सर कर ऐश कर रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्ही दिनो ग्रामपंचायत के चुनाव हुये। जिस तरह कांशीराम ने मायावती को राजनिती मे ले आये थे, उसी तरह तत्कालीन सरपंच ने मुन्नाभाई को भी राजनिती मे खिंच लिया। लेकिन मुन्नाभाई की उम्र चुनाव लढने की नही हुयी थी, उन्होने अपनी माताश्री को चुनाव मे खडा कर दिया। अब भारत मे कोई भी काम हो चाहे चुनाव हो या आई आई एम मे प्रवेश, जाति बताये बिना कार्य थोडे ही होता है ? आपकी योग्यता गयी तेल लेने, सबसे महत्वपूर्ण है आपकी जाति। मुन्नाभाई दलित तो नही लेकिन ओ बी सी जरूर था। विरोधी उम्मीदवार एक सेवानिवृत्त शिक्षक थे, जिसने अपनी सारी जिन्दगी गांव से बुराईयों को दूर करने मे लगायी(बरबाद की) थी। कोई&amp;nbsp;बीमार&amp;nbsp;हो,किसी का स्कूल /कालेज मे प्रवेश हो, कोर्ट कचहरी का काम हो, कोई नयी&amp;nbsp;शासकीय&amp;nbsp;योजना हो, सभी दौडे जाते उनके पास। वे भी बिना किसी स्वार्थ के लोगो का काम करते थे। गांव की शराब की दूकान उन्होने बंद करवाना, झाडफुंक वाले ओझा को गांव से भगाने जैसे समाजिक काम उन्होने किये थे। परंतु उनने ब्राम्हण जाति मे पैदा होने का जुर्म भी किया था। उन्हे विश्वास था कि सारी जिन्दगी के सद्कर्मो का फल उन्हे मिलेगा। वे भी निश्चिंत थे और हम भी। लेकिन चुनाव के एक दिन पहले, मुन्नाभाईजी को अपनी जाति याद आ गयी। रात मे शराब की पेटी भी आ गयी। मास्टर जी हार गये। और मुन्नाभाई ने राजनिती का पहला पाठ पढ लिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नेता&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मुन्नाभाई अपने विकास मार्ग पर अग्रसर था। गांव मे होने वाले हर विकास कार्य मे वह सहकारी होने लगा था। गांव के विकास कम उसका विकास ज्यादा हो रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नाभाईजी बारहवीं मे नकल करते हुये पकड़े गये। अब हुआ ऐसा कि दसवी मे तो मेज़ पर चाकु गडा हुआ था, तो किसी की हिम्मत नही हुयी थी , उसे नकल से रोकने की। एक शिक्षक ने हिम्मत कर कहा भी&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;&amp;nbsp;“भाई सबके सामने नकल तो मत करो ?”&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;मुन्नाभाई गुर्राये&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“ए मास्टर, गांव मे रहना है कि नही ?”&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;लेकिन इस बार&amp;nbsp;परीक्षा&amp;nbsp;बोर्ड का उडन दस्ता आया था, पुलिस बंदोबस्त के साथ। मुन्नाभाई जी २ साल परीक्षा देने से वंचित कर दिये गये। इसके साथ मुन्नाभाई नेता बन गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने गांव छोड़ दिया था, अपनी अभियांत्रीकी के लिये, मुन्नाभाई से कभी कभार मिलना होता रहता था। वह कभी कभार कहता भी था,&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“रास्ते पर एक पत्थर भी फेंको तो किसी कुत्ते की जगह इंजीनियर को लगेगा”।&lt;/blockquote&gt;हम मुस्करा देते थे। वो अपनी राजनीति और पहुंच की बाते करते थे। कोई भी मोर्चा हो या आंदोलन अपने चमचो को लेकर बिना टिकट यात्रा करते, वो भी आरक्षित डिब्बे मे। भाई नेता जो ठहरे, उनका तो आरक्षण जन्मसिद्ध अधिकार है, हर जगह।&amp;nbsp;कभी हम कहते भी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“भाई, गांव के विकास के लिये भी कुछ कर ले यार, कितनी समस्या है गांव मे”&lt;/blockquote&gt;वह कहता&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“अबे गांव के लोग विकास कर लेंगे तो मुझे वोट कौन देगा ? मुझे पहले अपना विकास करना है, विधायक बनना है, बाद मे सांसद बनना है……”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“यार ऐसे मे तुझे अगली बार वोट कौन देगा ?”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“वही जिसने पिछली बार दिया था, देख गांव मे मेरी जाति के लोग ज्यादा है। ऐसे भी मतदान के एक दिन पहले दारू की पेटी खोल दो। दो घुंट लगाने के बाद सब लाइन पर आ जाते है।”&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;वही हुआ अगले चुनाव मे मुन्नाभाई गांव का सरपंच बन गया। एक और खबर मिली की उसने बी एस सी और बी एड(शिक्षा स्नातक) भी कर ली है। कैसे नही मालूम। किसी ने उसे किसी भी कॉलेज जाते नही देखा। एक स्कूल खोल दिया है,जिसके संचालक वही हैं।.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसा रहा सफर ? नेतागिरी,राजनीति से नेता तक का ? टिप्पणी देना ना भुलें !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताज़ा खबर यह है कि अपने मुन्नाभाई इस बार ग्रामपंचायत चुनाव हार गये हैं! लेकिन हमे इसका कोई फायदा नजर नही आरहा है। अर्जुन सिंह भी तो पिछले दो चुनाव हार चुके है , लेकिन केंद्र सरकार मे मानव संसाधन मंत्री है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस हार के बावजूद हमारा पूरा विश्वास है कि एक ना एक दिन नेता मुन्नाभाई अपनी नेतागिरी और राजनीति की बदौलत काफी उपर जायेगा। सुनील पाल उवाच&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“इस देश का हाल ऐसा है कि जो चुनाव जितता है वो एम पी बनता है और जो हारता है वो देश का पी एम बन जाता है”&lt;/blockquote&gt;………………………………………………………………………………………&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नोट :इस लेख के सभी पात्र वास्तविक है, सिर्फ नाम बदल दिये गये है।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;4 टिप्पणीयां “अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आशीष भाई आपने जो लिखा है, शब्दशः सच है। देश को ऐसे हजारों मुन्नाभाई खा रहे हैं। हर गॉव, हर नेता की लगभग यही कहानी है। जो सब जगह से लतियाये गये वो आज नेता हैं और देश का भाग्यनिर्धारण कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;e-shadow द्वारा दिनांक जून 2nd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशीष बहुत सही वास्‍तविक बातें लिखी हैं हों भी क्‍यों नही आखिर वास्‍तविक पात्रों के जो बारे में है। और सही मायने में विषय के छुपे अर्थ को बहुत अच्‍छे ढंग से व्‍यक्‍त किया है। तीनों बातें एक ही वक्‍त में आपस में अलग होकर भी एक-दूसरे से जुड़ी हैं। सबसे पहले लिखने की बधाई भी स्‍वीकार करें।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Tarun द्वारा दिनांक जून 2nd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरातन काल में जब वाल्मिकिजी ने मरा मरा का जाप किया तो रामजी सचमुच सहाय हो गये..&lt;br /&gt;आज कल के सद्पुरूष ताने खा खा कर नेता बन जाते है&lt;br /&gt;&lt;b&gt;nitin द्वारा दिनांक जून 2nd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे भी हाल ही में एक ऐसे ही महानिभाव से परिचय हुआ था। दरअसल राजनीति, और ऐसी कितनी ही बातें हमें पढ़ाई नहीं जातीं। अगर पढ़ाई जाएं, तो फिर कुछ हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रजनीश मंगला द्वारा दिनांक जून 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-8982434149512465382?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/8982434149512465382/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/06/20.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/8982434149512465382'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/8982434149512465382'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/06/20.html' title='अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-3304568457756138753</id><published>2006-05-26T19:27:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T19:43:20.655-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कन्या पुराण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><title type='text'>मेरी कल्लो बेगम</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;१९९७-१९९८, संगणक अभियांत्रीकी का अंतिम वर्ष। इस समय तक हम &lt;b&gt;डेनिस रिची&lt;/b&gt; के परम भक्त बन चुके थे, यशवंत कान्हेटकर हमारे दूसरे देवता थे । ‘&lt;b&gt;सी&lt;/b&gt;’ कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा पर मेरा अच्छा खासा अधिकार हो गया था। मै इस भाषा का उपयोग सामान्य प्रोग्रामिंग के अतिरिक्त ,वायरस बनाने, टी एस आर(टर्मिनेट एंड स्टे रेसीडेन्ट प्रोग्राम), सिस्टम प्रोग्रामिंग के लिये भी करता था। यह वह दौर था जब कंप्यूटर प्रोग्रामिंग मेरे लिये एक दीवानगी बन चुकी थी, मैं गर्व से कहता था ‘&lt;b&gt;कंप्यूटर&lt;/b&gt;’ मेरा पहला प्यार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्ही दिनो मैं एप्टेक मे पार्ट टाईम नौकरी भी कर रहा था। मुझे शाम की दो बैचो को ‘&lt;b&gt;सी&lt;/b&gt;’ पढानी होती थी। अब किस्मत कुछ ऐसी थी कि यहां भी दोनो बैचो मे कन्याओ का प्रतिशत ज्यादा था। दोनो बैच की अधिकांश कन्याये बी एस सी संगणक विज्ञान की छात्राये थी। सामान्यत: प्रोग्रामिंग पढाना एक कठिन कार्य होता है, यह एक ऐसी विधा है, जो पढायी नही जा सकती। ये खुद सीखनी होती है। हमारे पढ़ाने का अंदाज कुछ ऐसा था कि हम यहां भी लोकप्रिय हो गये थे। लोकप्रिय होने का एक कारण ये भी था कि मैं प्रोग्रामिंग के हर पहलू को माईक्रोप्रोसेसर के स्तर तक ले जाकर समझा देता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एप्टेक की प्रयोगशाला मे एक ही काला सफेद मानीटर वाला कंप्यूटर था जिस पर सामान्यतः कोई नही बैठता था। मै उसी पर काम करता था। मेरे उल्टे सीधे प्रोग्राम वही पर चलते थे। मैने इस कंप्यूटर का नाम ‘&lt;b&gt;कल्लो बेग़म&lt;/b&gt;’ दिया हुआ था। सभी को मेरे पहले प्यार और ‘&lt;b&gt;कल्लो बेग़म&lt;/b&gt;’ के बारे मे मालूम था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेर छात्रो मे एक कन्या काफी तेज़ थी, उसे भी '&lt;b&gt;सी&lt;/b&gt;' मे सिस्टम प्रोग्रामिंग अच्छी लगती थी। वह हमेशा मेरे प्रोग्रामों के साथ छेड़छाड़ करती रहती थी। मैं उसे मना नही करता था, क्योंकि मैने भी इसी तरह से सीखा था। उसने इस तरह से ‘&lt;b&gt;सी&lt;/b&gt;’ पर अच्छा खासा अधिकार कर लिया था। जब मैं प्रोग्रामिंग करता रहता था, तो वह भी साथ मे बैठकर देखते रहती थी कि मैं क्या कर रहा हूं। उसे जब भी समय मिलता था, आ जाती थी और खोद खोद कर पूछते रहती थी। मुझे उसके सवालों का जवाब देना अच्छा लगता था क्योंकि कभी कभी उसके जवाबों के लिए मुझे कॉलेज के ग्रंथालय मे घंटो बैठना होता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन उसने मुझसे कहा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;"आप झूठ बोलते हो, आपको ‘कल्लो बेग़म’ से प्यार नही है !”&lt;/blockquote&gt;मैं चकराया&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“किसने कहा ? कल्लो बेग़म के बिना मेरी ज़िदग़ी अधूरी है!”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“तो आपका पासवर्ड “Ihatekallo” क्यों है ?”&lt;/blockquote&gt;उस कन्या ने मेरे एक टी एस आर (जो कीबोर्ड की हर कुंजी को एक फाइल मे रीकार्ड करता था), का दुरुपयोग कर मेरा ही पासवर्ड हैक कर लिया था !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उससे काफी प्रभावित हुआ था। लेकिन मेरी उस कन्या से नज़दीकी का कुछ लोगो ने(मेरे एपटेक के सहयोगियों) ने कुछ और मतलब निकाल लिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दौरान मेरा जुलाई आ गया था, मेरी बी. ई. पूरी हो गयी थी। मेरे पास एक नौकरी का प्रस्ताव था और मुझे १ अगस्त को अपनी नौकरी के लिये मुंबई जाना था। ये सभी को मालुम हो गया था। जुलाई के पहले सप्ताह मे ‘&lt;b&gt;गुरू पुर्णीमा&lt;/b&gt;’ थी। उस कन्या ने मुझे गुरू दक्षिणा मे एक पूस्तक दी थी जिसमे स्वामी विवेकानंद के भाषणो का संग्रह था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन मैं उन लोगो को पढाकर कर बाहर आया तब शुभांगी(मेरी सहयोगी) ने मुझे एक बधाई पत्र ला कर दिया और कहा कि ये स्वागत कक्ष मे रखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने बधाई पत्र खोला । लिखा था&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;I love you !&lt;br /&gt;Miss. You Know very Well&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;मैं चकराया।&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“ये कौन है?”&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;शुभांगी ने कहा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;&amp;nbsp;” इतने भोले मत बनो, आपको सब मालूम है !”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“अरे नही यार मै ऐसे भी एप्टेक मे दिन मे सिर्फ २ घंटे रहता हूं, वह भी पढ़ाते रहता हूं !”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;” लेकिन कुछ ऐसे भी लोग है जो उन दो घंटो मे आपके आसपास ही रहते है|”&lt;/blockquote&gt;बाकी जनता भी उसकी हां मे हां मिलाने लगी। मै उन लोगो का इशारा समझ रहा था। मै उस कन्या को जानता था, वो ‘बोल्ड’ लड़की थी। उसे कुछ कहना होता तो शर्तिया वह सीधे कहती। वह कम से कम “Miss You Know very Well” का उपयोग तो नही करती। उसके पास एक तरिका और भी था, मेरे प्रोग्राम ! वह उनमें छेड़छाड़ तो करती ही थी , वह उसमे अपना संदेश छोड़ सकती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने सोचा “छोडो यार, जो होगा सामने आयेगा!”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन शाम को वो लड़की आयी। वो सामान्य थी। हमेशा की तरह वो शुरू हो गयी अपने प्रश्नों की बौछार लिये। मेरा जो बचा खुचा शक था , वो भी चला गया। मैं थोड़ा असामान्य था जो उसने भांप लिया ।&lt;br /&gt;उसने पूछा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“क्या हुआ सर, कल्लो बेगम नाराज़ है क्या ?”&lt;/blockquote&gt;मैने कहा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;&amp;nbsp;“हां, सोच रहा हूं ,मेरे जाने के बाद उसका क्या होगा ?”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;” सर उसकी चिंता छोडो, भौजाई और बच्चों (मेरे प्रोग्रामों)की देखभाल मैं करते रहूँगी”&lt;/blockquote&gt;मैने चैन की सांस ली, ये कारनामा(बधाई पत्र) किसी और का है ! इस का तो नही वर्ना वह “&lt;b&gt;भौजाई&lt;/b&gt;” तो नही कहती। बाद मे लोगो ने मुझे उकसाने की&amp;nbsp;कोशिश&amp;nbsp;भी की जिसपर मैने ध्यान नही दिया !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३० जुलाई मेरा एप्टेक मे आखिरी दिन, शाम को मैने एप्टेक के सहयोगियों को पार्टी दी । बातों ही बातों मे मैने किसी बात पर कहा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“अभी तक ऐसी&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;कन्या मेरे आसपास नही फटकी है,जो मुझे उल्लु बना सके!”&lt;/blockquote&gt;सोहेल काजी उवाच&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“अरे जाने दो ना, शुभांगी ने तो तुम्हे पिछले&amp;nbsp;महीने&amp;nbsp;भर से उल्लु बना रखा है !”&lt;/blockquote&gt;मेरा ट्युबलाईट जला! मैं शुभांगी की ओर मुडा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“तो ये बधाई पत्र तुम ने लिखा था ?”&lt;/blockquote&gt;वो सिर्फ मुस्करायी ! अब मेरा मुंडा(खोपडा) खिसका ! लेकिन मैने धैर्य नही खोया&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“अरे यार तुमने मेरी मौज़ लेनी थी वो तो ठीक है, लेकिन तुम लोग उस लड़की की ओर इशारे क्यो कर रहे थे ? मैने उससे कुछ कह दिया होता तो ?”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“हम वही तो चाहते थे कि तुम उससे कुछ कहो ! वो तुम्हे पसंद करती है, तुम तो खैर पत्थर दिल हो। तुम तो कुछ करोगे नही। तो सोचा हम ही कुछ मदद कर दें !”&lt;/blockquote&gt;मैने अपना माथा पिट लिया, अब इन्हे कौन समझाये कि एक लडके और लडकी मे निकटता का मतलब प्रेम नही होता । इच्छा तो हो रही थी कि शुभांगी को एक थप्पड रसीद कर दूं। लेकिन मन मार लिया !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी छात्र कन्या HUGES मे है, उसके पास एक Dell का काला कम्प्युटर है, जिसका की बोर्ड, माउस ,मानीटर सब कुछ काला है। वह उसे ‘&lt;b&gt;कल्लो बेगम&lt;/b&gt;’ के नाम से बुलाती है। मेरे पास हर ५ सितंबर शिक्षक दिवस पर उसका बधाई पत्र आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;हमारे अध्यापन के दौरान के हमारे कुछ सुभाषित :&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;१.चलो कंप्युटर देव को जोड घटाना सीखाया जाये !&lt;br /&gt;२.पोईन्टर एक प्रेमिका की तरह होता है। प्रेमिका के साथ यदि कुछ भी होता है तो उसका असर प्रेमी पर होता है।&lt;br /&gt;३.संगणक प्रोग्रामर पास्कल की खूबसूरती से प्यार कर बैठते है लेकिन शादी के लिये ‘सी’ जैसे अख्खड का चयन करते है।(यशवंत कान्हेटकर से चुराया हुआ)।&lt;br /&gt;४.सी++, सी के प्रवाह को कक्षा की चारदिवारी मे बांधने का प्रयास है ! एक अनियंत्रित प्रवाह से नियंत्रीत प्रवाह अच्छा होता है ।&lt;br /&gt;५.सी मे पाईंटर को गुढ रहस्य को ना जाने बगैर प्रोग्रामींग करवाना , बंदर के हाथ मे उस्तरा थमाना है।&lt;br /&gt;***************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;7 टिप्पणीयां “मेरी कल्लो बेगम” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;मज़ा आया कल्लो बेगम से परिचय पाकर&lt;br /&gt;&lt;b&gt;pratyaksha द्वारा दिनांक मई 26th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आषीश, तुम कुछ भी कहो, तुम्हारे बात लिखने से तो अवश्य लगता है कि शायद छोटी सी आशा थी तुम्हारे मन में भी जो किसी बात से होठों तक न आ पायी?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सुनील द्वारा दिनांक मई 26th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आषीश, तुम कुछ भी कहो, तुम्हारे बात लिखने से तो अवश्य लगता है कि शायद छोटी सी आशा थी तुम्हारे मन में भी जो किसी बात से होठों तक न आ पायी?&lt;br /&gt;आपकी बात में दम तो है सुनील जी। &amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक मई 26th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल्लो बेगम के बारे में जान कर खूशी हुई।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;SHUAIB द्वारा दिनांक मई 26th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमित जी, सुनील जी, बात में दम है। आशीष जी, इस बार थप्पड पर नियंत्रण के लिये बधाई।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;e-shadow द्वारा दिनांक मई 27th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमेशा की तरह लाजवाब संस्मरण !&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 28th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाई, तुम कभी कोई ऐसी कहानी भी लिखोगे जिसमें तुम किसी लड़की पर आशिक हुए, कुछ प्यार का इज़हार किया आदि?&lt;br /&gt;वैसे मुझे लगता है कि उस समय भी आपकी ज़िंदगी में कोई लड़की थी। वर्ना किसी लड़की के साथ सामान्य रह पाना कम से कम मेरे बस की बात तो नहीं।&lt;br /&gt;बाकी सब अच्छा है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रजनीश मंगला द्वारा दिनांक जून 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-3304568457756138753?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/3304568457756138753/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post_26.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/3304568457756138753'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/3304568457756138753'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post_26.html' title='मेरी कल्लो बेगम'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-3728109561576074989</id><published>2006-05-22T19:56:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T20:04:25.868-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कन्या पुराण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कालेज'/><title type='text'>मेरी एक मूर्खता</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;पिछली पोष्ट मे मैने कहा था:&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;दूसरे दिन मैने संगणक अभियांत्रीकी मे प्रवेश ले लिया और अपने विज्ञान महाविद्यालय को अलविदा कहा । इस दिन एक ऐसी घटना घटी जिसे मैं आज भी नही भुला पाया हूं। ये एक लंबा किस्सा है फिर कभी…।&lt;/blockquote&gt;ये चिठ्ठा वही किस्सा है….&lt;br /&gt;ये पढने के बाद ये तो शर्तिया है कि आप लोग मुझे कोसना शुरू कर देंगे, कुछ गालीयां देंगे, हो सकता है कि कुछ खतरनाक सी टिप्पणियां भी आयें। वैसे मैं इस प्रतिक्रिया के लिये तैयार भी हुं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन १९९४, उम्र लगभग १७ वर्ष । वही किशोरावस्था और युवावस्था की संधि पर खड़ा मै । मध्यमवर्ग के आदर्शों के बिच पला बढ़ा आसमान को छूने की&amp;nbsp;आकांक्षाओं&amp;nbsp;रखने वाला , थोड़ा गुस्सैल , थोड़ा विद्रोही मन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सपने देखे थे मेडीकल के, अच्छे अंको के बावजूद प्रवेश नही मिल पाया था। निराशा थी पर निराशा से ज्यादा, व्यवस्था पर आक्रोश था। उम्र ही ऐसी थी जो व्यवस्था के अनुसार ढलने की बजाय व्यवस्था को तोड़ने मे विश्वास करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर असफलता एक नयी शुरूवात को जन्म देती है। मैने भी एक नयी शुरूवात का निश्चय कर लिया। चलो मेडीकल ना सही, विज्ञान मे स्नातक(बी एस सी) कर लेते है। पदवी आने के बाद नागरी सेवा का लक्ष्य निर्धारित किया। अब विषय कौन से चुने जायें ? जवाब आसान था ,भौतिकी और गणित मे तो रूचि बचपन से थी,लेकिन रसायन पसंद नही था। इसलिये इलेक्ट्रानिक्स ले लिया । मेडीकल की असफलता के बाद&amp;nbsp;जीव-शास्त्र का तो प्रश्न ही पैदा नही होता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हम ठहरे थोडे पढाकू किस्म के जीव, पहले ही दिन से कक्षाओ मे जाना शुरू । बाकी पढाकूओ से सिर्फ अंतर इतना था कि कक्षा मे हम सामने की बेंचो पर ना बैठकर&amp;nbsp;पीछे&amp;nbsp;बैठते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले ही दिन जब सभी का परिचय हो रहा था, हमने भी अपना परिचय दिया।&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;मैं आशीष हुं, मैं ज़िला परिषद स्कूल आमगांव से हुं और मैने १२ वी मे ९४ % अंक प्राप्त किये है !&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;मैने जैसे ही यह कहा सारी की सारी कक्षा मेरी तरफ देखने लगी, जैसे मै चिडियाघर से छूटा हुवा प्राणी हूं। कक्षा मे फुसफुसाहट शूरू हो गयी, पता नही ये फुसफुसाहटें मेरे सरकारी स्कूल से होने की वजह से थी या एक गांव से होने या मेरे अंकों से या इन सभी से !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कॉलेज जीवन मे नया नया प्रवेश था। एक नया रोमांच था, एक नया माहौल था। लोग पढाई से ज्यादा गपशप, कैण्टीन मे समय गुज़ारते थे। कक्षा से गोल मारकर फ़िल्मे देखना और दूसरे दिन उसकी चर्चा करना। आसपास से गुजरती कन्याओ पर सीटी बजाना, टिप्पणियां करना …………&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे लिये ये सब कुछ नया था। मैं परिवार के साथ एक गांव मे रहता था। रोज़ सुबह साईकिल से ६ किमी आमगांव जाता था, वहां से २४ किमी रेल से गोंदिया कालेज । शाम को इसका उल्टा। पढने के अलावा और कोई धुन नही थी। घर से कालेज , कालेज से घर और इसी मे मस्त। मस्ती का समय , रेल का सफर मे होता था। २० मिनट के सफर मे खूब मजे होते थे। हम लोग टिकट निरिक्षक को देखकर जान बूझकर अपने डिब्बे से दूसरे डिब्बे मे चले जाते थे, वो हमारे&amp;nbsp;पीछे&amp;nbsp;पीछे&amp;nbsp;आता था। उसे पूरी रेल घुमाने के बाद हम उसे अपनी मासिक टिकिट दिखा देते थे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कक्षा मे पढाकू और अनुशासित होने के कारण, थोडे लोकप्रिय हो गये थे, विशेषतः कन्याओ मे। हर काम समय से करने की आदत बचपन से डाल दी गयी थी। स्कूल मे कोई काम समय से ना करने की सबसे ज्यादा सजा मुझे ही मिलती थी। जुमला होता था “&lt;i&gt;एक शिक्षक का पुत्र यदि ऐसा करेगा तो&amp;nbsp;बाकी&amp;nbsp;क्या करेंगे ?&lt;/i&gt;” घर मे सजा दुबारा मिलती थी , बोनस मे। एक आदत हो गयी थी । इसी से कालेज मे हमारे नोट्स और प्रायोगिक पुस्तिका हमेशा पूर्ण रहती थी । रोज कोई ना कोई मेरे नोट्स और प्रायोगिक पुस्तिका नकल करने ले जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन एक खूबसूरत कन्या ने हमारी प्रायोगिक पुस्तिका मांगी। [&lt;i&gt;इस कन्या के पिछे सारी कक्षा के लड़के पडे थे। एक अनार और ४० बीमार।&lt;/i&gt;] मैं एक प्रयोग मे व्यस्त था,शराफत से उसे कहा मेरे बैग से निकाल ले । दूसरे दिन वह पुस्तिका वापिस ले आई। हम फिर से व्यस्त, उसे बैग मे रख देने कहा। मेरी जगह कोई और होता तो उसके हाथो मे पुस्तिका देकर(या लेकर) धन्य हो जाता और सारी की सारी कक्षा को कैंटीन मे चाय और समोसो की पार्टी दे देता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने मे अशोक आया,उसने भी वही वाली प्रायोगिक पुस्तिका मांगी। अशोक हमारी कक्षा मे बी बी सी के नाम से जाना जाता था। यदि आपको कोई खबर कालेज मे फैलानी हो तो आपके पास २ रास्ते है; १. किसी कन्या को बता दो और कह दो कि किसी को ना बताए। २. आप अशोक को बता दो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने उससे भी पुस्तिका बैग से निकाल लेने कहा। और ये मेरी बेवकूफी की शुरूवात थी। अशोक ने पुस्तिका निकाली। पुस्तिका के साथ एक सुगंधित गुलाबी लिफाफा भी निकल आया। अशोक ने लिफाफा देखकर मजमून भांप लिया । पूरी कक्षा मे सभी के सामने ज़ोर ज़ोर से पढना शुरू कर दिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;&lt;i&gt;प्रिय आशीष,&lt;br /&gt;……………………… ……………………….. ………..&lt;br /&gt;मुझे तुमसे प्यार है, मैं तुम्हारे बिना जी नही सकती&lt;br /&gt;………. ………….. ………….. …………………… ………&lt;br /&gt;तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी&lt;br /&gt;………………&lt;/i&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;मेरा चेहरा एकदम लाल हो गया था, कुछ शर्म से कुछ क्रोध से। कक्षा की सारी कन्याये मेरी ओर देख कर मुस्करा रहीं थी जैसे कह रही हो बडे छुपे रूस्तम निकले। लडके मज़े ले रहे थे। ये सब मेरे लिये अजीब सा था। मैने उस कन्या को ढूंढने की कोशिश की। वो कक्षा मे नही थी। मैने अशोक से पत्र छीना और कक्षा से बाहर आया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो कन्या गैलरी से कालेज के बाहर जा रही थी। मैने उसके पिछे जाकर उसे रोका । गुस्से से मेरा दिमाग काम नही कर रहा था। ‘&lt;b&gt;सटाक&lt;/b&gt;’ मैने एक थप्पड उसके चेहरे पर रसीद किया और पत्र फाडकर फेंक दिया । उसके मुंह से निकला&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“तुम मुझे नही चाहते इसका मतलब ये नही कि तुम मुझे अपनी पसंद के इज़हार से रोक सकते हो।”&lt;/blockquote&gt;मै पैर पटकते हुये कॉलेज से निकला और अगली रेल से घर पहुंचा। रास्ते मे दिमाग ठंडा हुआ। मम्मी परेशान ,आज ये जल्दी कैसे आ गया। शाम को पापा ने कहा “&lt;i&gt;कल से अभियांत्रीकी के प्रवेश शुरू हो रहे है, तुम्हारा नाम प्रथम सूची मे है। कल जाकर प्रवेश ले लो।&lt;/i&gt;” दूसरे दिन मैने संगणक अभियांत्रीकी मे प्रवेश ले लिया और अपने विज्ञान महाविद्यालय को अलविदा कहा । वह दिन मेरा उस कालेज मे आखिरी दिन था, वह कन्या भी मुझे उस दिन के बाद कभी नही मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जब मै पिछे मुड़कर देखता हुं तो एक अफसोस होता है कि काश मैने गुस्से को एक दिन के लिये काबू पा लिया होता। उसके प्यार को स्वीकारना या ना स्वीकारना अलग बात थी, लेकिन थप्पड मारना तो किसी भी तरह से सही नही था। उसने सही कहा था,आप किसी को अपनी पसंद के इज़हार से रोक तो नही सकते।&lt;br /&gt;गलती अशोक की थी, उसे पत्र नही पढ़ना चाहिये था। लेकिन मेरा गुस्सा उस लड़की पर निकला। मैं उसे बाद मे प्यार से समझा भी सकता था। नही समझाता तो भी दूसरे दिन तो मैने कालेज ही छोड़ दिया था।&lt;br /&gt;काश……घड़ी की सुईया पिछे की जा सकती…..&lt;br /&gt;***************************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;13 टिप्पणीयां “मेरी एक मूर्खता” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अरे ये क्या किया आशीष भाई, लड़की को चाँटा मार दिया। अगर आपकी जगह मैं होता तो ….&lt;br /&gt;लेकिन भगवान हमेशा ग़लत इंसान को ग़लत चीज़ देता है। मुझे दी फूटी किस्मत और आपको ……&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रतीक पाण्डे द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशीष जी,&lt;br /&gt;मुझे तो बस ये पंक्तियाँ याद आ रही है&lt;br /&gt;“कभी किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता&lt;br /&gt;कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सागर चन्द नाहर द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशीष तुम्हारी सजा यही है कि तुम उसे जिन्दगी भर याद रखोगे।&lt;br /&gt;तुमने उसे भले ही बुरा भला कहा हो, लेकिन यकीन के साथ कह सकता हूँ, तुम्हारे दिल के किसी ना किसी कोने मे उसने घर बना लिया था। अब भी दिल्ली दूर नही, ढूंढना चाहो तो वो मिल सकती है (अपने रवि रतलामी “जिन खोजा तिन पांइया” सर्विस चलाते है।(मेरी वाली को ढूंढ रहे है, तुम्हारी वाली को भी ढूंढ देंगे)&lt;br /&gt;और हाँ, अशोक टाइप के बन्दो से होशियार रहना: ये खुद तो रायता खाते नही, बस फ़ैला देते है।&lt;br /&gt;बकिया चकाचक,&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जीतू द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;:)&lt;br /&gt;जो बीत गई, वो बात गई…भविष्य के लिये शुभकामनाऎं.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;समीर लाल द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुःख हुआ पढकर आशीष भाई। भगवान आपके गुस्से को कम करे।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;e-shadow द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं आपकी मनःस्थिती समझ सकता हूं….. कैसे और क्यों मत पूछो&lt;br /&gt;खैर जो हुआ सो हुआ… वैसे जैसा जीतू जी ने कहा है.. तलाश करवालो..&lt;br /&gt;और मिल जाये तो क्षमा मांग लो.. वैसे बहुत लंबी सजा काट चुके हो….&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नितिन द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुख हुआ पढ कर! जो हुआ सो हुआ. लेखन में तुम्हारी ईमानदारी का और हिम्मत का कायल हूं -अब बीती ताहीं बिसार दे आगे की सुध ले!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ई-स्वामी द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेख पढ़ा अभी-अभी। कन्या अभी भी अनजाने में गाल सहलाती होगी। शायद गाना भी गाती हो:-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘हमसे का भूल भई जो ये सजा हमका मिली’&lt;br /&gt;आगे की मूर्खतायें सुनने का इंतजार है।&lt;br /&gt;आगे की मूर्खतायें सुनने का इंतजार है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये पढने के बाद ये तो शर्तिया है कि आप लोग मुझे कोसना शुरू कर देंगे, कुछ गालीयां देंगे, हो सकता है कि कुछ खतरनाक सी टिप्पणियां भी आयें। वैसे मैं इस प्रतिक्रिया के लिये तैयार भी हुं।&lt;br /&gt;अब क्या कहें। आपको कोसने का क्या फ़ायदा, जो बीत गया समय वह वापस नहीं आ सकता, कोस तो आप अपने आपको स्वयं ही रहे होंगे, हमार कोसने से का होगा!! यह भी ज्ञात है कि क्रोध में व्यक्ति अंधा हो जाता है। बस यही कामना है कि भूतकाल में की गई गलतियाँ आप दोहराएँगे नहीं।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;:( कोसा तो नहीं आपको पर समझ नहीं आया - लड़की को झापड़ । और तो और आपने अपना सन्काय भी बदल लिया । विचित्र किस्सा है । पहले कभी नहीं सुनी ऐसी बात । हाँ एक सुझाव है, कभी वह कन्या मिल जाय तो माफ़ी मान्ग लीजियेगा | मेरे हिसाब सेे बेचारी ने इतनी बडी़ गलती भी नहीं की थी कि उसे ऐसी सज़ा दी जाती |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Nidhi द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाई आशीष, एक बार तो ढूंढना ही चाहिए आपको उन्हें।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;[…] मैने शादी के पहले विद्यार्थी जीवन मे, और शादी के बाद – मुन्ने की मां के विरोध के बावजूद - अनगिनत राते मैदानो मे, खेतों मे, नदी के किनारे बितायीं हैं: कभी पुच्छल तारे को देखने के लिये, कभी लिओनिडस को देखने के लिये, पर अधिकतर आसमान मे तारों को देखने के लिये| मुझे आसमान के तारों को देखना, उनका अध्यन करना हमेशा पसन्द था| पर काश कभी कोई मेरे साथ होती जिससे मै तारों के वर्गीकरण के बारे मे बता पाता| पर क्या मालुम मै भी वही मूर्खता कर बै� ता जो यहां बतायी जा रही है| […]&lt;br /&gt;छुट-पुट » Blog Archive » Oh Be A Fine Girl Kiss Me द्वारा दिनांक मई 24th, 2006&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;are bhai, chaanta maar diya, kuch bhi ho jaata main kisi ladki ko chaanta naa maar paata, vishwaas ho giya kaa paa bahut hi krodhit rahe honge, gussa sach me ek pahadi nadi ke manid hai, ummeed hai ke ab aap waise mijaz nahi rakhte.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;kumar द्वारा दिनांक मई 28th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-3728109561576074989?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/3728109561576074989/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post_22.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/3728109561576074989'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/3728109561576074989'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post_22.html' title='मेरी एक मूर्खता'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-6492072852508204112</id><published>2006-05-19T19:47:00.000-07:00</published><updated>2011-12-07T19:54:57.575-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><title type='text'>मेरे अधूरे सपने</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;सपने, हां सपने तो मैने खूब देखे है, बचपन से लेकर जवानी तक ! सपने देखना कब शुरू किया , याद नही, शायद होश संभालने के साथ ही, सपने देखना शुरू कर दिया था। सपने , खुली आंखों के सपने !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन &lt;b&gt;नंदन ,चंदामामा &lt;/b&gt;और &lt;b&gt;इंद्रजाल कामिक्स&lt;/b&gt; पढ़ते हुये बीता। परिया, जादू की छडी, चमत्कारी शक्तियों और जादू की छडी से सराबोर वो कहानियां ! इन कहानियो के मायाजाल मे लिपटे सपने ! जो यथार्थ के धरातल पर असंभव थे, लेकिन बाल-मन उन्ही सपनों के मग्न रहता था। इसी दौरान दूर-दर्शन पर विक्रम बेताल और सिहांसन बत्तीसी जैसे धारावाहिक भी देखे ! बस सपनों पर एक तिलिस्मी धुंध छा गयी थी। सपने देखा करता था कि बस एक जादू की छडी मिल जाये और दूनिया मेरे कदमों मे ! इस छडी की आवश्यकता उस समय ज्यादा महसूस होती थी जब सर्दियो मे सुबह सुबह उठकर २ किमी दूर पैदल स्कुल जाना होता था । देर से स्कुल पहुंचने पर मास्टरजी &lt;b&gt;मुर्गा &lt;/b&gt;जो बनाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर थोडे बड़े हुये, तिलीस्मी धुंध छटी । धीरे धीरे पता चला परियां, जादू की छडीयां सिर्फ कहानियो मे होती है। हाईस्कूल मे आ गये थे,पापा के ही स्कूल मे पढ़ना शुरू किया । पापा विज्ञान शिक्षक थे, रूचि बदली। अब &lt;b&gt;विज्ञान प्रगति, आविष्कार &lt;/b&gt;और &lt;b&gt;चकमक&lt;/b&gt; ज्यादा पढ़ते थे। नंदन ,चंदामामा भी पढ़ते थे लेकिन यथार्थ के धरातल पर रहकर। इन्ही दिनो &lt;b&gt;स्टार ट्रेक, सिग्मा &lt;/b&gt;और &lt;b&gt;टर्निंग पॊईंट &lt;/b&gt;देखना शूरू किया। बस फिर क्या था , सपना देखा कि बड़े होकर वैज्ञानीक बनेंगे। उन दिनो “&lt;b&gt;विज्ञान प्रगति&lt;/b&gt;” मे सौर मंडल की उत्पत्ती और ग्रहों की जानकारी पर एक श्रंखला प्रकाशित हो रही थी, जिसके लेखक देवेन्द्र मेवाडी थे। स्टार ट्रेक, सिग्मा और विज्ञान-प्रगति ने, अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना दिखा दिया ! उन्ही दिनो डिस्कवरी अंतरिक्ष यान का प्रक्षेपण भी हुआ था। राकेश शर्मा अब मेरे नायक थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्ही दिनो मे गर्मियों मे ननीहाल गया, मेरे नाना जी चित्रकार थे। उनके बनाये चित्र देखे। वहाँ चित्र-कला का भूत चढ़ा। नाना तो थे नही लेकिन मामा थे। उन्होने चित्र-कला की बारीकी सिखाया। बिना किसी स्केल या साधन के पेंसील से सरल रेखा खींचना , ये मेरा पहला पाठ था। वापिस घर आने के बाद कुछ दिनो तक चित्र-कला का भूत सवार रहा, कुछ इनाम भी जीते। ये भूत अभियांत्रीकी के दिनो तक रहा ,उसके बाद छूट सा गया।&lt;br /&gt;दसंवी अच्छे अंकों से पास की। हाईस्कूल पास करने के बाद विज्ञान लेना तय था। मेरा सपना भी था, विज्ञान मे ही आगे बढ़ने का। लेकिन मेरे सपनो मे अब मम्मी पापा के भी सपने थे। पापा की इच्छा मुझे डाक्टर बनाने की थी। सच कहूं तो मेरी इच्छा उस समय पता नही क्या बनने की थी , मुझे आज तक नही&amp;nbsp;मालूम। मेरे सपनो मे अंतरिक्ष यात्री, पायलट, चित्रकार और डाक्टर सभी शामिल थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पापा ने ११ वी मे मुझे भौतिकी, रसायन ,&amp;nbsp;जीव&amp;nbsp;विज्ञान के साथ गणित भी दिलवा दिया था। गणित मेरे खून मे है, मेरे पापा, ताउजी दोनो गणीत मे एम एस सी हैं। मै बिना मेहनत किये इसमे १००% अंक ले लेता था। सिलसिला आगे भी जारी रहा जब मैने बिना किसी विशेष मेहनत के १२ वी मे गणित ने फिर से एक बार शतक लगाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१२ वी का परिणाम आया, अच्छे अंक थे लेकिन इतने अच्छे भी नही थे कि मेडिकल मे प्रवेश दिला सकें। ९४% अंक लाने के बाद मुझे एम बी बी एस मे प्रवेश नही मिल पाया। [मेरा एक मित्र जिसे ४२% अंक थे , उसे प्रवेश मिल गया। ये बात और है कि ३ सत्र लगातार असफल होने के बाद वह मेडीकल कॉलेज छोड़ आया]&lt;br /&gt;मेरा डाक्टर बनने का सपना चकनाचूर हो चुका था। मैने निराशा मे बी एस सी मे भौतिकी , गणित और रसायन विषय लेकर प्रवेश ले लिया । अब मेरा सपना स्नातक हो कर नागरी सेवा (सिविल सर्विस) मे जाने का था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग २ महीनों तक बी एस सी की कक्षा पूरे मन से की। एक दिन शाम को पापा ने कहा कि कल से अभियांत्रिकी के प्रवेश शूरू हो रहे है, तुम्हारा नाम प्रथम सूची मे है। कल जाकर प्रवेश ले लो। मैं चकराया। पापा ने मुझे बताये बिना अभियांत्रिकी मे प्रवेश के लिये अर्जी डाल दी थी। उन्हे मालूम था कि मैं मेडिकल मे प्रवेश ना मिलने से निराश हूं और अभियांत्रिकी प्रवेश के लिये तैयार नही होंउंगा। दो महीने बाद मैं निराशा से उबर चुका था, और अभियांत्रिकी प्रवेश के लिये तैयार था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन मैने संगणक अभियांत्रिकी मे प्रवेश ले लिया और अपने विज्ञान महाविद्यालय को अलविदा कहा । इस दिन एक ऐसी घटना घटी जिसे मै आज भी नही भुला पाया हूं। ये एक लम्बा किस्सा है फिर कभी…।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने संगणक विज्ञान क्यो चुना, यह मैं आज भी नही जानता। यह मेरी सूची मे नही था। वैसे भी १९९४ मे यह वरीयता सूची मे यह रसायन अभियांत्रीकी , यांत्रीकी, इलेक्ट्रानिक, दूर संचार अभियांत्रीकी, विद्युत अभियांत्रीकी आदि के बाद आता था। जब मैं प्रवेश के लिये लिपिक के पास खड़ा था तब मेरे सामने सभी विकल्प थे। लेकिन पता नही क्या हुआ और मैने संगणक अभियांत्रीकी मे प्रवेश ले लिया। मेरे सभी मित्रों को आश्चर्य था। मैने उन दिनो एक लेख पढ़ा था “कम्प्युटर&amp;nbsp;रिवोल्युशन“, शायद ये उसका असर था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभियांत्रीकी प्रवेश के बाद भी मेरा पढ़ना जारी रहा। राहुल सांकृत्यायन को पढा। “&lt;b&gt;वोल्गा से गंगा तक&lt;/b&gt;” ने मुझे काफी प्रभावित किया। राहुल सांकृत्यायन ने मुझे यायावरी का सपना दिखाया ! नागरी सेवा का सपना अपनी जगह था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेलो मे मै क्रिकेट खेलता था, लेकिन सचिन बनने का सपना नही देखा था । कालेज की टीम के एक छ्ठे&amp;nbsp;सातवें&amp;nbsp;क्रमांक के बल्लेबाज को सपने देखना भी नही चाहिये। शतंरज मे भी रूची थी लेकिन एक सीमा तक ही ! कुल मिला कर खेलो की दूनिया मे मैने कोई सपना नही देखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय अपनी रफ्तार से चलता रहा, कालेज के पाठ्यक्रम के साथ और भी बहुत कुछ पढते रहे। अभियांत्रिकी के अंतिम वर्ष मे कुछ ऐसी परिस्थितियां बन गयी कि मुझे एक नौकरी हर हालत मे चाहिये थी। संगणक अभियांत्रिकी का अच्छा समय आ चुका था, ढेर सारी नौकरियाँ थी। अच्छा खासा वेतन था। बिना किसी संघर्ष के नौकरी मिल गयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्दगी के संघर्ष मे कुछ ऐसा फंसा कि नागरी सेवा का सपना, सपना ही रह गया। ऐसे भी मै जो नौकरी कर रहा था वो मुझे पसंद थी। नौकरी छोडकर परिक्षा की तैयारी की हिम्मत नही थी, साथ कुछ आलस भी था। यदि मैने नागरी सेवा की परिक्षा दी होती तो मेरे विषय इतिहास और अर्थशास्त्र होते !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मै सोचता हूं कि मैने इतने सपने देखे(अंतरिक्षयात्री, चित्रकार, वैज्ञानिक,डाक्टर,नागरी सेवा) लेकिन करियर ऐसे क्षेत्र (कम्प्युटर प्रोग्रामिंग) मे बना जिसके बारे मे कभी सोचा ही नही था! लेकिन आज मुझे अपने वर्तमान करियर से पूरी संतुष्टि है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाकी सपने जो अधुरे है, हो सकता है कि भविष्य के गर्भ मे छिपे है, शायद धीरे धीरे पूरे हो जायें । यायावरी का जो सपना था, आज सपना नही है। हर सप्ताह मेरी यायावरी जारी है। काफी घूम चुका हूं देश मे विदेश मे, लेकिन बहुत कुछ बाकी है। एक और छिपा हुआ सपना पढ़ते रहने का जो कभी ना तो रुका था ना रुकेगा ! चित्रकारी के लिये हो सकता है भविष्य मे कभी समय निकल आयें।&lt;br /&gt;मैने जो सपने देखे, कुछ पूरे हुये। कुछ टूटे लेकिन सपने देखना जारी है…..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;आये हो तो आँखों में कुछ देर ठहर जाओ&lt;br /&gt;इक उम्र गुज़रती है ,इक ख़्वाब सजाने में।&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;******************************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;6 टिप्पणीयां “मेरे अधुरे सपने” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आशीष, बहुत अच्छा भी लिखा है और दिल भी लिखा है.&lt;br /&gt;सभी सपने पूरे हो जायें और देखने को सपने ही न रहें, उससे बुरा क्या हो सकता है? जो सपने अभी तक पूरे नहीं हुए वे भविष्य के लिए तुम्हारा इंतजार करेंगे.&lt;br /&gt;मैं सोचता था कि ऐसी जादू की छड़ी हो जिससे मुझे गणित आ जाये, पर मुझे भी गणित नहीं आया, जब तक गणित का विषय रहा, उसमें मुश्किल से ही पास हो पाया. शायद इसी लिए मेरे मन में डाक्टर बनने की छायी कि इसमें गणित नहीं पड़ना पड़ेगा!&lt;br /&gt;पर यह सच है कि जीवन की एक राह चुनो तो अन्य सब राहें छोड़नी ही पड़ती हैं!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सुनील द्वारा दिनांक मई 20th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत ही अच्छा लिखा है। सच में मै खो गया और मजा भी आ गया।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;e-shadow द्वारा दिनांक मई 20th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बढ़िया लिखा,हमेशा की तरह!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 20th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत अच्छा लिखा है, आशिष भाई.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;समीर लाल द्वारा दिनांक मई 21st, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख्वाब सजते रहें,सपने सवंरते रहें&lt;br /&gt;दुआ है आप आगे बड़ते रहें ।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ratna द्वारा दिनांक मई 21st, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत अच्छा&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-6492072852508204112?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/6492072852508204112/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post_19.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/6492072852508204112'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/6492072852508204112'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post_19.html' title='मेरे अधूरे सपने'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-5829250161435440592</id><published>2006-05-11T18:14:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T19:13:39.498-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>एक और रेल यात्रा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;मैं एक घुमक्कड किस्म का व्यक्ति हूं, एक जगह पर रहना पसंद नही आता। यायावरी का ऐसा&amp;nbsp;भूत&amp;nbsp;सर पर सवार है कि तकरीबन हर सप्ताह कही ना कही चला जाता हूं। यायावरी भी ऐसी कि कभी रेल से , कभी बस से, कभी अपनी फटफटिया से । कुछ यात्राये मेरी&amp;nbsp;पूर्व&amp;nbsp;नियोजित होती है जो कि मै रेल से करता हूं लेकिन अधिकांश पूर्व नियोजित नही होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी यात्राये जो&amp;nbsp;पूर्व&amp;nbsp;नियोजित नही होती अच्छी खासी रोमांचक होती है। एन समय पर रेल आरक्षण मिल गया तो&amp;nbsp;ठीक&amp;nbsp;, नही मिला तो बस से, वह भी नही हुआ तो रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा। जी हां रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा ! मेरे अधिकांश दोस्त ये नही मानते कि मै रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा कर सकता हूं। इसके पिछे कारण यह है कि मेरे दोस्त मुझे एक नाजुक किस्म का इंसान समझते है। मेरी इस छवि के लिये मै ही जिम्मेदार हूं। मै घर के बाहर हमेशा बोतलबंद पानी पीता हुं, अच्छे होटल/रेस्तरां (साफ सुथरे) मे खाना/नास्ता करता हूं। खुली&amp;nbsp;चीजें&amp;nbsp;या सडक किनारे नही खाता। मै ऐसा पहले(कालेज के दिनो मे) नही था, हर जगह हर&amp;nbsp;चीज&amp;nbsp;खा लेता था। बिना साफ सफाई की परवाह किये लेकिन कुछ नही होता था, सब कुछ हजम कर जाता था। शायद शरी्र की प्रतिरोधक क्षमता अच्छी थी लेकिन अब ऐसा नही है । अब तो कभी गलती से यहां वहां का पानी पी लिया तो गला खराब हो जाता है, बाहर खाने के बाद पेट खराब हो जाता है। शायद यह सब रहन सहन के इस आधुनिक जीवन अंदाज के कारण है जहां प्रतिरोधक क्षमता दिनोदिन कम होते जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां तो मै कह रहा था कि मै आज भी रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा करने का हैसला रखता हूं। पिछले दिनो मै अपने गृहनगर गोंदिया से दुर्ग अपनी ननीहाल जा रहा था, एक्सप्रेस रेल से कुल २ घन्टे का सफर था। आरक्षण का तो सवाल ही नही था। बैग उठाया और चल दिये। स्टेशन पहुंचे, रेल आयी। देखा तो होश उड गये, अनारक्षित डिब्बे मे पैर रखने जगह नही। याद किया अपने भूतकाल को, जिस तरह सिनेमाहाल मे नयी फिल्म के जारी होने पर&amp;nbsp;भीड़&amp;nbsp;भाड़ मे&amp;nbsp;घुस कर टिकट ले आते थे, वह अनुभव यहां काम आया। ना केवल अंदर घुस गये, बल्कि उपर वाली सीट ( पता नही सीटे होती है या सामान रखने के लिये) पर कब्जा कर लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आप अपनी कल्पना शक्ति के घोडे दौडाइये, इस दृश्य की कल्पना किजीये।&amp;nbsp;मई के महिने की एक गर्म दोपहर, तापमान ४५ से उपर। विदर्भ/छत्तिसगड के पिछ्डे क्षेत्र से गुजरती हुयी रेल का एक अनारक्षित डिब्बा, जिसमे अपनी क्षमता से&amp;nbsp;तीन&amp;nbsp;गुने यात्री सवार है। रेल के चलने के बाद कोलाहाल शांत हो गया है। किसी के हिलने के लिये भी जगह नही है लेकिन सभी शांत है । अधिकांश यात्री&amp;nbsp;मज़दूर&amp;nbsp;या&amp;nbsp;ग्रामीण&amp;nbsp;है, कुछ मध्यमवर्ग के लोग भी है। यात्रीयो के सामान के नाम पर सूटकेस कम, गठरीया और पोटलियां ज्यादा है ! मै टी-शर्ट और ऐसे पैंट मे हूं, जिसके पांयचे घुटनो से निचे अलग कर बरमुडा बना सकते है। पिठ पर एक पिठ्ठू बैग है, साथ मे आई-पोड है और हाथो मे एक अंग्रेजी उपन्यास (”Five Point Someone”)। उपर की सीट पर मै अपनी दूनिया मे मस्त बैठा हुआ हूं, संगीत और उपन्यास मे मग्न, सारी दूनिया से बेखबर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेल अपनी रफ्तार से जा रही थी, मुझे गर्मी महसूस होने लगी थी। सोचा कि चलो अपने पैंट को बरमुडा बना लिया जाये। घुटने पर से चेन खोल कर मैने दोनो पायचे अलग कर दिये और बैग मे रख दिये। इतने मे&amp;nbsp;नीचे&amp;nbsp;से एक हंसी का फव्वारा छुटा मैने&amp;nbsp;नीचे&amp;nbsp;देखा क्या हुआ ? सब मेरी तरफ देख कर हंस रहे थे ! जनता मेरा करामाती पैंट देख के हैरान थी ! एक ग्रामीण ने कहा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“आपका पैंट बढिया है जी, पैंट का पैंट , गर्मी लगी तो हाफ पैंट !” &lt;/blockquote&gt;हंसी का एक और फव्वारा छूटा । इस बार मेरा ठहाका भी शामील था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने मे एक १८-१९ साल का लडके ने कहा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“आप&amp;nbsp;नीचे&amp;nbsp;मेरी जगह पर बैठ जाओ , मै आपकी जगह बैठ जाता हूं।”&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;उसे मेरा उपर बैठना अजिब लग रहा होगा, या सोच रहा होगा पता नही ये बेचारा यहां कहां आकर फंस गया है। उसे मुझ पर दया आ गयी थी, मैने उसका प्रस्ताव&amp;nbsp;स्वीकार&amp;nbsp;कर लिया। मै सोच रहा था कि पढा लिखा होना(दिखना) चलो कहीं तो काम आया !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीचे&amp;nbsp;आकर बैठा रेल “&lt;b&gt;हाजरा प्रपात&lt;/b&gt;” के पास से गुजर रही थी। यह सतपुडा पर्वत श्रंखला की एक&amp;nbsp;प्राग- ऐतिहासिक&amp;nbsp;जगह है जिसकी गुफाओ मे आदिमानव रहा करता था। इस जगह के बारे मे तस्वीरो के साथ पूरा एक चिठ्ठा फीर कभी..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जनता की नजर मेरे आईपोड पर थी।&lt;br /&gt;एक ने पूछ ही लिया&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“ये क्या है जी? टेप रिकारडर है क्या जी ?”&lt;/blockquote&gt;मैने कहा&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“जी, ये टेप रिकार्डर जैसा ही है, लेकिन इसमे कैसेट नही होती है। इसमे ४००० गाने रिकार्ड कर सकते है !”&lt;/blockquote&gt;वह&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“बताओ साला क्या जमाना आ गया है,पहले इत्ता बडा ग्रामोफोन आता था, और इत्ता बडा रेकाड आता था ५-६ गाने वाला। अब इसको देखो माचिस का डिब्बे के अंदर ४००० गाने ”&lt;/blockquote&gt;मै मन मे&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“अबे मेरे आईपॊड को माचिस का डिब्बा बोला, तेरी तो !”&lt;/blockquote&gt;लेकिन सारी जनता फिर से दिल खोल के हंसी, और हम भी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मेरा आईपोड हर कीसी के हाथो से गुजर रहा था, सब उलट पूलट के देख रहे थे। मैने इयरफोन उन लोगो को थमा दिये, और आईपोड के बारे मे बताने लगा ! सभी को आश्चर्य हो रहा था। मै शरारत मे कभी कभी आवाज तेज कर देता था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“चाय गरम !”&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;एक चाय वाला आया। उन लोगो मे से किसी ने चाय ली और एक कप मुझे भी थमा दिया। एक आम&amp;nbsp;भारतीय&amp;nbsp;कितना सरल हृदय होता है, दो मिठे बोल बोल लो और जो चाहे करवा लो। कुछ देर की पहचान और दो मिठे बोल , बदले मे उनके प्यार से भरी वो चाय ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्ग पास आ गया था, मैने अपने पैंट के तुकडे फीर से जोड लिये थे,&amp;nbsp;फिर&amp;nbsp;हंसी का एक और फव्वारा छूटा था !&lt;br /&gt;मै रेल से उतर के चल दिया था, एक और सुहानी याद लिये, जिसमे ना तो मई की गर्मी की तपिस थी, ना सफर की परेशानी, जिसमे थी वही आम&amp;nbsp;भारतीय&amp;nbsp;हृदय की निश्छलता !&lt;br /&gt;***********************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;12 टिप्पणीयां “एक और रेल यात्रा” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;वाह आशीष भाई,&lt;br /&gt;बडा सुहाना सफ़र रहा आपके साथ, वो भी गरमी की दोपहर मे. बहुत रोचक लेखनी होती है आपकी सदा.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;समीर लाल द्वारा दिनांक मई 11th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आनन्‍द आ गया, सच में आम भरतीय जन मानस इतना भोला है तभी तो नेता उन्‍हे इतनी आसानी से बेवकूफ बनाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;e-shadow द्वारा दिनांक मई 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच में जनता डिब्बे में सब को गले लगाती भारतियता दिखती है और a.c first में स्वंय में सिमटी ,गर्दन टेड़ी किए अँग्रेज़ियत ।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ratna द्वारा दिनांक मई 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मज़ा आ गया. ऐसी स्थितियों से अनेकों बार गुजरा हूँ, लेकिन शायद इतना अच्छा वर्णन एक बार भी न कर पाऊँ. धन्यवाद!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Hindi Blogger द्वारा दिनांक मई 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्त, आनंद आ गया आपकी यह पोस्ट पढ़कर। छत्तिसगढ़ की स्मृतियां भी ताज़ा हो गईं।&lt;br /&gt;आशा है आने वाले समय में अन्य संस्मरणों को पढ़ने का आवसर भी प्राप्त होगा।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;आभिनव द्वारा दिनांक मई 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यात्रा विवरण बढिया था !&lt;br /&gt;&lt;b&gt;pratyaksha द्वारा दिनांक मई 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाह आशीष भाई, बढ़िया अनुभव वर्णित किया है। मैंने तो कभी अपने लोअर की टखनों वाली ज़िप खोल उसे बरमुडा नहीं बनाया, अच्छा ही हुआ!!&lt;br /&gt;और वो हाजरा प्रपात वाली तस्वीरों की पोस्ट के बारे में भूलना नहीं, जल्द ही लिखना।&lt;br /&gt;आनन्‍द आ गया, सच में आम भरतीय जन मानस इतना भोला है तभी तो नेता उन्‍हे इतनी आसानी से बेवकूफ बनाते हैं.&lt;br /&gt;अजी आम जनता तो भोली भाली ही होती है, चाहे भारतीय हो या कहीं और की, और कुछ अति स्वार्थी लोग अपने लाभ के लिए उनके साथ खिलवाड़ करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक मई 13th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बढ़िया बयान किया! तुम्हारे सारे लेख बहुत अच्छे लगते हैं। जनता के पास ऐसे-ऐसे धाँसू डायलाग मिलते हैं कि लगता है क्या अभिव्यक्ति क्षमता है! हमारे एक स्टाफ ने एक दिन दूसरे की बुराई करते हुये कहा-साहब,वो तो ससुरा हैंडपंप है,एकफिट ऊपर तो सौ फिट अंदर। समय के संपन्न होने की प्रक्रिया में लोग जनसामान्य से कटने लगते हैं तथा ऐसे तमाम सहज अनुभवों से वंचित होते जाते हैं। बहरहाल बधाई !लिखने के लिये।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 14th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशीष भाई, मैं पूरा लेख पढ़ने से पहले पूछना चाहता हूँ कि आप अक्सर ी तो ि क्यों लिखते हैं। जैसे पिछे, ठिक, चिज़ आदि&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 18th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत अच्छा लिखा है आशीष भाई। आप तो उल्टा भी वैसा ही बिना ग़ल्ती किए लिखते हो&lt;br /&gt;‘मैने अपने पैंट के तुकडे फीर से जोड लिये थे,फीर हंसी का एक और फव्वारा छूटा था !’&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 18th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[…] सांय 5 बजे के करीब मेरे मोबाईल का अलार्म बज उ� ा और मैंने उ� के देखा कि मैं लगभग पाँच घंटे सोया हूँ, इसलिए काफ़ी हद तक तरोताज़ा महसूस कर रहा था। बाकि लोग पहले ही उ� गए थे। तत्पश्चात नीचे गंगा स्नान के लिए जाने का निर्णय हुआ। अब डुबकी लगाने के लिए मैं तैराकी के वस्त्र आदि तो लाया न था, इसलिए जो कपड़े रात को पहने सफ़र किया था, वो ही पहन लिए। जो लोअर पहन रखा था, घुटनों से उसकी ज़िप खोल दो तो वह बरमुडा बन जाता था, � ीक आशीष भाई की पैन्ट की तरह!! तो बस टखने से निचले हिस्से को अलग किया और चल दिए नीचे गंगा स्नान के लिए। […]&lt;br /&gt;&lt;b&gt;world from my eyes - दुनिया मेरी नज़र से!! » ए वीकेन्ड इन � षिकेश - भाग २ द्वारा दिनांक मई 26th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[…] अब रविरतलामी के तथा अन्य दोस्तों के फरमाइशी आदेश ,अमित की हरिद्वार-श्रषिकेश यात्रा विवरण,आशीष के रोचक हाफ पैंट-फुल पैंट विवरण तथा इससे पहले विजय वडनेरे के सिंगापुर विवरण तथा सुनील दीपक जी के इधर-उधर भ्रमण के विवरण ने फिर से हमें अपने यात्रा विवरण लिखने के पानी पर चढ़ाया है। […]&lt;br /&gt;&lt;b&gt;फ़ुरसतिया » अजीब इत्तफाक है… द्वारा दिनांक जून 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-5829250161435440592?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/5829250161435440592/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2011/10/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/5829250161435440592'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/5829250161435440592'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='एक और रेल यात्रा'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-8177134410894115546</id><published>2006-05-09T18:11:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T18:56:23.172-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्य-व्यंग्य'/><title type='text'>अस्पतालो के कुछ विज्ञापन</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;आज का युग विज्ञापन और बाजार का है, इसे सभी मानेंगे. अस्पताल भी अब अपना विज्ञापन दे रहे है । अस्पतालो के कुछ विज्ञापन ऐसे भी हो सकते है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;आईये आईये हमारे अस्पताल मे “&lt;b&gt;बाय-पास&lt;/b&gt;” करवाईये। आपके द्वारा दो बायपास करवाने पर तिसरा मुफ्त ! बायपास के बाद यदि आप अपने संसमरण ना लिखने का वादा करे तो बिल मे १०%&amp;nbsp;छूट।&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;b&gt;प्रतिस्पर्धी अस्पताल की स्कीम :&amp;nbsp;&lt;/b&gt;आईये आईये , हमारे पास से अपना ईलाज करवायीये। अस्पताल मे बिताये दिन पर&amp;nbsp;संस्मरण&amp;nbsp;लिखने के लिये सात दिन की कार्यशाला मुफ्त मे ! आप लिख सकते हैं एक हृदयस्पर्शी लेखमाला “&lt;b&gt;पथरी के दिन&lt;/b&gt;” या “&lt;b&gt;मेरे दिल का दर्द&lt;/b&gt;” !&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;कोई भी शल्यचिकित्सा कराईये, टांके मुफ्त मे ! सुंदरीयो के लिये विशेष योजना, डिजाईनर टांके ! &lt;b&gt;भारत मे पहली बार डिजाईनर टांके !&lt;/b&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&amp;nbsp;आपका बिल ५०,००० से ज्यादा होने पर आप लकी ड्रा के पात्र होंगे। आपका चयन होने पर आप अस्पताल मे ८ दिन बिना मुल्य के रह सकते है ।&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;b&gt;पेशंट गेट ए पेशंट स्कीम :&lt;/b&gt; एक मरीज द्वारा&amp;nbsp;दूसरा&amp;nbsp;मरीज लाने पर बिल मे १०% विशेष छुट !&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;हमारी तरफ से आपको ठिक करने मे कोई कसर नही छोडी जायेगी, दुर्भाग्य से मृत्यु होने पर &lt;b&gt;लकडी मुफ्त&lt;/b&gt; !&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;पुलिस&amp;nbsp;अधिकारी, राजनेता है ? गिरफ्तारी पुर्व जमानत के लिये सबूत नही है ? गिरफ्तारी के बाद होने वाली&amp;nbsp;बिमारियों, जुर्म के अनुसार&amp;nbsp;बिमारियों&amp;nbsp;के लिये विशेष मार्गदर्शन !&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;टी वी&amp;nbsp;इंटरनेट, एसी युक्त रूम । आप यहां बार बार आना चाहेंगे !&amp;nbsp;आजीवन&amp;nbsp;सदस्यता योजना के सदस्य बनिये और भारी छुट का लाभ पायें।&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;div&gt;**************************************&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;4 टिप्पणीयां “अस्पतालो के कुछ विज्ञापन” पर&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हां सही है। कुछ दिन बाद शव यात्रायें भी स्पांसर होंगीं। गोल चौराहे से तिकोने पार्क तक की शव यात्रा स्पांसर्ड बाई नगरनिगम अस्पताल….। इसी तरह के तमाम स्पांसर होंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 9th, 2006&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक विज्ञापन आइडिया हमारी तरफ़ से:&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्या आप गर्भवती है? सेफ़ और सिक्योर डिलीवरी चाहती है: आइये ना फ़लाना नर्सिंग होम, सभी पाँच सितारा सुविधाओं से लैस( नोट:हमारे यहाँ सामने वाले अस्पताल की तरह बच्चे नही बदले जाते)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ये जीवन तो मोह माया है, क्या इससे छुटकारा पाना चाहते है, मिलिए डा झटका से, बीमारी तो बीमारी, जीवन भी शिफ़्ट करवा दें।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक चुटकुला याद आ गया: रेलवे लाइन के आसपास दीवारों पर अक्सर विज्ञापन लिखे होते है: “फ़लाना दवाखाना, हकीम XXYY etc etc ”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक सचमुच मे दीवार पर लिखा हुआ था:&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सेक्स रोगी अकेले मे मिले, डाक्टर मिसेज मालपानी,काम ना होने पर पैसे वापस की गारंटी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बस फिर क्या था, भाई लोगों ने बस सेक्स को “सेक्सी” कर दिया। बदलकर फिर से पढें।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;जीतू द्वारा दिनांक मई 9th, 2006&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जितनी मजेदार पोस्ट, वैसे ही टिप्प्णियां भी.रीड वन, गेट टू फ़्री की तर्ज पर.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;समीर लाल द्वारा दिनांक मई 9th, 2006&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;0% ब्याज वाली फाइनेंश स्कीम भी अस्पताल वाले ला सकते हैं. पङोसी को जलाने के लिए आप भी हमारे यहां महंगा ईलाज करवाईये और भुगतान किजीये आसान किश्तो में. स्क्रेच कार्ड तो अलग से हैं ही.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;संजय बेंगाणी द्वारा दिनांक मई 9th, 2006&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-8177134410894115546?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/8177134410894115546/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post_20.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/8177134410894115546'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/8177134410894115546'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post_20.html' title='अस्पतालो के कुछ विज्ञापन'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-8414097466586443283</id><published>2006-05-08T18:07:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T18:07:49.245-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्य-व्यंग्य'/><title type='text'>फुरसतिया जी की डायरी का एक पन्ना</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“गलती से हमारे हत्थे फुरसतिया जी की डायरी का एक पन्ना लग गया । हमने बिना सेंसर किये हुये इस ज्यों का त्यों छाप दिया है!”&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;रोज़ सुबह भगवान का नाम लेना चाहिये ऐसा बुजुर्ग कहते है। मैं नास्तिक नही हूं लेकिन भगवान की याद किसी और कारण से आती है। भगवान ने हाथ पैर, कान नाक, आँख वगैरह अंग दिये जिसके लिये मैं उनका आभारी हूं । मनुष्य इन सभी का उपयोग(दुरुपयोग) कर खुद का जीवन ज्यादा से ज्यादा सुखी(मतलब आलसी) करने के लिये करता है। लेकिन भगवान ने दाढ़ी ये मनुष्य के मत्थे क्यो मढ़ दी है, समझ मे नही आ रहा है ?&lt;br /&gt;अब कल ही की बात ले लिजिये। सुबह जल्दी सो कर उठने का निश्चय करने के बाद भी उठने मे देर हो गयी। अब उठते साथ “&lt;b&gt;फावडा&lt;/b&gt;” चलाने का मतलब “&lt;b&gt;ए बीग बोअर&lt;/b&gt;”। साथ मे समाचारपत्र भी चाटना होता है। आज भी रोज की तरह टावेल ढूंढने मे समय गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना ही नही रसोई से बम वर्षा हो रही थी&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;” आज गैस लाना भूलना नही!”&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“भैया को फोन करना भूलना नही”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“वापस आते समय सब्जी लाना नही भूलना वर्ना शाम का खाना नही बनेगा”।&lt;/blockquote&gt;दूसरी तरफ रेडियो से गाना बज रहा था “&lt;b&gt;धूम मचा ले धूम&lt;/b&gt;“! अब ऐसे शोर शराबे मे शांति से दाढ़ी बनाना आसान है क्या ?&lt;br /&gt;अंत मे जैसे तैसे दाढ़ी बनाने के सभी आवश्यक चीज़े मैने एक स्टूल पर जमा कर ली थी। पर याद आया कि कल दाढ़ी अच्छे से नही बनी थी, क्योंकि ब्लेड पूरा घिस गया है। अब नया ब्लेड कौन ढूंढे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने मे रसोई से आवाज़ आयी “&lt;b&gt;जल्दी नहा लो, पानी चला जायेगा !&lt;/b&gt;” हमेशा की तरह चेतावनी ! हमेशा की तरह आज भी अनसुनी कर दी !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे केक पर क्रीम लगाते है वैसे चेहरे पर क्रीम लगायी। अब ज़रा स्टाईल से दाढ़ी बनायी जाये सोच कर पहली बार ब्लेड घुमाया कि फोन की घंटी बजी। २ बार रिंग नही बजती कि अंदर से आवाज आयी&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“फोन उठाओ कब से बज रहा है ?”&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;अब इतने सबेरे फोन बजा मतलब कुछ गडबड ! हडबडाहट मे फोन उठाया तो पता चला कि अपने बेरोजगार(स्वरोजगार) मित्र है। शुरू हो गये&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“यार काफी दिन हो गये साथ बैठे हुये,आज शाम का प्लान करते है ! “&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;मै मन मे ही&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;&amp;nbsp;“अबे तुझे ये समय ही मिला था क्या ?”&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;लेकिन जैसे तैसे फोन रखा।&amp;nbsp;इतने मे दाढ़ी बनाने का पानी ठंडा हो गया था और देर होने की लक्षण दिखने लगे थे ! अब जल्दी जल्दी मे&amp;nbsp;दाढ़ी&amp;nbsp;मन से नही होते है। कभी कही कट छील जाता है, तो कभी ब्रश हाथ से छुट जाता है। इतने मे “उन्होने” शब्द-पहेली मे एक सरल सा शब्द पूछा , जो हमे आया नही। उन्होने कुछ ऐसे हमे देखा कि हम शर्म से पानी पानी होगये। सारा का सारा मूड खराब कर दिया ! अब जैसे तैसे बचे हुये समय मे बची हुयी दाढ़ी आडी-तेडी, उल्टी-सीधी दाढ़ी बनायी और कौवा स्नान करने स्नानघर मे घुस गया ! रोजकी तरह निश्चय किया कि कल जल्दी उठकर अच्छी तरह से दाढी बनाउंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आफीस दौड़ते हुये पहुचने पर भी “&lt;b&gt;लेट मार्क&lt;/b&gt;” हो गया, बास जल्दी आ गया था ! ये बास भी ना ! जब भी मै लेट होता हुं जल्दी आ जाता है, जिस दिन समय पर आओ घंटो लेट आता है ! मैने रोज़ की तरह देर से आने का अपना घीसा-पिटा रिकार्ड बजाया, बास ने भी हमेशा की तरह अगले दिन समय पर आने की ताकिद दे दी।&lt;br /&gt;शाम को थक कर घर आया तब बीवी ने (हमेशा की तरह) आंखे छोटी करके चेहरे को घूरा और चेहरा बना लिया !&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;&amp;nbsp;“अब क्या हुआ ?”&lt;/blockquote&gt;पूछा तो जवाब आया&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“ये क्या है, दाढ़ी के खुंटे कितने बढ़े हुये है, तुम्हें दाढ़ी भी ढंग से बनाना नही आती ! हमारी औरतों के जैसे काम तुम लोगो को करने पढ़े तो नानी याद आयेगी !”&lt;/blockquote&gt;बीवी से सहानुभूति की उम्मीद बची नही थी । अब मैं सारा दोष भगवान को देता हूँ, तो इसमे मेरी क्या ग़लती है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*********************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;6 टिप्पणीयां “फुरसतिया जी की डायरी का एक पन्ना” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;कहाँ से हाथ लगा यह पन्ना गुरू? सही आईटम है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अतुल द्वारा दिनांक मई 8th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डायरी जरूर हमारी थी। हम खोज रहे थे कहां खो गयी। लेकिन हम जानकारी के लिये बता दें कि यह लेख हमने जीतेंदर के बारे में लिखा था-उनके तमाम दुखड़े सुनने के बाद। कुछ लेख जो तुमने और हमारी डायरी से उड़ा के अपने ब्लाग में लिख दिये उसके बारे में भी बताना चाहिये थे। सारा का सारा हमारा मसाला उड़ाया हुआ है सिर्फ जीतेंदर की जगह अन्ना&amp;nbsp;लिख दिया है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 8th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा लगा पढकर, हम तक पँहुचाने का धन्यवाद आशीष भाई&lt;br /&gt;&lt;b&gt;e-shadow द्वारा दिनांक मई 9th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे फुरसतिया जी, काहे अपने कर्म हमारे गले बान्ध रहे हो। जब डायरी तुम्हारी है तो है, इसमे इत्ता उखड़ काहे रहे हो। अब मान भी लो, भौजी कुछ नही बोलेगी, हम फुनवा कर देंगे। बकिया कमेन्ट हम समय लिखते ही अपने ब्लॉग पर लिख देंगे, अभी तो रुकावट के लिये खेद है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जीतू द्वारा दिनांक मई 9th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाह आशीष भाई, और भी कुछ चटपटे वाले फ़ुरसतिया जी की डायरी के पन्ने धरे हो क्या? जो भाई साहब संकोच के मारे पोस्ट ना कर पाये हों.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;समीर लाल द्वारा दिनांक मई 9th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोस्ट बढ़िया है पर मामला कुछ समझ में नहीं आया।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-8414097466586443283?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/8414097466586443283/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post_08.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/8414097466586443283'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/8414097466586443283'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post_08.html' title='फुरसतिया जी की डायरी का एक पन्ना'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-361894936507151255</id><published>2006-05-06T17:56:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T18:02:46.462-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कन्या पुराण'/><title type='text'>अथ श्री फटफटिया पूराण</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;फटफटीया लिए हुये पूरे छह महीने गुज़र चुके हैं, लेकिन दिल की सबसे बड़ी तमन्ना अभी तक अधूरी है। कल हम हमेशा की तरह पिछली सीट पर अन्ना को बिठाये हुये कार्यालय से अपने दडबे की ओर जा रहे थे । रास्ता वही&amp;nbsp;पुराना&amp;nbsp;था, शोलींगनल्लुर से&amp;nbsp;पुराने&amp;nbsp;महाबलीपूरम मार्ग द्वारा &lt;b&gt;एन आई एफ टी(राष्ट्रीय फैशन तकनीकी विद्यालय) &lt;/b&gt;के पास से होते हुये अपने दडबे अड्यार तक। रास्ता अच्छा नही है, गड्डो मे सडक ढूंढनी पड़ती है। लेकिन एन आई एफ टी के पास रास्ता खूबसूरत हो जाता है। अजी नही गढ्ढे खत्म नही होते, वे तो अपनी जगह ही रहते है लेकिन सड़कों पर एन आई एफ टी की खूबसूरती उतर आती है । कमर का दर्द आंखों के रास्ते दिल मे उतर आयी खूबसूरती की ठंडक से छूमंतर हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल ऐसे ही हम अपने अलग मूड मे थे, धीरे धीरे चले जा रहे थे। इतने मे सामने जो नज़ारा हमने देखा, आंखों पर भरोसा नही हुआ। ऐसा लगा कि हम सपना देख रहे हैं। फटफटिया और धीमी हो गयी। इतने मे सामने से आ रहे भीमकाय ट्रक ने भोंपू बजाया, तब हमे जा कर विश्वास हुआ कि हम सपना नही देख रहे है, और जो कुछ हम देख रहे है वह माया नही है, यथार्थ है । सामने एक कन्या हमसे लिफ्ट लेने के लिये अंगूठा दिखा रही थी । हम खुश हुये, इच्छा हुयी की फटफटिया खड़ी कर पहले जोरो से&amp;nbsp;बीच&amp;nbsp;सडक मे ही भांगड़ा किया जाये और बाद मे कन्या को लिफ्ट दी जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हाय री हमारी बदकिस्मती, पिछली सीट पर &lt;a href="http://khalipili.blogspot.com/2005/12/blog-post_26.html"&gt;अन्ना &lt;/a&gt;बैठा हुआ था। देर से ही कन्या की नजर अन्ना पर पडी और उसने&amp;nbsp;अंगूठा&amp;nbsp;निचे कर लिया। अब इसमे उस लडकी का दोष नही है, अन्ना को उजाले मे देखने के लिये भी भरपूर रोशनी चाहिये होती है । वैसे मेरा पूरा इरादा तो था ही कि अन्ना को निचे उतार कर उसे बिठा लेने का। लेकिन कन्या अगली फटफटीया को लिफ्ट के लिये&amp;nbsp;अंगूठा&amp;nbsp;दिखा रही थी। हम अपना माथा पिट रहे थे और &lt;b&gt;अन्ना चंद्रकांता वाले क्रूरसिंह की तरह मुस्करा रहा था।&lt;/b&gt; यहां हमारा दिल जल रहा था और वो हमारे जले पर नमक छिडक रहा था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अख्खी जिंदगी मे पहली बार किसी ने लिफ्ट मांगी थी, और काले कलुटे अन्ना के कारण ये मौका भी हाथ से जाता रहा !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर हम मुंह लटकाये हुये अपने रूम पर पहुंचे ! खा-पीकर (पानी) सो गये !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सपने मे नारदजी अवतरित हुये, पूछा “वत्स इतने दूखी क्यों लग रहे हो , अपने दुख का कारण कहो हम उसका निवारण करेंगे”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने अपनी सारी व्यथा कथा कह सुनाई। साथ मे ये भी जोड़ दिया कि पिछले छह महीनों मे नयी फटफटिया लेने के बावजुद किसी कन्या ने हमे लिफ्ट नही मांगी है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारदजी बोले ” हे मूढ बालक , सारी समस्या की जड़ तुम्हारी फटफटीया है, तुमने ऐसी फटफटीया ली है कि जिस पर कोई भी खुबसूरत कन्या बैठना पसंद नही करती है”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम “महाराज आप यह क्या कह रहे है ! हमारी फटफटिया तो सबसे ज्यादा स्टायलिस फटफटिया है ! पांच गियर वाली १८० सी सी की बजाज एवेन्जर है। जब हम इस पर निकलते है,तो लोग मुड़ मुड़ कर देखते है !”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारद जी बोले “वत्स दिखावे पर मत जाओ, अपनी अक्ल लगाओ। हम तुम्हारे दुखो के निवारण के लिये फटफटिया पूराण सुनाते है!”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अथ श्री फटफटिया पूराण&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;फटफटिया यह एक यंत्र चालित द्विचक्री वाहन होता है ! इस वाहन का प्रयोग कलयुग मे अश्व या हाथी के स्थान पर किया जाता है। इस वाहन की महिमा अपरंपार है। अमरीका देश मे यह वाहन विलासीता का प्रतीक है, वहीं भारत देश मे यह मध्यमवर्ग का प्रमुख वाहन है। इस वाहन के प्रयोग के लिये लायसेंस रूपी पत्र की जरूरत होती है। यह आपको सरकारी कार्यालय मे कुछ पत्रपूष्प अर्पण करने के बाद मिल जाता है। यदि आपके कुटुंब मे कोई पुलिस मे या राजनीति मे है तब आप को इस पत्र की कोई आवश्यता नही होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फटफटिया वाहनो को भिन्न भिन्न श्रेणियों मे विभाजित किया जा सकता है। कुछ प्रमुख श्रेणीया इस प्रकार है:-&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पारिवारिक फटफटिया :&lt;/b&gt; इस श्रेणी के वाहन पर पूर्ण परिवार के साथ यात्रा की जा सकती है। इस वाहन की सीट सपाट(समतल) होती है। वाहन चालक की पत्नी पिछली सीट पर अपने दोनो पैर वाहन के एक ओर कर गोद मे बच्चा लिये स्थान ग्रहण करती है। पेट्रोल की टंकी पर दुसरे बच्चे(बच्चों) को बिठाया जाता है। यह वाहन अत्यंत धीमी गति से चलाया जाता है। तेज़ गति से चलाने पर पारिवारिक शांति के भंग होने की सम्भावना होती है। यह भी संभव है कि इस वाहन को तेज़ चलाने से रात मे भोजन की प्राप्त ना हो। यह वाहन शादीशुदा श्रेणी के मानवों मे लोक प्रिय होते है । इस श्रेणी के वाहनो मे प्रमुख है, हीरो होण्डा के सी डी १००, डॊन, बजाज के सभी स्कूटर तथा सी टी १०० इत्यादि.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;महिला मित्र फटफटिया :&lt;/b&gt; इस श्रेणी के वाहन की सीट वाहन चालक के लिये निची और पिछ्ली सीट पर उंची होती है। पिछली सीट पर बैठने वाला हमेशा सामने चालक पर झुका हुआ रहता है। इस श्रेणी के वाहन मे पिछली सीट पर वाहन के एक ओर पैर रख कर बैठना शोभनीय नही होता है, इसे&amp;nbsp;पिछड़े&amp;nbsp;पन की निशानी माना जाता है। इसके गतिरोधक&amp;nbsp;तीव्र&amp;nbsp;होते है, जिनका उपयोग वाहन रोकने के लिये कम, सवारीयों मे निकटता बढ़ाने के लिये ज्यादा किया जाता है। इस तरह के वाहनों की लोकप्रियता नयी पीढ़ी के लोगो मे होती है, कालेज छात्रो इसे ज्यादा पसंद करते है। इस श्रेणी के वाहनों मे प्रमुख है, बजाज पल्सर, हीरो होण्डा की एम्बीशन, ग्लैमर, करीझ्मा इत्यादि.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मस्तमौला फटफटिया:&lt;/b&gt; यह एक अलोकप्रिय श्रेणी का वाहन है। इसमे चालक की सीट और पिछली सीट एकदम अलग होती है।चालक और सवारी सामाजिक प्रेम भावना के विपरीत, एक दूसरे से अलग अलग आराम से बैठ सकते है। इस श्रेणी के वाहनो मे गतिअवरोधक के उपयोग से भी प्रेमभाव नही बढता है। यह वाहन&amp;nbsp;तीव्र&amp;nbsp;गति से चलाया जा सकता है, लेकिन वाहन ईंधन की खपत ज्यादा करने से परिवार और मित्रगण पैसा उड़ाने का आरोप लगाते है। इस श्रेणी के वाहनो मे प्रमुख है, बजाज एवेन्जर, बुलेट थण्डरबर्ड और यामहा एंटाइजर !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हे वत्स इस पुराण का श्रवण करने के पश्चात तुम्हें अपनी ग़लती का अहसास हो गया होगा। इतना कहकर नारद जी अंतर्धान हो गये।&lt;br /&gt;अब हम सोच रहे है कि बजाज एवेन्जर बेचकर हीरो होण्डा की करीझ्मा लेंगे.&lt;br /&gt;**************************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;6 टिप्पणीयां “अथ श्री फटफटिया पूराण” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;“हम खुश हुये, इच्छा हुयी की फटफटिया खड़ी कर पहले जोरो से बिच सडक मे ही भांगड़ा किया जाये और बाद मे कन्या को लिफ्ट दी जाये।”&lt;br /&gt;Excellent! &amp;nbsp;हीरो होन्डा स्लीक बननी बन्द हो गई क्या देस में?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ई-स्वामी द्वारा दिनांक मई 6th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे भाई अन्ना को कोसने के बजाय उसका धन्यवाद दो. यह तो नया तरीका निकाला है जेबकतरों ने, सुंदर लड़कियों को खड़ा कर देते हैं बीच सड़क पर तुम जैसे भोले भाले लड़कों की जेब काटने के लिए. वह तो भला हो अन्ना का जिसने तुम्हे बचा लिया. आगे से बिना अन्ना के फटफटिया मत चलाना क्योकि यह जान कर भी, किसी सुंदर कन्या को देखोगे तो यह बात भूल जाओगे. सुंदर कन्या के सामने दिमाग काम ठीक नहीं करता, और तुम फिर से यही गलती कर सकते हो.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सुनील द्वारा दिनांक मई 7th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों की बातों में आये बिना अपने इरादे पर अमल करो! जो होगा देखा जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 8th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सही राह है, गुजर जाओ.बाद की बाद मे.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;समीर लाल द्वारा दिनांक मई 8th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आशीष भाई, ईमानदारी से कहूँ तो शादी कर लो भाई, पर उसके लिये किसी कन्या को पहले लिफ्ट देनी होगी। और उसके लिये अन्ना को कुछ दिन लेफ्ट-राइट करा दो ना।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;e-shadow द्वारा दिनांक मई 9th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भई मैं आपकी बात से पूर्ण इत्तिफ़ाक नहीं रखता। कारण यह है कि मेरे पास तो “महिला मित्र फ़टफ़टिया” है पर फ़िर भी डेढ़ साल होने को आया, किसी कन्या ने लिफ़्ट नहीं दी(मतलब है नहीं दी)!! दूसरे, मैंने बहुत सी “पारिवारिक फ़टफ़टियाओं” तथा उससे भी निचले दर्जे की फ़टफ़टियाओं(कभी हीरो होन्डा की एस.एस. आई थी) पर खुशनसीबों की लॉटरी निकलते देखा है।&lt;br /&gt;तो अंत पंत तो मैं यही कहूँगा जो कि आम भाषा में ऐसे टैम कहा जाता है, “खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान”!!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक मई 10th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-361894936507151255?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/361894936507151255/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/361894936507151255'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/361894936507151255'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/05/blog-post.html' title='अथ श्री फटफटिया पूराण'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-6886839794821730715</id><published>2006-04-20T17:52:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T17:54:48.705-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><title type='text'>आयुर्विज्ञान और गांधी दर्शन</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;पिछले सप्ताहांत को मैं अपने गृह नगर गोंदिया गया था, हमेशा की तरह द्वितीय श्रेणी शयनयान से। मेरे कुपे मे मेरे अलावा एक तमिळ परिवार था, मम्मी-पापा और एक १६-१७ साल की कन्या।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम के १० बजे रेल-यात्रा शुरू हुयी, मैं कमलेश्वर जी का उपन्यास “&lt;b&gt;कितने पाकिस्तान&lt;/b&gt;” पढ रहा था। पढ़ते पढ़ते सो गया। सुबह जब मैं सो कर उठा, तब देखा कि वह लड़की कुछ पढ रही थी। मैने मुंह हाथ धोने के लिये चला गया। जब वापिस आया तो पाया कि उस लड़की और उसके माता पिता मे किसी बात पर बहस हो रही है। बहस तमिळ मे थी , मेरी समझ मे नही आ रहा था, लेकिन वे लोग गाँधीजी का नाम ले रहे थे। कुल मिलाकर मामला मेरी समझ से बाहर था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय बाद उसके पापा ने मुझसे पूछा कि ये रेल सेवाग्राम मे रूकेगी क्या ? मैने कहा तमिलनाडु एक्सप्रेस सेवाग्राम मे नही रूकती लेकिन कभी कभार असामान्य कारणों से रूक भी जाती है। तब उन्होने मुझे बताया कि उस लड़की का सेवाग्राम के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज मे प्री मेडिकल टेस्ट है इसलिये वे यहां आयें है। अब एक बार बाते शुरू हुयी तो चलती गयीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने मे कन्या ने हाथ मे रखी पुस्तक पटक दी और अपनी मम्मी से कुछ कुनमुनाने लगी। उसकी मम्मी उसे कुछ समझा रही थी। मै थोड़ा असमंजस मे आ गया। उसके पापा ये भाँप गये,उन्होने मुझे बताया कि सेवाग्राम के प्री मेडिकल टेस्ट मे एक प्रश्न पत्र गाँधी दर्शन पर होता है जिसमे ४०% अंक प्राप्त करना अनिवार्य होता है। वह लड़की गांधी दर्शन जैसे नीरस विषय पढ़कर बोर हो रही थी !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी समझ मे नही आया कि आयुर्विज्ञान और गांधी दर्शन का क्या संबंध है ? गांधी दर्शन पर परीक्षा पास करना और उसे जिवन मे अंगीकार करना अलग बाते है। इससे अच्छा तो यह होता कि प्रवेश के बाद आप एक विषय रख दो गांधी दर्शन पर ,लेकिन प्रवेश पात्रता के लिये गांधी दर्शन जानना आवश्यक हो मेरे पल्ले नही पढ रहा था।&lt;br /&gt;लेकिन अब परीक्षा थी तो पढ़ना तो पड़ेगा ही !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पास एक आइडिया आया, मैने उस लड़की से कहा “तुम्हें इसे पढ़ना नीरस लग रहा है,कोई बात नही मैं पढ़ता हूं और तुम्हें सुनाता हूं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो इसके लिये तैयार हो गयी। अब पढना एक चर्चा मे तब्दील हो गयी। मै पुस्तक पढ रहा था, और अपनी टिप्पणियाँ भी देते जा रहा था। उसके मम्मी पापा भी इसमे शामिल हो गये थे। पढायी की पढायी हो रही थी और मेरे लिये समय काटने का एक बेहतरीन ज़रिया भी हो गया था। इस मे ५ घंटे कैसे बीते पता नही चला और नागपुर आ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उसे परीक्षा मे सफलता की शुभकामना देते हुये चल दिया अगली ट्रेन के लिये !&lt;br /&gt;***************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;2 टिप्पणीयां “आयुर्विज्ञान और गांधी दर्शन” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;वाह, अच्छा अनुभव बताया आपने। तो क्या यह आज़माया हुआ नुस्खा है कि नीरस विषय पर चर्चा आरम्भ कर दो तो वह रूचिकर बन जाता है? कई विषयों के बारे में यह सही हो सकता है पर कदाचित् गणित पर यह टोटका काम न करे।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक अप्रैल 21st, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;:&lt;br /&gt;अपनी तो सारी रेलयात्रायें एकदम नीरस ही कटी..!!&lt;br /&gt;एक काश हमारे कुपे में भी कोई कन्या - सुकन्या आती,&lt;br /&gt;भाषा की दीवार होती तो हम गिरा देते…….!!!!&lt;br /&gt;:&lt;br /&gt;&lt;b&gt;विजय वडनेरे द्वारा दिनांक अप्रैल 21st, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-6886839794821730715?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/6886839794821730715/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/04/blog-post_20.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/6886839794821730715'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/6886839794821730715'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/04/blog-post_20.html' title='आयुर्विज्ञान और गांधी दर्शन'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-4970464554021124625</id><published>2006-04-18T17:49:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T17:49:52.849-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कन्या पुराण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><title type='text'>सफल होंगे तेरे प्रयास</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;दरिया किनारे बैठा&lt;br /&gt;कभी उंचे पहाडो पे&lt;br /&gt;विचरता यह मन सोचता है&lt;br /&gt;क्या है तेरी तलाश&lt;br /&gt;क्या है तेरी तलाश&lt;br /&gt;क्या है जो तु खोजता है&lt;br /&gt;भावनाओं से भरा हर क्षण&lt;br /&gt;कभी आशाओ का प्रतिक&lt;br /&gt;कभी निराशाओ से भरा मन&lt;br /&gt;फिरता है ये चंचल&lt;br /&gt;उस समय के ईंतजार मे&lt;br /&gt;जब मिलेगी तुझे तेरी मंजील&lt;br /&gt;होगा तेरे जिवन मे भी प्रकाश&lt;br /&gt;सामना कर इन कठीनाईयो का&lt;br /&gt;रख अपने पर विश्वास&lt;br /&gt;ये ही नियम है संसार का&lt;br /&gt;कि पतझड के बाद ही आता है&lt;br /&gt;मौसम बहार का&lt;br /&gt;और यही है उसकी रीत&lt;br /&gt;कि हार के बाद आती है जीत&lt;br /&gt;ए मन ! रख सिर्फ ये अहसास&lt;br /&gt;कि तुझमे है आत्म विश्वास&lt;br /&gt;इसलिये सफल होंगे तेरे प्रयास&lt;/blockquote&gt;&amp;nbsp;इस सप्ताहांत पर मै अपने घर “गोण्दिया” महाराष्ट्र मे था। अपनी पूरानी डायरीयां और कागजात देख रहा था। अचानक एक&amp;nbsp;कागज़&amp;nbsp;बाहर आ गीरा जिसपर यह कविता लिखी थी।&lt;br /&gt;कविता तो मेरी एक मित्र ने लिखी थी, यह तो मुझे अच्छी तरह से याद है। लेकिन मेरे पास यह कविता क्या कर रही है, समझ मे नही आया। सोचा चलो अपने चिठ्ठे पर डाल दो, कभी वह भटकते हुये आ जाये, तो रहस्य खुल जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*********************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;3 टिप्पणीयां “सफल होंगे तेरे प्रयास” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपके दोस्त की कविता पसंद आई. अच्छा लिखा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;समीर लाल द्वारा दिनांक अप्रैल 18th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता कह रही होगी हमारा जन्म सफल हुआ हम दुबारा पढ़े गये।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अप्रैल 18th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;SAhi hai baap. U have kept that Kavita habbit still alive. Wk numer. All the best. Ye site kisme banaye hai?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Sandeep द्वारा दिनांक मई 8th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-4970464554021124625?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/4970464554021124625/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/04/blog-post_18.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/4970464554021124625'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/4970464554021124625'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/04/blog-post_18.html' title='सफल होंगे तेरे प्रयास'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-4258163752718540397</id><published>2006-04-13T17:45:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T17:46:13.058-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सामायिकी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><title type='text'>आरक्षण : आर्थिक आधार पर क्यों होना चाहिये ?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;आज एक अच्छी खासी बहस छिडी हुयी है आरक्षण पर। हर कोई अपने अपने तर्क-कुतर्क दिये जा रहा है। लेकिन क्या किसी ने अपने तर्को तथ्यो और आकंडो से प्रमाणीत करने की कोशीश की है ? पक्ष या विपक्ष मे जितने भी तर्क दिये जा रहे है वह वैज्ञानिक/सांख्यकिक तथ्यो पर आधारीत ना हो कर भावनाओ पर आधारीत है।&lt;br /&gt;जैसा कि आप जानते है , आरक्षण सिर्फ और सिर्फ १० सालो के लिये लागु किया गया था। अब यह आरक्षण ५७ वर्षो से चला आ रहा है। क्या किसी समाज विज्ञानी ने इस आरक्षण व्यवस्था का परिणाम जानने की कोशीश की है ? यहां पर हम समाज विज्ञानी या किसी अर्थशाश्त्री द्वारा किये गये शोध की बात कर रहे जो कि किसी भी पक्षपात से दूर हो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहस की शुरूवात के लिये क्या हमे सभी शिक्षण संस्थानो से जो कि अभी २२.५ % आरक्षण दे रहे है से छात्रो के सामाजिक और आर्थीक प्रोफाईल के आधार पर आंकडे प्राप्त कर सकते हैं ? कितने एस सी या एस टी छात्र कालेज मे है ? कितने छात्र ऐसे है जिनकी परिवार की वार्षिक आय एक लाख रूपये से कम है ? कितने छात्र ग्रामीण है कितने शहरी है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सभी आंकडे उपलब्ध है, लेकिन इन आंकडो का उल्लेख अपने तर्को मे कोई नही कर रहा है ! एक अच्छा, सामयिक और प्रामाणिक शोध इस पुस्तक मे उपलब्ध है ‘’&lt;a href="http://www.rawatbooks.com/ShowDetails.ASP?BookID=1681"&gt;Reservation and Private Sector: Quest for Equal Opportunity and Growth’&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;त्रुटीपूर्ण आंकडो का मायाजाल&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरक्षण पर आधारीत सारी बहस इस (कु)तर्क पर आधारीत है कि भारत की जनसंख्या का ५२% भाग “ओ बी सी” है। ईंडियन एक्स्प्रेस मे एक लेख “&lt;a href="http://www.indianexpress.com/story/1991.html"&gt;ABC of OBC&lt;/a&gt;” के अनुसार&amp;nbsp;&lt;a href="http://www.pucl.org/from-archives/Dalit-tribal/mandal-2.htm"&gt;११ श्रेणीयो&lt;/a&gt; का उपयोग करने के बाद , आयोग ने ३७४३ जातियो को “&lt;b&gt;ओ बी सी&lt;/b&gt;” पाया । सन १९३१ के बाद जातिगत आधार पर जनसंख्या के आंकडे उपलब्ध नही होने से आयोग ने उन्ही आंकडो का प्रयोग कर “ऒ बी सी” की जनगणना की। इस तरह से हिन्दू और गैर हिन्दू “ओ बी सी” की जनसंख्या कुल जनसंख्या का ५२ % निर्धारित की गयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सब मेरी समझ से बाहर है ! ६० साल से ज्यादा पूराने आंकडो का प्रयोग इतना महत्वपूर्ण निर्णय लेने मे कैसे किया जा सकता है ? और जब इस तरह से निर्णय लेना था तब १९९१ या २००१ मे जातिगत आधार पर जनगणना क्यों नही की गयी ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.censusindia.net/results/C_Series/c_series_tables_2001.html"&gt;२००१ की जनगणना&lt;/a&gt; के आंकडो से उम्र, लिंग, धर्म , वैवाहिक स्थीती,&amp;nbsp;शैक्षिक&amp;nbsp;स्थिती और विकलांगता की जान्कारी प्राप्त की जा सकती है। लेकिन जातिगत आधार पर सिर्फ SC/ST के ही आंकडे है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर एक और संस्थान है। “&lt;a href="http://ncbc.nic.in/"&gt;National Commission for Backward Classes&lt;/a&gt;” ध्यान दे यहां पर CLASS शब्द का उपयोग किया गया है, CASTE का नही। वर्ग का मतलब जाति नही होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;NCBC पिछ्डे वर्गो को परिभाषीत करने के लिये एक नयी परिभाषा का प्रयोग कर सकता था। (उदाहरण के लिये कच्चे मकान मे रह रहा परिवार, भूमीहीन, पिने की पानी की अनुप्लब्धता = १, जाति व्यवस्था से दूर) लेकिन नही, उन्होने विशेष जातियो को पिछडे वर्गो मे परिभाषीत करना जारी रखा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;NCBC के आंकडो मे से &lt;a href="http://ncbc.nic.in/backward-classes/gujarat.htm"&gt;गुजरात की जातिसूची&lt;/a&gt; को देखें| यदि मैने ठीक समझा है तो ठाकुर, नायक, पूरी, और गोस्वामी पिछडे वर्गो मे आते है ! इस सूची को तैयार करने के लिये क्या NCBC ने जनगणना की तरह पूरी विशाल प्रक्रिया दोहरायी है ? इसमे कितना विज्ञान है और कितनी राजनिती ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जे एन यू के प्रोफेसर प्रदिप्त चौधरी के इस विषय की जटीलता को रेखांकित करने वाले&lt;a href="http://www.india-seminar.com/2005/549/549%20pradipta%20chaudhury.htm"&gt; इस शोधपत्र &lt;/a&gt;को देखें। यह निरीक्षण इस सदी की शुरूवात का नही पिछली सदी की शूरूवात का है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“सोनार, हलवाई और कलवार इन तिन ओ बी सी जातियो की साक्षरता की दर राजपूत, टागा, भट और कन्डू इन अगडी जातियो से काफी ज्यादा है। उसी तरह से आर्थीक आधार पर ओ बी सी की पांच जातिया सोनार, जाट, गुज्जर, किसान और माली अगडी जातियो राजपूत और ब्राम्हण जो कि हिन्दू जनसंख्या का पांचवा भाग है से बेहतर है । दो SC जातियां खटीक और दूसाध मे साक्षरता दर अधिकतर ओ बी सी जातियो से ज्यादा है।”&lt;/blockquote&gt;लेखक ने अंत मे लिखा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“२० वी सदी की शूरूवात मे उत्तर प्रदेश जैसे पिछ्डे इलाको मे भी, साक्षरता दर और आर्थीक स्थीती मे जातिगत आधार पर काफी असमानता थी। उंची जातिया का मतलब अधिक साक्षरता या आर्थीक संपन्नता नही था। उसी तरह निची जातिया जैसे गुज्जर, सोनार,किसान,और माली आर्थीक रूप से संपन्न थी।&lt;br /&gt;जाति ने पिछडी जातियो को आर्थिक आधार पर बढने के मार्ग पर कोई अवरोध नही खडा किया था। ५००० साल तक शिक्षण परंपरा के बाद भी उत्तर प्रदेश की ब्राम्हण जनसंख्या मे १९११ तक साक्षरता दर १२% थी; जो कि सबसे ज्यादा शिक्षीत जाति समझी जाती है।”&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;मै चाहता हु कि &lt;a href="http://www.jnu.ac.in/Academics/Schools/SchoolOfSocialSciences/EconomicFacultyProfile.htm"&gt;इन जैसे विद्वान जो तथ्य आधारीत तर्क &lt;/a&gt;देते है भावनात्मक नही को टी वी शो मे बहस के लिये आमण्त्रीत किया जाना चाहिये।&lt;br /&gt;लेकिन तथ्य एक अच्छा टी वी शो नही बना सकते जो कि भावनात्मक ड्रामे बाजी से बनता है। प्रदीप्त चौधरी ने लिखा है&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“जातिगत राजनिती के पक्षधर कहते है कि OBC और SC पिछ्डेपन के मानक पर क्रम से रख कर पिछडा, अति पिछडा जैसे वर्गो मे विभाजीत किया जाये। आरक्षण के कुल कोटे मे हर वर्ग के लिये कोटा निर्धारित किया जाये। यह सभी समस्याओ का हल है।&lt;br /&gt;लेकिन एक जाति के मे भी परिवारो की आर्थीक स्थीतियो मे काफी विचलन है, दूसरे शब्दो मे काफी असमानता है। एक जाति मे भी काफी सारे आर्थीक वर्ग है।”&lt;br /&gt;छोटे भूमी वाले किसान या छोटे व्यव्सायी, भूमीहिन मजदूर हर जाति का एक बडा भाग है। उसी तरह हर जाति आर्थीक रूप से संपन्न , छोटा या बडा एक वर्ग है।&lt;br /&gt;क्या पिछडी जाति के सभी लोग शैक्षणीक या आर्थीक रूप से विकलांग है ? सही मायनो मे पिछ्डी जातियो मे भी एक अच्छा खासा विभाजन या वर्गीकरण है। इस पिछ्डी जातियो मे भी अंतर्जातिय सामाजिक और आर्थीक भेदभाव है। पिछडी जातियो मे भी आर्थिक रूप से संपन्न परिवार अगडी जातियो की परंपराओ की नकल करते है, जैसे बाल विवाह, विधवा पूनर्विवाह का विरोध , दहेज इत्यादि”&lt;/blockquote&gt;अब आप खुद सोचिये जातिगत बिभाजन कितना तर्क संगत है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा भविष्य कैसा होना चाहिये ? जाति व्यवस्था पर विभाजित भारत या पिछ्डे वर्गो के उत्थान मे लगा भारत ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की नयी पिढी के लिये जाति अर्थहिन होना चाहिये। लेकिन आज वह फिर से सबके सिर चढकर बोल रहा है। और इस व्यवस्था मे भारत का पहले ही काफी नुकसान कर दिया है । अब और नही । जाति अब मुद्दा नही होना चाहिये !&lt;br /&gt;***************************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;4 टिप्पणीयां “आरक्षण : आर्थिक आधार पर क्यों होना चाहिये ?” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;गम्भीर विषय पर एक अच्छा गम्भीर लेख.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;sanjay | joglikhi द्वारा दिनांक अप्रैल 13th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बढ़िया लिखे हो आशीष भाई। समस्या होती है तब जब नेता लोग वोट बटोरने के लिए इन तथाकथित पिछड़ी जातियों को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं और ये लोग भी बड़े समझदार होते हैं, आखिर अपना भला होता किसे अच्छा नहीं लगता!! आरक्षण का अर्थ इनके लिए बिना मेहनत किए मेहनती लोगों को अंगूठा दिखा के सफ़लता प्राप्त करना मात्र रह गया है। यह समस्या तब तक नहीं सुलझती जब तक प्रशासन को ज्ञान प्राप्त नहीं होता!!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक अप्रैल 14th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्जुन सिन्ह ऐक हारा हुआ ईन्सान है सोनिया का पालतू है। पिछले दस सालो मे ऐक चुनाव नही जीत सका। जिन्दगी भर जमकर किया कुकाम और बुढापे मे हुआ जुकाम। चुरहट लाटरी हो या भोपाल गैस कान्ड या फिर हो सीधी मे चुनाव मे गडबड, ईनके पाप का ठीकरा कब फूटेगा भगवान&lt;br /&gt;&lt;b&gt;raj द्वारा दिनांक अप्रैल 18th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सरकारी अफसर का बेटा (ST Class का ), जो कभी पहले मेरे क्लास में कभी पहले १० में भी नही था Engineering Entrance Exam के जरिये अच्छे college admission मिल गया, वहीं के गरीब ब्राह्मन का बेटा Exam ही नही दे पाया क्यों कि उसके पास fees के लिये पैसे नही थे। आप इसे क्या कहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पंकज कुमार द्वारा दिनांक अप्रैल 28th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-4258163752718540397?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/4258163752718540397/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/04/blog-post_13.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/4258163752718540397'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/4258163752718540397'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/04/blog-post_13.html' title='आरक्षण : आर्थिक आधार पर क्यों होना चाहिये ?'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-2905156155137245505</id><published>2006-04-12T17:29:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T17:36:07.713-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सामायिकी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><title type='text'>आधुनिक अर्जुन की ज्ञान प्राप्ति</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक अर्जून कुरूक्षेत्र मे निराश बैठे थे। अर्जुन ने अपनी युवावस्था मे अनेको युध्द लडे थे और&amp;nbsp;जीते&amp;nbsp;थे। जिवन के संध्याकाल मे उनका पराक्रम चुक गया था और ये हालत हो गयी थी की महारथी अर्जुन को एक पैदल भी हरा देता था। महाराजा के दरबार मे उनकी पहले जैसी इज्जत नही बची थी, लोग अब उनकी उम्र का लिहाज कर चुप रहते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक अर्जुन ने एक सपना देखा था, धर्मराज को उनका खोया राज्य दिलाने का नही, अपने लिये चक्रवर्ती राज्य प्राप्त करने का। इसके लिये उन्होने अथक परिश्रम भी किया था, अपने छोटे से राज्य का बलीदान कर वह हस्तिनापूर नगर मे आये थे। यह बात और है कि जिसे वह अपनी राज्य की बागडोर सौंप कर आये थे, वह उनसे बडा महारथी दिगविजयी साबीत हुआ और उसने उनकी वापसी के रास्ते बंद कर दिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्जुन के सत्ता प्राप्ति के मार्ग मे अनेक अवरोध थे, उनके पास जब सबसे पहले महाराजा की कुर्सी प्राप्त करने का अवसर आया, तब उन्होने पाया &lt;b&gt;मौनीबाबा &lt;/b&gt;नामक महारथी ने उनहे टंगडी मारकर सत्ता प्राप्त कर ली। अर्जुन निराश नही हुये, उन्होने अपने प्रयत्न जारी रखे। उनकी पूरी कोशीश रही की मौनी बाबा का राज मे प्रजा संतुष्ट ना रहे। इतना ही नही उन्होने मौनीबाबा के मंत्रीयो की भी आलोचना जारी रखी, उनकी नितीयो को जनविरोधी बता कर असतोंष की चिंगारी फैलायी । महारथी अर्जुन का मौनीबाबा को एक साधु समझना भारी साबित हुआ, मौनी बाबा ने अपना रूद्र रूप दिखाकर उन्हे अपने राज्य से निर्वासीत कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौनीबाबा की राज्य के अवसान के बाद जब महारथी अर्जुन के सामने महाराजा बनने का अगला अवसर दिखायी दिया, वे एक पैदल सैनीक से मात खा गये। उनका सपना फिर से अधुरा रह गया। महारथी अर्जुन निराश हो चुके थे। एक साधारण सा राज्य का सेवक महाराजा बन चुका था, और महारथी अर्जुन भिष्म पितामह की तरह महाराजा की कुर्सी की सेवा करने से बंधे हुये थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी दूरावस्था पर अर्जुन क्रंदन कर रहे थे, तब एक आकाशवाणी हुयी।&amp;nbsp;अर्जुन&amp;nbsp;ने आंखे खोल कर देखा सामने जग के स्वामी पार्थसारथी खडे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पार्थसारथी उवाच&lt;/b&gt; ” हे पार्थ, तुम्हारे जैस महारथी योद्धा को ऐसे क्रंदन करना शोभा नही देता। तुम अपने दुखो का वर्णन करो , हम उसका निवारण करेंगे”&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अर्जुन उवाच&lt;/b&gt; “हे विश्वनाथ आप तो जग के स्वामी है। आपको हमारे कष्टो का ज्ञान है। पिछ्ले युद्ध मे जित मे हमारा योगदान नगण्य था, जिस कारण हमारी हालत दयनिय हो गयी है। हमारी स्थिती गली के कुत्ते से गयी&amp;nbsp;गुज़री&amp;nbsp;हो गयी है, जिस पर तो कोई भी पत्थर मार जाता है। मुझे तो कोई भी उस लायक नही समझता ।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पार्थसारथी उवाच&lt;/b&gt; “हे पार्थ , तुम्हे निराश होने की जरूरत नही है। तुम अपना खोया हुवा वैभव प्राप्त कर सकते हो।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अर्जुन उवाच&lt;/b&gt; “हे स्वामी मुझे इसके लिये क्या करना होगा?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पार्थसारथी उवाच&lt;/b&gt; “तुम्हारी दूरावस्था का कारण है कि वर्तमान महाराज के शाशन मे प्रगती हो रही है. विकास दर बढ रही है। पार्थ, तुम्हे संकंट मोचक बनना होगा।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अर्जुन उवाच&lt;/b&gt; “हे विश्वानाथ मै संकट्मोचक कैसे बन सकता हूं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पार्थसारथी मुस्कराये और कहा&lt;/b&gt; ” इसके लिये सबसे पहले जरूरी है संकट पैदा करना|”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अर्जुन&amp;nbsp;उवाच&amp;nbsp;&lt;/b&gt;” हे भगवन मै आपका मंतव्य नही समझा।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पार्थसारथी उवाच &lt;/b&gt;“हे पार्थ तुमने इतिहास से कुछ नही सीखा है। कुछ वर्षो पहले एक फतेहगढ राज्य के एक राजा थे,&amp;nbsp;जिन्होनें&amp;nbsp;तत्कालीन हस्तिनापूर के महाराजा राजीव का सिंहासन पलट दिया था। तदोपरांत वह खुद उस सिहांसन पर आसीन हुये थे। जब उनका खुद का सिंहासन एक सहयोगी राजा की रथयात्रा से डोलने लगा था तब उन्होने मंडल रूपी समाज विघटक अस्त्र चलाया था।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अर्जुन&amp;nbsp;उवाच&amp;nbsp;&lt;/b&gt;” लेकिन भगवन उस अस्त्र के कारण अनेको युवा जलकर मर गये थे।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पार्थसारथी उवाच&lt;/b&gt; “अर्जुन तुम कर्म करो फल की चिन्ता मत करो। लोगो को&amp;nbsp;जीवन&amp;nbsp;मै देता हूं, लोगो का&amp;nbsp;जीवन&amp;nbsp;मै लेता हूं, तुम तो एक निमित्त मात्र हो। तुम्हे याद होगा कि उस अस्त्र के चलाने के बाद तत्कालिन महाराज ने कुछ नही किया था।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अर्जुन&amp;nbsp;उवाच&lt;/b&gt; “लेकिन महाराज इस शस्त्र का प्रयोग किया जा चुका है,&amp;nbsp;शासन&amp;nbsp;की नौकरीयो मे जातिगत वैमन्श्य फैल चुका है।&amp;nbsp;शासन&amp;nbsp;मे अब प्रतिभा की कद्र नही होती है।&amp;nbsp;शासन&amp;nbsp;मे उन्नति के लिये अब जाति विशेष के होना ही आवश्यक है किसी प्रतिभा को होना नही।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पार्थसारथी उवाच&lt;/b&gt; “हे पार्थ तुम मे दूरदृष्टी का अभाव है। अभी भी काफी सारे ऐसे क्षेत्र है, जंहा प्रतिभा का सम्मान किया जाता है। जंहा जातिगत वैमन्श्य नही है। तुम्हे हर ऐसे क्षेत्र का चुनाव करना होगा जंहा पर समानता और उन्नति मे भेदभाव नही होता है। हर ऐसी जगह पर तुम्हे मडंल अस्त्र का प्रयोग करना होगा।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अर्जुन&amp;nbsp;उवाच&lt;/b&gt; ” लेकिन भगवन ऐसे क्षेत्र तो राज्य की शान है, कुछ क्षेत्रो से अलौकीक प्रतिभाये निकलती है, कुछ क्षेत्र&amp;nbsp;शासन&amp;nbsp;की उन्नती के लिए विदेशी मुद्रा का प्रंबध करते है, यह वह क्षेत्र है जिन पर सारा राज्य गर्व करता है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पार्थसारथी उवाच&lt;/b&gt; ” हे अर्जुन गर्व पतन का कारण है। उसे तुम्हे नष्ट करना होगा। अर्जुन तुम अपने लक्ष्य पर ध्यान दो, बाकि सब मिथ्या है, माया है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अर्जुन&amp;nbsp;उवाच&amp;nbsp;&lt;/b&gt;” भगवन मै ऐसा ही कंरूंगा। भगवन क्या आप मुझे कुछ ऐसे क्षेत्र का वर्णन दे सकते है, जंहा मै इस शस्त्र का प्रयोग कर सकता हूं?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पार्थसारथी उवाच&lt;/b&gt; “तुम अपने युद्ध की आरंभ आई आई टी और आई आई एम से करो। उसके बाद निजी क्षेत्र पर संधान करो। चित्रपट सृष्टी मे भी आजकल प्रतिभा का सम्मान होता है जो कि प्रगतिशील समाज के लिये अपमान है। तुम्हारा अगला निशाना वह होना चाहिये। इसके बाद सशस्त्र सेना है। अर्जुन लक्ष्य की कमी नही है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;और आगे क्या हुवा आप सब जानते है।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;********************************************************&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;4 टिप्पणीयां “आधुनिक अर्जुन की ज्ञान प्राप्ति” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आशीष भाई&lt;br /&gt;बहुत जबरदस्त व्यंग और सुंदर लेखनी के लिये बहुत बधाई।&lt;br /&gt;वर्णन और बहाव ने समा बांध दिया।&lt;br /&gt;समीर लाल&lt;br /&gt;&lt;b&gt;समीर लाल द्वारा दिनांक अप्रैल 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ा बढ़िया लेख लिखा।बधाई!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अप्रैल 12th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छींटे और बौछारें » आरक्षण - वैचारिक संघर्ष द्वारा दिनांक अप्रैल 15th, 2006&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बढ़िया।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रजनीश मंगला द्वारा दिनांक अप्रैल 30th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-2905156155137245505?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/2905156155137245505/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/04/blog-post_12.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/2905156155137245505'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/2905156155137245505'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/04/blog-post_12.html' title='आधुनिक अर्जुन की ज्ञान प्राप्ति'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-1306217859114149777</id><published>2006-04-10T17:22:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T17:28:10.004-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चेतन भगत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुस्तक समीक्षा'/><title type='text'>पुस्तक समीक्षा : वन नाईट एट काल सेंटर</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: #71828a; color: #333333; font-family: Verdana; font-size: 12px; line-height: 16px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="padding-bottom: 15px; padding-left: 15px; padding-right: 15px; padding-top: 15px;"&gt;&lt;br /&gt;आज ही चेतन भगत की “&lt;b&gt;वन नाईट एट काल सेंटर&lt;/b&gt;” खत्म की।&lt;br /&gt;पढने के बाद समझ मे आया कि यह उपन्यास “&lt;b&gt;इंडियन एक्स्प्रेस&lt;/b&gt;” की लोकप्रिय पुस्तको मे पिछ्ले तीन महिनो से क्रमांक एक पर क्यो हैं। चेतन भगत के लिखने का तरीका बेहतरीन है, कथा मे एक निरंतरता और उत्सुकता बनी रहती है। यही निरंतरता और उत्सुकता उपन्यास की जान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहानी एक कुछ ऐसे नौजवानो ( २ युवक और ३ युवतीयां) की है, जो एक “&lt;b&gt;काल सेंटर&lt;/b&gt;” मे काम करते है। पूरा कथानक एक रात का है जो शाम से शूरू होकर सुबह खत्म हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कथानक काल सेंटर से जुडा है, जबकि मै सुचना&amp;nbsp;तकनीकी&amp;nbsp;क्षेत्र मे कार्यरत हूं। दोनो क्षेत्रो के वातावरण मे जमीन आसमान का अंतर है,लेकिन ना जाने मुझे इसके सारे के सारे पात्र अपने आसपास के ही लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपन्यास की शूरूवात कुछ ऐसी है कि लेखक को अपनी एक रेलयात्रा मे एक युवती मिलती है। वह युवती लेखक को यह कहानी इस शर्त पर सुनाती है कि वह इस कहानीको उपन्यास के रूप मे प्रकाशीत करवायेगा। एक अजीब सी शर्त लेकिन लेखक इसे मान लेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कहानी के प्रमुख पात्र है &lt;b&gt;श्याम, प्रियकां,व्रूम, राधिका, इशा,मिलट्री अंकल और खलनायक मैनेजर ‘बक्शी’&lt;/b&gt;। सभी के अपने अपने सपने है, और अपनी अपनी&amp;nbsp;परेशानियाँ। लेकिन सब मे एक समानता है, सभी किसी ना किसी तरह से विद्रोही है ,लेकिन अपना आत्मविश्वास खो चुके है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी की रात मे घटनाये कुछ इस तरह से घटना शूरू होती है कि सबकी जिंदगीयो मे तुफान आना शूरू हो जाता है । सबके सपने एक के बाद एक टूटने लगते है, एक&amp;nbsp;उथलपुथल&amp;nbsp;सी मच जाती है। सभी की जिदंगी के सूत्र इस तरह से उलझ जाते है जिसे सुलझाना कठीन हो जाता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने मे कहानी के पात्रो को एक फोन काल आती है ,“&lt;b&gt;भगवान&lt;/b&gt;” से। जी नही , भगवान&amp;nbsp;किसी&amp;nbsp;पात्र का नाम नही है, यह वही ईश्वर, अल्लाह , गाड है। भगवान उन्हे अपनी मुसीबतो से निकलने का रास्ता बताते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक ने कहानी का तानाबाना काफी अच्छा बुना है। सभी पात्र और घटनायें कहानी के चरमोत्कर्ष से पहले तक स्वभाविक लगती है। लेकिन भगवान के द्वारा फोन सारे उपन्यास को एक&amp;nbsp;नाटकीय&amp;nbsp;मोड दे देता है, और आगे का सारा का सारा कथानक&amp;nbsp;नाटकीय&amp;nbsp;हो जाता है। मेरी राय मे यही इस उपन्यास की सबसे बडी कमजोरी है । अंत मे लेखक ने “&lt;b&gt;भगवान के फोन&lt;/b&gt;”की अवश्यकता को सही ठहराने की कोशीश जरूर की है,जो तर्क संगत नही लगती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपन्यास की एक बात जो सबसे ज्यादा चुभने वाली लगी वह यह कि आज भी पता नही क्यों काल सेंटर मे नौकरी को एक&amp;nbsp;सम्माननीय&amp;nbsp;दॄष्टी से नही देखा जाता है । मेरे कुछ अभियंता(इंजीनियर&amp;nbsp; दोस्त है जो आज भी ५-६ हजार रूपयो की नौकरी कर रहे है, वह भी दिन और और रात की पालियो मे। जब मै इन्हे काल सेंटर की नौकरी की सलाह देता हूं, नाक भौ सिकोड्ना शूरू कर देते है, जबकि इस काल सेंटर की नौकरी मे कम से कम १०-१५ हजार&amp;nbsp;महीने&amp;nbsp;के आसानी से मिल जाते है और काम सिर्फ ८ घंटे का होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक ने युवावर्ग को उपदेश देने का प्रयास किया है । आत्म विश्वास को वे सफलता की कुंजी बताते है, साथ मे वे ये बताना नही भुलते की नयी शुरूवात करने कभी भी देर नही होती है। युवा वर्ग या जो अपने करियर से संघर्ष कर रहे है, इसे जरूर पढना चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर उपन्यास पठनिय है। उपन्यास मे कुछ “&lt;b&gt;एक लाईना&lt;/b&gt;” है जो हंसाते है और गुदगुदाते है।&lt;br /&gt;मेरी पसंद का एक लाईना&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;“Girls handbags have enough to make a survival kit for Antarctica.”&lt;/blockquote&gt;उपन्यास का खलनायक बख्सी भी मैनेजर है, जो हमेशा “&lt;b&gt;मैनेजमेंट गुरूओ&lt;/b&gt;” के कोट देते रहता है। हर बात को समझाने के लिये ग्राफ या आकृतीयां बनाता है, यह सब मै आज से बंद करने जा रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****************************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;6 टिप्पणीयां “पुस्तक समीक्षा : वन नाईट एट काल सेंटर” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;इनकी इसके पहले वाली पुस्तक ‘Five point someone: what not to do at IIT’ भी बहुत अच्छी है|&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Unmukt द्वारा दिनांक अप्रैल 10th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजा आया ना। मै तो पहले से ही कह रहा था, झकास है। अभी पिछली बार इन्डिया गया था(दिसम्बर में) तब यूं ही बुक स्टाल पर उलटते पलटते किताब ले ली। लेकिन किताब पढने के बात तो मै चेतन भगत का मुरीद हो गया। पिछली किताब भी ढूंढ रहा हूँ, यहाँ कुवैत मे नही मिल रही।वो भी सुना है बहुत झकास थी, आई आई टी स्टूडेन्ट्स के ऊपर थी।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जीतू द्वारा दिनांक अप्रैल 10th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस ऊपन्यास के बारे में इस बार के विश्व पुस्तक मेले में बहुत सुना था, पर बेपर की हाईप समझ कोई भाव न दिया था। लगता है कि अब पढ़कर देखना होगा कि यह कैसा है!!&lt;br /&gt;और चिट्ठे का प्रकरण बदलकर बहुत अच्छा किया, वह पुराना प्रकरण अब बोरिंग लगने लगा था!!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक अप्रैल 11th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बढ़िया !&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अप्रैल 11th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता हैं अब तो यह किताब पढनी ही पङेगी. मैने भी काफी सुना था इसके बारे में, लेकिन अंग्रेजी साहित्य को सिडनी-सेल्डन के उपन्यासों से आगे कभी पढा ही नहीं (अपना अंग्रेजी-ज्ञान ही इतना हैं &amp;nbsp;)&lt;br /&gt;&lt;b&gt;sanjay | joglikhi द्वारा दिनांक अप्रैल 11th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नया ब्लोग-आवरण अच्छा हैं.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;sanjay | joglikhi द्वारा दिनांक अप्रैल 11th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-1306217859114149777?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/1306217859114149777/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/04/blog-post_10.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/1306217859114149777'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/1306217859114149777'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/04/blog-post_10.html' title='पुस्तक समीक्षा : वन नाईट एट काल सेंटर'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-1974088976411791722</id><published>2006-04-04T17:06:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T17:21:32.098-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनु‍गुंज'/><title type='text'>मेरे जीवन पर धर्म का प्रभाव</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;इस विषयपर लिखने के लिये मूझे किसी चेतावनी या नोटीस देने की जरूरत नही है। धर्म पर लिखा गयी कोई भी लेख आपत्तिजनक नही हो सकता है। यदि वह लेख धर्म मानने वालो को आपत्तीजनक लगता है, इसका अर्थ यह है लेखक और पाठक दोनो मे से किसी एक को या दोनो को धर्म की जानकारी नही है। अज्ञान की कोई सजा नही होती है।&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;मेरे जिवन पर धर्म का क्या प्रभाव है, इस विषय पर मेरे अलावा भी मेरे आसपास के हर&amp;nbsp;क़रीबी&amp;nbsp;व्यक्ति का भी अलग मत हो सकता है। मेरे मित्र मुझे नास्तिक मानते है। मेरे परिवार के व्यक्ति&amp;nbsp;मुझे&amp;nbsp;नास्तिक तो नही लेकिन आडंबरो से दूर रहने वाला मानते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्म क्या होता है ? मेरे लिये इसकी परिभाषा क्या है ? मेरा धर्म क्या है ? ये सब ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर आगे&amp;nbsp;बढ़ने&amp;nbsp;से पहले देना आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मेरा धर्म क्या है ?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;इसे मेरे धर्म की महानता कही जाये या विडंबना मेरे धर्म का कोई नाम ही नही है ! काका कालेलकर ने अपने ग्रंथ “&lt;b&gt;समन्वय संस्कृति की ओर&lt;/b&gt;'’ में धर्म का सुन्दर विश्लेषण किया है। वे लिखते हैं कि धर्म शब्द का वही अर्थ नहीं है, जो पश्चिम में रिलीजन का माना जाता है। धर्म का अर्थ है न्यायपूर्ण ढंग से काम करना। वे कहते हैं कि धर्म या धम्म एशिया की सांस्कृतिक विरासत का मर्म है। एक स्थान पर इन्होंने लिखा है- “हम कहने लगे `&lt;b&gt;सनातन धर्म&lt;/b&gt;’ और परदेशी लोगों ने इसको नाम दिया ’&lt;b&gt;हिन्दू धर्म'&lt;/b&gt;’ (पृ. ९)। हिन्दू एक फ़ारसी शब्द है। ऋग्वेद में कई बार सप्त सिन्धु का उल्लेख मिलता है–वो भूमि जहाँ आर्य सबसे पहले बसे थे । संस्कृत में सिन्धु शब्द के दो मुख्य अर्थ हैं–पहला, सिन्धु नदी क नाम और दूसरा, कोई भी नदी या जलराशि । आर्य भाषाओं की [ स ] ध्वनि ईरानी भाषाओं की [ ह ] ध्वनि में लगभग हमेशा बदल जाती है (ऐसा भाषाविदों का मानना है) । इसलिये सप्त सिन्धु अवेस्तन भाषा (पारसियों की धर्मभाषा) मे जाकर हप्त हिन्दु मे परिवर्तित हो गया । इसके बाद ईरानियों ने सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दु नाम दिया । जब अरब मुसल्मान सुल्तान भारत में शासन करने लगे, तो उन्होने भारत के मूल धर्मावलम्बियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया । इस देश का दुर्भाग्य है कि हमने परदेशियों के द्वारा दिये गए नाम को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा धर्म रीलीजन या मजहब का पर्यायवाची शब्द नही है, मेरा धर्म एक&amp;nbsp;जीवन&amp;nbsp;पद्धति&amp;nbsp;है, एक विचारधारा है । मेरे धर्म की स्थापना&amp;nbsp;किसी&amp;nbsp;ने नही की है, ना यह किसी विशेष समय से प्रारंभ हुआ है। मेरा धर्म सनातन है, और युगो युगो से चला आ रहा है। यह एक विशाल नदी के प्रवाह की भांति है जिसमे ना जाने कितने पंथ, परपंराये, मान्यताये मिलती गयी है। भारत में एक के बाद एक न जाने कितने सम्प्रदायों का उदय हुआ और उन्होंने वैदिक(सनातन/हिन्दू) धर्म को जड़ से हिला दिया ;&amp;nbsp;परन्तु&amp;nbsp;भयंकर भूकम्प के समय समुद्रतट का जल पिछे हट जाता है, कुछ समय पश्चात् हजार गुना बलशाली होकर सुनामी के रूप मे सर्वग्रासी आप्लावन के रूप में पुनः लौट आता है ;उसी तरह जब यह सारा कोलाहल शान्त हो गया, तब इन समस्त धर्म-सम्प्रदायों को उनकी धर्ममाता ( सनातन धर्म ) की विराट् काया ने आत्मसात् कर अपने में विलीन् कर लिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये वह धर्म है जिसकामूल मन्त्र है अपना ध्यान रखते हुए दूसरों का भी ध्यान रखना - “&lt;b&gt;आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्&lt;/b&gt;'’। इसका महत्त्वपूर्ण तत्त्व विश्वभावना है। “&lt;b&gt;आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति&lt;/b&gt;'’ और “&lt;b&gt;वसुधैव कुटुम्बकम्&lt;/b&gt;'’ इसकी शिक्षा है। &lt;b&gt;स्वामी विवेकांनद ने कहा था कि मुझे ऐसे धर्म मे जन्म लेने का गर्व है जो ये दावा नही करता कि वह सर्वश्रेष्ठ् है।&lt;/b&gt; गीता मे कृष्ण कहते है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;‘प्रत्येक धर्म में मैं , मोती की माला में सूत्र की तरह पिरोया हुआ हूँ ।’ — गीता ॥७.७॥&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;‘जहाँ भी तुम्हें मानवसृष्टि को उन्नत बनानेवाली और पावन करनेवाली अतिशय पवित्रता और असाधारण शक्ति दिखाई दे, तो जान लो कि वह मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुआ हैं ।’ –गीता ॥१०.४१॥&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;व्यास कहते हैं,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;‘हमारी जाति और सम्प्रदाय की सीमा के बाहर भी पूर्णत्व तक पहुँचे हुए मनुष्य हैं ।’ –वेदान्तसूत्र ॥३.४.३६॥&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;सनातन धर्म वेदों पर आधारीत है। वेद अनादि और अनन्त हैं। सम्भव हैं, यब बात हास्यास्पद लगे कि कोई पुस्तक अनादि और अनन्त कैसे हो सकती हैं । किन्तु वेदों का अर्थ कोई पुस्तक हैं ही नहीं । वेदों का अर्थ हैं , भिन्न भिन्न कालों में भिन्न भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष । ये वेद किसी भगवान की पूजा या स्तुती नही करते हैं। वेद प्राकृतिक शक्तियो की स्तुति करते है। प्राकृतिक शक्तियो की अवहेलना का परिणाम आज सुनामी या विश्वव्यापी तापमान वृद्धी (ग्लोबल वार्मींग) के रूप मे आज सामने आ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेद हमें यह सिखाते हैं कि सृष्टि का न आदि हैं न अन्त । बिग बैंग का सिद्धांत&amp;nbsp;यही&amp;nbsp;कहता है कि&amp;nbsp;ब्रह्मांड&amp;nbsp;एक बिन्दू के रूप मे था जो एक महाविस्फोट के बाद आज के इस रूप मे आया है। यह एक सीमा तक विस्तारित होने के बाद सकुंचित होना शूरू हो जायेगा। अंत मे वापिस एक बिन्दू के रूप मे बदल जायेगा । यह एक संकुचन और विस्तार का अन्तहिन चक्र है ! स्टीफन हांकिस की “&lt;b&gt;ए ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाईम&lt;/b&gt;” पढे, उन्होने यही सभी कथनो को अनुमोदित किया है।&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं&lt;br /&gt;अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था&lt;br /&gt;छिपा था क्या कहाँ, किसने देखा था&lt;br /&gt;उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था&lt;br /&gt;सृष्टि का कौन है कर्ता कर्ता है यह वा अकर्ता&lt;br /&gt;ऊंचे आसमान में रहता सदा अध्यक्ष बना रहता&lt;br /&gt;वही सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता&lt;br /&gt;हैं किसी को नहीं पता नहीं है पता&lt;/blockquote&gt;सनातन धर्म पर यह आरोप लगता है कि इसमे ना जाने कितने देवी देवता है। यही तो मेरे धर्म की महानता है हर किसी को अपने आप मे आत्मसात कर लेने की। शिव एक प्रमुख हिन्दू देवता माने जाते है लेकिन यह भी एक तथ्य है कि हिन्दू(सनातन /वैदिक) धर्म मे शिव का प्रवेश आर्य और द्रविड&amp;nbsp;संस्कृति&amp;nbsp;के मिलाप के पश्चात हुआ है। यही होता गया और नये नये देवी देवता सनातन धर्म मे आते गये और देवता बढते गये । यह वह धर्म है जिसने हर जाति , हर समुदाय, हर व्यवसाय विशेष के देवी-देवता को जगह दी है। जिसे जिस देव को मानना है माने, किसी देव को मानने या ना मानने की कोई बंदिश नही है। लेकिन इस के&amp;nbsp;दुरुपयोग&amp;nbsp;भी हुये है जैसे एक चलचित्र मे कल्पित देवी “&lt;b&gt;संतोषी माता&lt;/b&gt;” को भी भगवान बना दिया । लेकिन इसमे मेरे धर्म का क्या दोष ? ये तो उसके मानने वालो को दोष है/था जो जान बुझकर आंख मूंद्कर पडों के&amp;nbsp;पीछे&amp;nbsp;चल रहे है ! अंधविश्वास धर्म का दोष नही है , मानने वालो का है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुर्तीपूजा पर ये आरोप लगते है कि जो पत्थर का भगवान खुद की रक्षा नही कर सकता वह दूनिया की रक्षा कैसे करेगा । सनातन धर्म मूर्तिपूजक नही था वह तो प्रकृतिपूजक था लेकिन सनातन धर्म ने मूर्तिपूजा को भी स्वीकार किया। कोई हिन्दू यदि आराधना के समय बाह्य प्रतीक का उपयोग करता हैं ; वह आपको बतलाएगा कि यह बाह्य प्रतीक उसके मन को ध्यान के विषय परमेश्वर में एकाग्रता से स्थिर रखने में सहायता देता हैं ।(मै यहां पूजा/घंटा बजाना/आरती आदि आडंबरो की बात नही कर रहा हूं।) वह भी यह बात उतनी ही अच्छी तरह से जानता हैं, जितना आप जानते हैं कि वह मूर्ति न तो ईश्वर ही हैं और न सर्वव्यापी ही । क्या ईश्वर का भी कोई परिमाण हैं ? यदि नहीं, तो जिस समय हम सर्वव्यापी शब्द का उच्चारण करते हैं , उस समय विस्तृत आकाश या देश की ही कल्पना करने के सिवा हम और क्या करते हैं ? अपनी मानसिक सरंचना के नियमानुसार, हमें किसी प्रकार अपनी अनन्तता की भावना को नील आकाश या अपार समुद्र की कल्पना से सम्बद्ध करना पड़ता हैं; उसी तरह हम पवित्रता के भाव को अपने स्वभावनुसार गिरजाघर या मसजिद या क्रूस से जोड़ लेते हैं । हम पवित्रता, नित्यत्व, सर्वव्यापित्व आदि आदि भावों का सम्बन्ध विभिन्न मूर्तियों और रूपों से जोड़ते हैं ? मूर्तियाँ, मन्दिर , गिरजाघर या ग्रन्थ तो धर्मजीवन में केवल सहायकमात्र हैं । लेकिन मूर्तिपूजा जो आज की जाती है वह प्राचिन मुर्तिपूजा का विकृत रूप है । मुर्ति जो एक प्रतिक मात्र हुआ करती थी, उसे भगवान बना दिया गया हौ। और यह तो किसी ने भी नही कहा है कि आपको मुर्तिपूजा करनी चाहिये ? आर्यसमाज मुर्तिपूजा का विरोधी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मेरा धर्म क्या नही है?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;मंदिरों&amp;nbsp;मे जाकर घंटे बजाकर&amp;nbsp;चीख&amp;nbsp;चीख&amp;nbsp;कर आरती करने वाला धर्म मेरा नही है। मेरा ईश्वर सर्व शक्तिमान है, जो इस सृष्टी का संचालन कर रहा है। उसे किसी पूजा या आराधना की आवश्यकता नही है। जब वह सर्वशक्तिमान है तो वह जानता है मुझे क्या चाहिये ! मेरे लिये जो भी उचित होगा वह मुझे देगा।मुझे जरूरत है अपने कर्मो की। “&lt;b&gt;कर्म करो फल की चिन्ता ना करो&lt;/b&gt;“। मेरे कर्म यदि फल प्राप्ति के योग्य है तो वह मुझे मिलेगा ही, इसके लिये किसी पूजा, आराधना या आरती की आवश्यकता नही है। उसे किसी रिश्वत(चढावे) की जरूरत नही है। मंदिरो मे मुर्ति की स्थापना का उद्देश्य यह नही था कि घण्टे&amp;nbsp;घड़ियाल&amp;nbsp;बजाकर पूजा की जाये। वह तो शांत वातावरण मे साधना करने के लिये बनाये गये थे,जितने भी तिर्थस्थल है या माने हुये मंदिर है सभी दूर्गम या पहाडी लेकिन मनोरम और शांत स्थल पर&amp;nbsp;स्थित&amp;nbsp;है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे&amp;nbsp;ईश्वर&amp;nbsp;को किसी मंदिर की आवश्यकता नही है, वह सर्वव्यापी है। गालिब ने कितना सही कहा था&lt;br /&gt;&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;मत पी शराब गालिब मस्जिद मे बैठकर , तो मुझे वह जगह बता दे जहां खुदा ना हो|&lt;/blockquote&gt;मेरा धर्म जाति/छुवा-छुत नही मानता। राम ने शबरी के बेर खाये थे, वानरो के साथ मिल कर&amp;nbsp;युद्ध&amp;nbsp;लडा था। भारतिय वर्ण/जाति प्रथा यह श्रम विभाजन पर आधारित थी। छुवा छुत, परदाप्रथा तो मध्ययुग की देन है।&lt;br /&gt;मेरा धर्म मनुस्मृती नही मानता क्योंकि यह भी मध्य युग की देन है। किसी वेद, पूराण, रामायण अथवा महाभारत मे इस ग्रंथ का उल्लेख नही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा धर्म श्राद्ध, मृत्युभोज का विरोधी है, यह सब कर्मकांड तो पंडो के द्वारा अपना पेट भरने के लिये धर्म से चिपकाये हुये है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा धर्म अपने या किसी और धर्म की निंदा करना नही है। आलोचना और निण्दा दोनो अलग अलग है।&lt;br /&gt;पाप करने के बाद उन्हे धोने के लिए गंगा स्नान या उपवास करना मेरा धर्म नही है, यह तो एक आडंबर है।&lt;br /&gt;निक्कर वाले जिसे धर्म कहते है वह मेरा नही है। मेरे धर्म को किसी रथयात्रा की जरूरत नही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत मे&lt;br /&gt;जीवन में मानव मूल्यों का एक महत्वपूर्ण स्थान है। मानव जीवन को उदारता, उच्चता और श्रेष्ठ आदर्शो के द्वारा उन्नत बनाने का लक्ष्य भी यही है। उदारता, सहिष्णुता समरसता, क्षमा, त्याग, मानवता आदि इसी लक्ष्य की धरोहर हैं। इन मुल्यो का पालन ही मेरा धर्म है । बहुत प्राचीन काल से अपनी प्रारम्भिक अवस्था में धार्मिक साहित्य के रूप में विकसित हुए वेद, पुराण, उपनिषद, गीता, कुरान, बाईबल, अवेस्ता, त्रिपिटिक आदि शास्त्र और ग्रन्थ अपने में धर्म के तत्वों को समेटे हुये हैं। इन सभी में एकत्व बोध को स्वीकार कर समभावना का विकास करना ही मेरा धर्म है। कोई भी धर्म किसी भी दूसरे धर्म से ऊंचा या नीचा नहीं है। सभी धर्मों की मंजिल व ध्येय एक ही मानव मात्र का कल्याण है और यही मेरा धर्म है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***********************************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: #71828a;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;h3 class="respond" id="comments" style="border-bottom-color: rgb(127, 127, 127); border-bottom-style: dotted; border-bottom-width: 1px; font: normal normal normal 1.5em/normal Georgia, 'Lucida Grande'; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 50px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px; text-align: left;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #333333; font-family: 'Trebuchet MS', 'Lucida Grande', Verdana, Arial, sans-serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 1.1em;"&gt;&lt;b&gt;18 टिप्पणीयां “मेरे&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #333333; font-size: medium;"&gt;जीवन&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #333333; font-family: 'Trebuchet MS', 'Lucida Grande', Verdana, Arial, sans-serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 1.1em;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;पर धर्म का प्रभाव” पर&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;div style="color: #333333; font-family: 'Lucida Grande', Verdana, Arial, sans-serif; font-size: 12px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बहुत सुन्दर!&lt;br /&gt;बहुत ही अच्छे ढंग से तुमने अपने विचार रखे।लेख थोड़ा लम्बा जरुर हो गया है लेकिन लेख की निरन्तरता कंही नही खोई। एक अच्छे लेख के लिये मेरी बधाई स्वीकार करो।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जीतू द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक के बाद एक सुन्दर लेख आ रहे हैं इस विषय पर. बहुत अच्छा लिखा हैं आपने.&lt;br /&gt;छुआ-छुत महाभारत काल में मोजुद थी, कर्ण को याद करे.&lt;br /&gt;आपके लेख से सनातन धर्म कि महानता उभर कर आती हैं, क्योंकि आप चाहे जिसमें विश्वास या अविश्वास करे आप सनातनी तो रहते ही हैं.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;sanjay Bengani द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशीष भाई, बहुत ही सुन्दर लेख लिखा है आपने अपने इस लेख में धर्म के मूलतत्वों को दर्शाया है, वरना अभी तक तो चिट्ठा जगत् में आडम्बरों और लोकाचार को ही धर्म का नाम दे कर प्रकारान्त से धर्म को कोसा जा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रतीक पाण्डे द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ कि शिव का प्रवेश द्रविड़ और आर्य संस्कृतियों के मिलन के बाद हुआ। वेदों में शिव को समर्पित कई सूक्त हैं। लाखों हिन्दुओं द्वारा हर रोज़ पढ़ा जाने वाला महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद और सामवेद, दोनों ही संहिताओं में मिलता है; जिसमें शिव की स्तुति की गयी है।&lt;br /&gt;साथ ही वैदिक संहिताओं से कहीं भी यह इंगित नहीं होता कि भारत में आर्य और द्रविड़ नामक दो समानान्तर सभ्यताएँ थीं या फिर आर्य भारत के बाहर से यहाँ पर आए। मेरा मानना है कि भारत में आर्यों के आगमन का सिद्धान्त अपेक्षाकृत बहुत ही अर्वाचीन है। इस बारे में आपके क्या विचार हैं?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रतीक पाण्डे द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रतिक,&lt;br /&gt;मै यह नही कह रहा कि आर्य बाहर से आये थे, यह मै भी नही मानता । लेकिन आर्य और द्रविड यह दोनो अलग सभ्यतायेँ जरूर थी जो बाद मे एक दूसरे मे विलीन हो गयी|&lt;br /&gt;यह इससे भी साबीत होता है कि सँस्कृत एक आर्य भाषा है जो अन्य द्रविड भाषाओ (तमिळ, मलयालम, कन्नड और तेलगु) से पूरी तरह अलग है। यह अंतर अन्य देवो मे भी है, जैसे कार्तिकेय (मुरूगण) जो दक्षिण भारत मे पूजे जाते है उत्तर मे नही(या कम)।&lt;br /&gt;वेदो मे शिव का जिक्र नही है, रूद्र का जिक्र है । रूद्र , शिव, शंकर एक ही देव के भिन्न नाम है ये एक विवाद का विषय हो सकता है ।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;आशीष श्रीवास्तव द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी धर्मों में ये सिखाया जाता है “एक और नेक बनो” भारत में ९० फीसद फसाद मज़हब के नाम पर होता है ये बात अलग है के लडवाता कोन है? आशीष भाई ने धर्म पर बहुत ही सुन्दर लेख लिखा है मगर हम ने अपने धर्मों के चारों तरफ दीवारें खडी करली हैं, हमें अपना धर्म छोड कर दूसरा कोई धर्म पसंद नहीं, अपने धर्म को कोई गाली दे तो हम उसकी ज़ुबान काट लेते हैं, सभी धर्म में ये सिखाया जाता है कि हम दूसरे धर्मों का भी एहतराम करें। पर ये सब खाली पीली बातें हैं। इस विशय पर चाहें तो बहुत कुछ लिख सकते हैं और कोई बडा भाशन भी दे सकते हैं, भारत में कहीं “हिन्दू मुसलिम भाई-भाई” के नारे? ये एक घटिया मज़ाक है। जहां तक मेरी बात हैः मुझे नहीं चाहिये ये धर्म जिसकी वजे से मुझे दूसरे धर्मों से नफरत हने लगती है, किया ज़रूरत है ऐसे मज़हब की जो हमारे दिलों में एक दूसरे के लिए नफरत पैदा करती है। चाहे तो हम सब को एक धर्म में होना चाहिए वरना नहीं चाहिए धर्म।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;SHUAIB द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशीष, बहुत सुन्दर! बहुत ही अच्छे ढंग से तुमने अपने विचार रखे। आपने अपने इस लेख में धर्म के मूलतत्वों को दर्शाया है, जो कि ज्ञान वर्धन करता है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Tarun द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अछ्छी तरह से संशोधन करके लिखा गया ये लेख बधाइ के पात्र है। आपके सारे विचारों से में सहमत नहीं हु फिर भी आप बधाइ के काबिल है क्योकि आपने अपने विचार बहुत सोच कर और होमवर्क करके व्यक्त किये है।&lt;br /&gt;आप चाहे तो अपने फाज़ल समय का उपयोग ओर धर्मो को समज़ने मे कर सकते है ताकी पता तो चले एक जेसे इंसानो की इतनी सारी मान्यता क्यो है और उसमे से कोइ सही है या नही। क्योकि यह सारे धर्मो के इजाद होने से पहले भी जीवन चलता था।&lt;br /&gt;फिर से, लेख अछ्छा लगा।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Ravi Kamdar द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्य और द्रविड़ सभ्यताएँ अलग-अलग थीं, मेरी समझ में यह मानने का कोई पुख़्ता आधार नहीं है। हाँलाकि भाषा के दृष्टिकोण से ऐसा ज़रूर कहा जा सकता है, लेकिन कई सारे तथ्य ऐसे भी हैं जिन्हें नज़रअन्दाज़ करना मुमक़िन नहीं है। जैसे कि द्राविड़ भाषाओं के मुत्ता (मोती या संस्कृत में मुक्ता) आदि अनेक ऐसे शब्द हैं, जिनका व्युत्पत्ति-मूलक अर्थ केवल संस्कृत के आधार पर ही स्पष्ट किया जा सकता है और मूल रूप से वे सभी पदार्थ दक्षिण के ग़ैर-संस्कृतभाषी क्षेत्रों में ही होते हैं। यह तर्क भी उतना ही मज़बूत है कि एक ही मुख्य जाति की दो उपशाखाएँ संस्कृत और द्राविड़ भाषाओं का इस्तेमाल करती थीं।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रतीक पाण्डे द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले तो एक बढ़िया लेख लिखने पर बधाई(वैसे तो आपके अधिकतर सारे ही लेख बढ़िया होते हैं)!! &amp;nbsp;पर एक बात तो बताओ भई, विषय है “मेरे जीवन पर धर्म का प्रभाव” परन्तु वह तो आपने बताया ही नहीं, बल्कि धर्म की अच्छी खासी व्याख्या कर डाली!! &amp;nbsp;और मज़े की बात यह है कि अभी तक जिसने भी लिखा है उसने धर्म की परिभाषा ही लिखी है, न कि विषय पर!!&lt;br /&gt;मुर्तीपूजा पर ये आरोप लगते है कि जो पत्थर का भगवान खुद की रक्षा नही कर सकता वह दूनिया की रक्षा कैसे करेगा&lt;br /&gt;यह तो मात्र करने के लिए कटाक्ष किया जाता है अन्यथा जो अल्पबुद्धि नहीं है उन्हें इस बात का ज्ञान होता है कि मूर्ति ईश्वर नहीं है, वरन् मात्र एक चिन्ह है जिसको ईश्वर स्वरूप मानकर अराधना की जाती है क्योंकि मनुष्य स्वभाव ऐसा है कि वे किसी चीज़ के बजाय शून्य में ध्यान केन्द्रित कर अराधना करना अत्यधिक कठिन होता है, इसलिए साधारण मनुष्य के अराधना करने के लिए मूर्तियों का प्रचलन बढ़ा। परन्तु समय के साथ साथ विचार और मान्यताएँ विकृत होती गई और लोग मूर्ति को ही ईश्वर मानने लगे। (कम से कम मेरा तो ऐसा ही सोचना है कि यही हुआ होगा)&lt;br /&gt;मण्दिरो मे जाकर घंटे बजाकर चिख चिख कर आरती करने वाला धर्म मेरा नही है।&lt;br /&gt;यह भी एक गलत प्रथा चल पड़ी कि घंटे आदि बजाते हुए ही पूजा-अर्चना होनी चाहिए। एक बार मैंने एक विद्वान से पूछा कि ऐसा क्यों कि हम शोर शराबे में अर्चना करते हैं, ईश्वर की अराधना तो शांत माहौल में होनी चाहिए, तो मुझे उन्होंने उत्तर दिया कि लोगों का मानना है कि ईश्वर सो रहा होता है इसलिए उसे जगाकर पूजा की जाती है!! तो मैंने उनसे फ़िर यह न पूछा कि यदि ईश्वर सो रहा है तो फ़िर सृष्टि की देखरेख क्या ईश्वर की सहायिका कर रही है!!&lt;br /&gt;मेरे कर्म यदि फल प्राप्ति के योग्य है तो वह मुझे मिलेगा ही, इसके लिये किसी पूजा, आराधना या आरती की आवश्यकता नही है।&lt;br /&gt;भाई, कर्म का फल तो मिलता ही है, चाहे मीठा मिले, खट्टा मिले या कड़वा मिले। आईन्स्टीन का नियम “every action has an equal and opposite reaction” सही है।&lt;br /&gt;छुवा छुत, परदाप्रथा तो मध्ययुग की देन है।&lt;br /&gt;जहाँ तक मुझे ज्ञात है, परदाप्रथा इस्लाम के साथ आई थी, उससे पहले यहाँ परदाप्रथा न थी।&lt;br /&gt;छुआ-छुत महाभारत काल में मोजुद थी, कर्ण को याद करे.&lt;br /&gt;संजय भाई, वह छूत-अछूत न था, वह तो ऊँची और नीची जाती का मसला था। प्राचीन भारत में कर्म के अनुसार चार जातियाँ थी। जो ज्ञान देता था तथा ईश्वर की साधना करता था, वह ब्राह्मण था, जो समाज की रक्षा करता था वह क्षत्रिय था, जो व्यापार करता था वह वैश्य था तथा जो बाकि अन्य कार्य करता था(जैसे रथ आदि चलाना, सफ़ाई आदि करना) वह शूद्र था। इनमें ब्राह्मण का दर्जा सबसे ऊँचा था, फ़िर क्षत्रिय, उसके बाद वैश्य तथा अन्त में शूद्र। इनके अलावा एक और समुदाय था, वह था दासों का। दास को कोई अधिकार नहीं होता था, वह मनुष्य न होकर एक वस्तु होता था, इसलिए उसका कोई धर्म भी नहीं होता था, उसका कर्म अपने स्वामी की प्रत्येक आज्ञा का पालन करना होता था।&lt;br /&gt;वेदो मे शिव का जिक्र नही है, रूद्र का जिक्र है । रूद्र , शिव, शंकर एक ही देव के भिन्न नाम है ये एक विवाद का विषय हो सकता है ।&lt;br /&gt;रूद्र एक परमशक्ति के रूप में माना गया है, आदि भी वही हैं और अन्त भी। कई अन्य हिन्दु ग्रन्थ आदि में यह पढ़ा है कि रूद्र ने विष्णु की उत्पत्ति की और विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा रचियता बनें जिनका कार्य सृष्टि की रचना करना है, विष्णु पालनहार हैं जो सृष्टि की देखभाल करते हैं और रूद्र संहारक हैं जो समय आने पर संहार करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारा दोष मनुस्मृति का है,&lt;br /&gt;मनुस्मृति ही सब भ्रष्ट लोकाचार की कारक है धर्म नहीं।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;युगल मेहरा द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“आईन्स्टीन का नियम ‘every action has an equal and opposite reaction’ सही है।”&lt;br /&gt;अमित भाई, यह आइन्स्टीन का नहीं न्यूटन का नियम है। और आपने जो शिव के बारे में ज़िक्र किया है, वह पौराणिक ही है। वेदों (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्) में उनका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। इसलिये उसे इतना प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रतीक पाण्डे द्वारा दिनांक अप्रैल 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी पूरा नहीं पढ़ा, बहुत लंबा है, गहरा भी। लगता है प्रिंट करके आफ़िस में बैठ कर आराम से पढ़ना पड़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रजनीश मंगला द्वारा दिनांक अप्रैल 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत खूब ।बढ़िया लिखा।बधाई।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अप्रैल 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमित भाई, यह आइन्स्टीन का नहीं न्यूटन का नियम है।&lt;br /&gt;ओह, गलती सुधारने के लिए धन्यवाद, ध्यान नहीं रहा!!&lt;br /&gt;और आपने जो शिव के बारे में ज़िक्र किया है, वह पौराणिक ही है। वेदों (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्) में उनका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। इसलिये उसे इतना प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता है।&lt;br /&gt;मैंने तो कहा ही नहीं भाई कि यह प्रामाणिक है, मैंने भी तो यही कहा कि पौराणिक हिन्दु कथाओं में यह कहा गया है। &amp;nbsp;वैसे भी, जहाँ तक मुझे ज्ञात है, न तो रामायण प्रामाणिक है और न ही महाभारत, और न ही महर्षि व्यास के अस्तित्व का प्रमाण है जो कि महाभारत काव्य के लेखक हैं।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक अप्रैल 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[…] अनुगूंज 18 के लिए इन्होने लिखा हैं : दुनियाँ मेरी नजर से (अमित) (30 मार्च) जोगलिखी (संजय बेंगाणी) दिनांक 1 अप्रैल दस्तक (सागर चन्द नाहर ) दिनांक 2 अप्रैल खाली-पीली (आशीष श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल नि� ल्ला चिंतन (तरूण) दिनांक 4 अप्रैल छींटे और बौछारें (रविशंकर श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल निनाद गाथा (अभिनव) दिनांक 5 अप्रैल मेरा पन्ना (जितेन्द्र चौधरी) दिनांक 5 अप्रैल बीच-बजार (परग कुमार मण्डले) दिनांक 5 अप्रैल उन्मुक्त (उन्मुक्त) दिनांक 9 अप्रैल झरोखा (शालिनी नारंग) दिनांक 10 अप्रैल उडन तश्तरी (समीरलाल) दिनांक 11 अप्रैल फ़ुरसतिया (अनूप शुक्ला) दिनांक 12 अप्रैल मन की बात (प्रेमलता पाण्डे) दिनांक 12 अप्रैल (ई-स्वामी) दिनांक 14 अप्रैल मेरा चिट्� ा (आशीष) दिनांक 14 अप्रैल इधर उधर की (रमण ) दिनांक 14 अप्रैल […]&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोगलिखी » चिट्� ाकारों द्वारा लगभग 18,000 शब्द लिखे गये द्वारा दिनांक अप्रैल 16th, 2006&lt;br /&gt;[…] अनुगूंज 18 के लिए इन्होने लिखा हैं : दुनियाँ मेरी नजर से (अमित) (30 मार्च) जोगलिखी (संजय बेंगाणी) दिनांक 1 अप्रैल दस्तक (सागर चन्द नाहर ) दिनांक 2 अप्रैल खाली-पीली (आशीष श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल नि� ल्ला चिंतन (तरूण) दिनांक 4 अप्रैल छींटे और बौछारें (रविशंकर श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल निनाद गाथा (अभिनव) दिनांक 5 अप्रैल मेरा पन्ना (जितेन्द्र चौधरी) दिनांक 5 अप्रैल बीच-बजार (परग कुमार मण्डले) दिनांक 5 अप्रैल उन्मुक्त (उन्मुक्त) दिनांक 9 अप्रैल झरोखा (शालिनी नारंग) दिनांक 10 अप्रैल उडन तश्तरी (समीरलाल) दिनांक 11 अप्रैल फ़ुरसतिया (अनूप शुक्ला) दिनांक 12 अप्रैल मन की बात (प्रेमलता पाण्डे) दिनांक 12 अप्रैल (ई-स्वामी) दिनांक 14 अप्रैल मेरा चिट्� ा (आशीष) दिनांक 14 अप्रैल इधर उधर की (रमण ) दिनांक 14 अप्रैल […]&lt;br /&gt;&lt;b&gt;चिट् ाकारों द्वारा लगभग 18,000 शब्द लिखे गये at अक्षरग्राम द्वारा दिनांक अप्रैल 17th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[…] सागर चन्द नाहर कुछ युं दस्तक देते हैं धर्म के द्वार पर� “धर्म का मतलब हैं “मानवता“, और हमारे देश और समाज की उन्नती”. साथ ही उन लोगो के प्रति असंतोष व्यक्त करते हैं जिन्हे हर बात में नुक्स निकालने की आदत होती है ओर अपने बै-सिर पैर के तर्कों से कभी धर्म तो कभी समाज को बदनाम करते रहते है, उन्हे अपना जैन धर्म उसके सिद्धान्तों ‘सत्य ओर अहिंसा’ की वजह से बहुत पसन्द है, � लेकिन आडम्बर उन्हे पसन्द नहीं, हाँ परिवार कि खुशी के लिए वे धार्मिक अनुष्� ानों में हिस्सा जरूर लेते हैं. चलिये सागर चन्दजी आप अपने तर्को के साथ धर्म को बदनाम करने वालो से लोहा लिजीये, हम आपके साथ हैं. � आशीष श्रीवास्तव साहब ने तो काफी विस्तार से लिखा हैं और आवश्यक हुआ वहां काका कलेल्कर, विवेकानन्द, कृष्ण आदी को उधृत किया हैं, गीता के श्लोक भी रखे हैं. लेख कि शुरूआत हिन्दू धर्म का नामांकरण कैसे हुआ� से करते हुए इस सनातन धर्म के आधार वेद ग्रंथो का अर्थ भी समझाते हैं � “भिन्न भिन्न कालों में भिन्न भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष”. सनातन धर्म कि विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं “सनातन धर्म पर यह आरोप लगता है कि इसमे ना जाने कितने देवी देवता है। यही तो मेरे धर्म की महानता है हर किसी को अपने आप मे आत्मसात कर लेने की।“ बावजुद इसके कि वे स्वीकरते हैं “मण्दिरो मे जाकर घंटे बजाकर चिख चिख कर आरती करने वाला धर्म मेरा नही है।“ तब उनका धर्म कौनसा हैं? इसका भी सुन्दर जवाब हैं उनके पास, पढिये “कोई भी धर्म किसी भी दूसरे धर्म से ऊंचा या नीचा नहीं है। सभी धर्मों की मंजिल व ध्येय एक ही मानव मात्र का कल्याण है और यही मेरा धर्म है।“ यानी मानवता ही आपका धर्म हैं. � […]&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अवलोकन : अनुगूजँ 18- मेरे जीवन में धर्म का महत्व at अक्षरग्राम द्वारा दिनांक अप्रैल 24th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-1974088976411791722?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/1974088976411791722/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/04/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;हाल ही मे मै एक शादी मे गया था। मेरे बहन के देवर की शादी थी। काफी सारे लोगो से मिला और नये परिचय हुये, नये दोस्त बने। शादी ब्याह के मामले मे मै थोडा बदकिस्मत&amp;nbsp;हूं। मैने काफी कम&amp;nbsp;शादियों&amp;nbsp;मे अपनी&amp;nbsp;उपस्थिति&amp;nbsp;दर्ज की है। जब मै कालेज मे हुआ करता था तब&amp;nbsp;शादी-ब्याह के मौसम मे मेरी परिक्षाये हुआ करती थी, आज जब परिक्षाओं से मुक्ति मिली हुयी है तब शादी ब्याह की तारीखो के आसपास मेरे प्रोजेक्ट खत्म होने की तारीखे हुआ करती हैं। शायद यह भी एक कारण है कि मै अब तक क्वारां हूं !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह&amp;nbsp;स्थिति&amp;nbsp;हमेशा नही रही है। मेरे बचपन और किशोरावस्था मे काफी सारी शादियों मे भाग लिया है। शादी ब्याह, वह भी गांवो मे। मेरा बचपन गावों मे बीता है। और गावों मे शादी ब्याह की बात ही कुछ और होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडके की शादी हो या लडकी की, सारा गांव भाग लेता है। हर शादी गांव के लडके की या गांव की बेटी की शादी होती है। ये परंपरा आज भी भारत के गांवो मे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब गांवो मे शादी ब्याह का मौसम शूरू होता था, तब चौपाल पर की बाते कुछ ऐसी होती थी। “सोमवार को अलां की बेटी की शादी है, बुधवार को फलां के&amp;nbsp;भतीजे&amp;nbsp;की शादी है, शनीवार को अला के घर शादी है….” कुल मिलाकर किसी को अपने घर मे किसी की शादी की तारीख तय करने से पहले ये देखना होता था कि उस दिन गांव मे&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;और शादी ना हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शादी से महिनो पहले तैयारीयां शुरू हो जाती है। शादी के सप्ताह भर पहले से नाते रिस्तेदार जमा होना शूरू हो जाते थे। गांव मे एक हलचल सी मची रहती थी। कभी कभी एक घर की शादी मे आये रिश्तेदारो को हम लोग गलतफहमी मे दूसरे के घर छोड आते थे। अक्सर ये भी होता था एक शादी के लिये आये ये लोग २-३ शादीयों मे उपस्थिति लगाने के बाद ही अपने गांव वापिस जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक आम&amp;nbsp;भारतीय&amp;nbsp;गांव एक&amp;nbsp;बड़ा&amp;nbsp;परिवार होता है। गांव मे हर&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;हर किसी का चाचा-भतीजा, मामा-भान्जा, दादा-नाती, रिश्ते मे कुछ ना कुछ होता है। जब भी किसी के घर किसी की शादी तय होती थी, जब अपनी अपनी जिम्मेदारीयां बांट लेते थे। किसी भी के घर शादी हो किसी भी जाति का हो, गरीब हो या अमीर&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;भेदभाव नही होता था। नाउ हर घर मे न्योता ले कर जाता था। एक पंरपरा मैने देखी थी कि यदि शादी किसी गरीब के घर मे हो रही हो तो न्योता देने वाले नाउ के हाथो हर घर से “सीधा” भेजा जाता था। ये “सीधा” का मतलब होता था थोडा चावल , थोडा आटा, थोडी दाल, बाकि तेल मसाले और कुछ पैसे। यानी की शादी का सारा खर्च सारे गांव मे बट गया। बेचारा नाउ बोरा लादे घुमते रहता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बारी आती थी शादी के कामो की, चिन्ता किस बात की कुम्हार बर्तन रख जायेगा, नाउ न्योता दे आयेगा, कहार पानी का जिम्मा उठा लेगा, खाना बनाने के लिये महाराज है ही। और रहे बाकि काम “लफंगा पार्टी“(नौजवान लडके यानी हम लोग) किस दिन काम आयेगी।किसी को कुछ भी कहने की जरूरत नही , समय पर सभी के सभी हाजिर रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन शादियो मे मैने तीन महत्वपूर्ण रिवाज होते थे। मडप,&amp;nbsp;सगाई(फलदान) और लग्न और ये तीन दिनो मे होते थे। अब शायद सब कुछ एक ही दिन मे निपटा देते है। पहले दिन खेतो से या गांव के किनारे के जंगल से मंडप के लिये बल्ली काट के लायी जायेगी। सारे गांव मे न्योता जायेगा। जब सभी जमा हो जायेंगे, तब हंसी मजाक रीती रिवाजो के साथ मडंप गडेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुसरे दिन&amp;nbsp;सगाई&amp;nbsp;के लिये&amp;nbsp;बड़े&amp;nbsp;बुढो की बारात जायेगी या आयेगी। मेरी आजतक समझ नही समझ मे आया “लफंगा पार्टी” को इससे दूर क्यों रखा जाता था।&amp;nbsp;तीसरे&amp;nbsp;दिन होता था लग्न। इसमे हम लोगो को भाग लेने दिया जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि लडके की शादी हो तो चिन्ता नही होती थी, तैयार होकर बारात मे चल दो। बारात बाकायदा सजी धजी बैलगाडीयो से जाती थी। दुल्हन के गांव पहुचो, जनवासे मे ठहरो। तैयार हो कर चल दो आवारागर्दी के लिये। सारे गांव का कम से कम एक चक्कर तो लगाया ही जायेगा। इतने मे “लफंगा पार्टी” को ढुढते हुये&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;ना&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;आ जायेगा और डांटते हुये ले जायेगा। जनवासे से बारात चलेगी, पेट्रोमेक्स की रोशनी मे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बारात मे हम लोग सामने नाचते हुये हंगामा करते हुये सामने चलेंगे, बिच मे दूल्हा “घोडे” पर, घोडा ना मिला तो बैलगाडी मे ही, कुछ नही तो साइकिल ही सही, पिछे सारे बडे बुढे। सारा गांव रास्ते के दोनो ओर जमा होकर बारात देखता था। हम लोगो का नाचना, धिंगाने इन दर्शको की खूबसूरती के अनुसार कम ज्यादा होते रहता था। जैसे ही दूल्हन का घर पास आता था, मंडप के सामने पहूंचने के ठीक पहले कोइ ना कोई दूल्हे को&amp;nbsp;खींच&amp;nbsp;लाता था। उसे भी हम लोग नचा देते थे। ये हर बार का किस्सा था। बारात चलने से पहले गांव के बडे बुढे हम लोगो को समझाते थे कि दूल्हे को नचाना नही, हम हां हां जरूर करते लेकिन बारात के हंगामे मे सब कुछ भूल जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडे बुढे जैसे तैसे दूल्हे को&amp;nbsp;खींच&amp;nbsp;खांच कर अलग करते और मडंप मे ले जाते। मंत्रोच्चार के साथ लग्न होता, फेरे होते। बस हम लोगो का काम खत्म। खाओ पियो और खिसको। दूल्हन और बारात बिदा करा लाने का काम बडे बुढो का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि लडकी की शादी हो तब बारात के स्वागत से लेकर उनके ठहरने, नहाने धोना, खाना-पीना&amp;nbsp;सब कुछ सम्हाल लेती थी ये “लफंगा पार्टी”। मजाल है किसी भी&amp;nbsp;व्यवस्था&amp;nbsp;मे कोइ खामी नजर आ जाये। और यही कारण था, हम लोगो की सारी शैतानी , हंगामो को डाटंफटकार के बाद नजर अंदाज कर दिया जाता था। लेकिन ये “लफंगा पार्टी” ये भी नजर रखती थी कि बाराती अपनी सीमा मे रहें। जरूरत पढने पर हाथ पैर&amp;nbsp;जोड़ने&amp;nbsp;से लेकर हाथ पैर&amp;nbsp;तोड़ने&amp;nbsp;के लिये भी तैयार !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार गांव मे एक लडकी की शादी थी, दूर के गांव से बारात आयी थी। सारा का सारा&amp;nbsp;इंतज़ाम&amp;nbsp;“लफंगा पार्टी” ने सम्हाला हुआ था। सब कुछ तरिके से चल रहा था। अचानक एक&amp;nbsp;लड़की&amp;nbsp;हम लोगो के पास आयी, उसने हम लोगो से शिकायत की कि किसी बाराती ने उसके साथ&amp;nbsp;छेड़छाड़&amp;nbsp;की है। “लफंगा पार्टी” का दिमाग सरक गया, बस हाथ पैर&amp;nbsp;जोड़ने&amp;nbsp;वाले ,हाथ पैर&amp;nbsp;तोड़ने&amp;nbsp;पर आ गये। उस बाराती को घेर लिया। गांव के&amp;nbsp;बड़े&amp;nbsp;बुढे बीच मे आ गये और हम लोगो को समझाया। बाराती ने माफी मांगी, लेकिन हम लोगो का दिमाग अभी भी सरका हुआ था। शादी हुयी, और सारे बाराती खा पिकर सोने चल दिये। हम लोगो ने भी खाना खाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह बारात विदा होने का समय आया। ये क्या? दूल्हे की बैलगाडी गायब ! बाराती लोग दूल्हे की बैलगाडी ढुंढ रहे थे। सारा गांव छान मारा। बैलगाडी का नामोनिशान नही था। सब परेशान। मेरे गांववालों को शक हो रहा था कि ये सब कारनामा “लफंगा पार्टी” का है, और रात का बदला है। एक दो घंटे तक तक लोग परेशान रहे। लफंगा पार्टी भी बैलगाडी खोज मे लगी हुयी थी। अचानक&amp;nbsp;किसी&amp;nbsp;की नजर गांव के बाहर बस स्थानक के सामने बनी(इकलौती) पक्की छत वाली इमारत पर गयी। बैलगाडी शान से छ्त पर खडी थी। लोगो की समझ नही आ रहा था कि हंसे या रोयें। बारातीयो ने बडी बडी रस्सीया मगंवायी। दस लोग इमारत पर चढे, बैलगाडी को रस्सीयो से बांधा, दस आदमी निचे खडे हुये और धीरे धीरे आधे घंटे की मेहनत के बाद बैलगाडी निचे उतारी।&lt;br /&gt;गांव मे आज तक एक रहस्य है बैलगाडी छत पर कैसे पहुंची !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;3 टिप्पणीयां “मेरे गांव की शादीयां” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;बहुत अच्चा विवरन दिया है आप ने ग़ान्व के विवाह का!&lt;br /&gt;ळेकिन लगता नहि है कि आपकि उमर इतनि ज्यादा है कि आपने बैल गाडियो वाले विवाह देखे होन्गे!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Ajay द्वारा दिनांक मार्च 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अच्छी यादेँ हैँ.अब समय की माँग है कि किसी गाडी पर चढ जाओ.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मार्च 4th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;बाकी सब तो ठीक है, पर आशीष भाई, हम लोगों को तो बता दो कि बैलगाड़ी छत पर चढ़ाई कैसे??&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक मार्च 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;बैलगाड़ी छत पर पहुचाना&amp;nbsp;बहुत आसान था!&amp;nbsp;दो लफंगे छत पर!&amp;nbsp;दोनो चक्के निकालो। छत पर पहुंचाओ। उसके बाद&amp;nbsp;बैलगाड़ी &amp;nbsp;को खड़ी कर दो, उपर से दो खीचेंगे, निचे से चार उठा कर धकेलेंगे। अब छत पर चक्को को वापिस जोड़ दो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;आशीष द्वारा दिनांक मार्च 5th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-6745613485101957667?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/6745613485101957667/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/03/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/6745613485101957667'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/6745613485101957667'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/03/blog-post.html' title='मेरे गांव की शादियाँ'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-5224537931976393917</id><published>2006-02-28T23:16:00.000-08:00</published><updated>2011-10-23T23:24:27.309-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><title type='text'>आस्तिकता / नास्तिकता बनाम विज्ञान</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;हाल ही मे मै स्टीफन हाकिंस की “&lt;b&gt;ए ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम&lt;/b&gt;” पढ रहा था। ये&amp;nbsp;पुस्तक&amp;nbsp;मै इसके पहले भी कई बार पढ चुका हूं, लेकिन कुछ दिनो बाद फिर से पढने की इच्छा हो जाती है। मुझे ऐसे भी भौतिकी बचपन से पसंद रहा है, जैसे जैसे आगे पढता गया , इस विषय मे रूची बढती गयी। लेकिन इस पर अढंगा तब लगा जब मैने संगणक विज्ञान लेकर अभियांत्रिकी मे प्रवेश लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे संगणक विज्ञान के पाठयक्रम मे भी भौतिकी के काफी सारे विषय थे, जैसे प्रकाश विज्ञान(ओप्टीकस),क्वांटम मेकेनिक्स, विद्युत और चुंबकिय क्षेत्र(इलेक्ट्रिक एण्ड मैगनेटीक फिल्ड) वगैरह। लेकिन अंतर यह था कि ये सभी विषय अनुप्रयोग(एप्लाईड) थे ना कि सैधांतिक (थ्योराटिकल)। और जो चिजे छुट गयी थी वे थी, कास्मोलाजी, खगोल विज्ञान (आस्ट्रोनामी), अणु-परमाणु सरंचना(पार्टीकल फिजीक्स), पदार्थ के गुण(प्रोपेर्टीस आफ मैटर)। ये सभी छुटे हुये विषय हमेशा चुनौती देते लगते रहे है। जब भी समय मिलता है मै इस पर सामग्री ढुंढ कर पढता रहता हूं। इस विषय पर विस्तार से फिर कभी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पूस्तक मे भगवान(गाड/सुपर नैचुरल पावर) का जिक्र कई बार आया है। इस&amp;nbsp;पुस्तक&amp;nbsp;के मे जहां कुछ जगह भगवान के आस्तिव पर प्रश्नचिन्ह उठाये गये है, वही कुछ जगह अनसुलझे रहस्यो के लिये भगवान का सहारा भी लिया गया है।&lt;br /&gt;हाकिंस कहते है&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“बिना भगवान के सिद्धांत के ब्रम्हांड के आरंभ के बारे चर्चा करना मुश्किल है। मेरा ब्रम्हांड के आरंभ पर किया गया शोध कार्य विज्ञान और धर्म की सीमा पर है, लेकिन मै विज्ञान की तरफ रहने का प्रयास करता रहा हूं। यह संभव है कि भगवान के कार्यकलाप विज्ञान के नियमो मे बाण्धे नही जा सकते, लेकिन इस विषय मे हमे अपनी व्यक्तिगत विश्वास को मानना चाहिये।”&lt;/blockquote&gt;लेकिन यह कुछ ऐसा नही लगता कि जब मानव मस्तिष्क कीसी भी सिद्धांत या घटना के रहस्य को नही समझ पाता तब वह धर्म , चमत्कार और भगवान के नाम का सहारा लेता है।&lt;br /&gt;कुछ् ऐसा ही हाकिसं इन पक्तियो मे कहने की कोशीश कर रहे है।&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“यदि सिर्फ एक ही एकिकृत सिद्धांत(क्वांटम भौतीकी और गुरूत्वाकर्षन सिद्धांत का एकीकरण) है, पर वह एक नियमो और समीकरणो का समुच्च्य है। लेकिन वह क्या है जो समीकरणो को जिवन देता है और एक ब्रम्हांड को व्याख्या के प्रस्तुत करता है ? “&lt;/blockquote&gt;भगवान और भौतिकी के नियमो के रिश्तो से तो&amp;nbsp;आइंस्टाइन&amp;nbsp;भी नही बच पाये थे। जब उन्हे “&lt;b&gt;थ्योरी आफ अनसर्टीनीटी&lt;/b&gt;” हजम नही हो पायी थी तब उन्होने कहा था ” &lt;b&gt;भगवान पांसे नही खेलता”(God doesn’t play dice)"&lt;/b&gt;। ये बात और है कि उन्हे नोबेल&amp;nbsp;पुरस्कार&amp;nbsp;भी इसी क्षेत्र( क्वांटम मेकेनिक्स का मूल थ्योरी आफ अनसर्टीनीटी है) मे किये गये कार्य के लिये मिला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाकिंस के मन की एक दुविधा का वर्णन करती यह पंक्ति&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“जब से ब्रम्हांड आ आरंभ हुआ है,हम उसके निर्माता की कल्पना कर सकते है। लेकिन यदि ब्रम्हांड स्वयंमनिर्मित हो, जिसकी कोइ सीमा नाहो, उसका आरंभ और अंत नही हो तब भगवान के लिये जगह कहां होगी ?”&lt;/blockquote&gt;यह पूस्तक खत्म होती है इस वाक्य से&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“यदि हम एक पूर्ण सिद्धांत(ग्रैण्ड युनिफाइड थ्योरी) की खोज कर पाये तब हम भगवान के मन को समझ पायेंगे।”&lt;/blockquote&gt;ब्रम्हांड की रचना के लिये महाविस्फोट (बीग बैंग) का सिद्धांत सर्वमान्य है। इस के अनुसार ब्रम्हाण्ड की उतपत्ती एक बिन्दु के महाविस्फोट से हुयी। समय की शूरूवात भी इसी समय से हुयी थी। जब कहीं भी कुछ भी नही था तब समय कैसे हो सकता है ? जब कुछ नही था तब क्या था ? भगवान कहां थे ? ऐसा क्या था कि भगवान ने ब्रम्हाण्ड को बनाया ? या ऐसा क्या हुवा जिससे ब्रम्हांड बना ? और भगवान को किसने बनाया ?&lt;br /&gt;मै आस्तिक हूं या नास्तिक नही जानता। लेकिन पूजा, अर्चना, आरती जैसी चिजो से दूर ही रहता हूं। मै खुद हो कर मन्दीर भी नही जाता, यदि जाता हूं तो पर्यटन के उद्देश्य से या किसी ने साथ चलने कह दिया तो उसके साथ हो लेता हूं।&lt;br /&gt;शाम को जब मै अपना पर्स जब भगवान की मुर्ती के सामने फेंक देता हू, तब अन्ना हमेशा टोकता है&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“दादा भगवान के सामने चमडे की चिज मत रखो”।&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;मेरा जवाब होता है&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“मत पी गालीब शराब मस्जीद मे बैठकर,&lt;br /&gt;तो मुझे वह जगह बता दे जहां&amp;nbsp;ख़ुदा&amp;nbsp;ना हो।”&lt;/blockquote&gt;सूबह जब मै सो कर उठता हूं तब मै भजन नही सुनता जो भी गाने की सीडी सामने मिल जाये बजाता हू। अन्ना नहा धोकर जब आता है और भगवान की&amp;nbsp;मूर्ति&amp;nbsp;से सामने प्रार्थना करता है, सबसे पहले वो संगीत को धीमा करता है। तब मेरी प्रतिक्रिया होती है,&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;"तेरा भगवान बहरा हो गया है क्या ? तेरे भगवान के पास आज भी&amp;nbsp;पुरानी&amp;nbsp;टेक्नालाजी है जो वायरलेस के जमाने मे भी तुझे प्रार्थना करनी पड रही है।"&lt;/blockquote&gt;जब मन्दीर मे घडियाल बजते है यहां मस्जिद मे अजान होती है तब मेरी प्रतिक्रिया यही होती है&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“भगवान तो&amp;nbsp;मन्दिर&amp;nbsp;के पहले घंटे की आवाज सुन कर ही भाग खडे होते है।”&lt;/blockquote&gt;क्या भगवान का आस्तिव है ? यदि है तो क्यो इतनी असमानता है ? भगवान ने तो समानतावादी होना चाहिये ना !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;2 टिप्पणीयां “आस्तिकता / नास्तिकता बनाम विज्ञान” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;भई, भगवान है कि नहीं, यह तो एक अंतहीन विवाद का मुद्दा है। मानने वाले मानते हैं, नहीं मानने वाले नहीं मानते(जैसे मैं नहीं मानता)। रही बात समानता की, तो अब यदि एक सच्चे भक्त की दृष्टि से देखा जाए तो वह यही कहेगा कि असमानता ईश्वर में नहीं वरन् मनुष्य में है। उसने तो मात्र मनुष्य को बनाया, धर्म इत्यादि मनुष्य ने बना डाले। अब अकबर को ही ले लो(हाँ भई, मुग़लेआज़म अकबर)। उसने अपना एक नया धर्म दीन-ऐ-ईलाही शुरू कर दिया था, पर वह उसके मरने के बाद ही समाप्त हो गया, भई हिन्दु धर्म और इस्लाम आदि जैसे बड़े धर्मों के साथ कैसे कम्पीट कर सकता था!!&lt;br /&gt;तो मूल सत्य यही है, कि धर्म मनुष्य ने बनाए, अब यदि मनुष्य स्वयं समान नहीं है तो धर्म कैसे समान हो सकते हैं क्योंकि हर धर्म उसके बनाने वाले की विचारधारा आदि का प्रतिबिम्ब है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक मार्च 1st, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Kaafi achchha post hai. Visay ke upar ant-hin (endless) bahas ho sakti hai. Waise main na dharm na bhautiki kaa koi bade jaankaar hone ka daavaa nahin karunga. Lekin main aapko Swami Vivekanand ke Sanatan dharm (jo aaj hindu dharm se parichit hai) ke utpati par likhe koi bhi achche kitab ko padhne ka salah dunga. Jahan tak brahmand ke utpati kas sawaal hai, mujhe to Stephen Hawkins aur Vivekanand ke vicharaon main kayi saari samaanataayen nazar aati hain. Khas kar is baat ka ki shristi ka na koi aadi hai aur naa ant - bas shristi sankuchit (shrinking) and vistrit (expand or explode) hoti rahati hai. Aur ek baar dohra doon ki ye mere vichaar hai - meri samajh bilkul galat bhi ko sakati hai&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Raag द्वारा दिनांक मार्च 2nd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-5224537931976393917?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/5224537931976393917/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/02/blog-post_28.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/5224537931976393917'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/5224537931976393917'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/02/blog-post_28.html' title='आस्तिकता / नास्तिकता बनाम विज्ञान'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-302883969939341761</id><published>2006-02-14T13:38:00.000-08:00</published><updated>2011-10-23T20:02:51.914-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><title type='text'>वेलेंटाईन डे और हम</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;आज&amp;nbsp;सुबह&amp;nbsp;देर से उठा, ७:३० के करीब। अपने कमरे से बाहर आया, देखा हमेशा&amp;nbsp;सुबह&amp;nbsp;रोनी सूरत बनाये रखने वाला अन्ना&amp;nbsp;गुनगुना&amp;nbsp;रहा था और मेरा डिब्बा(CD Player) बज रहा था। मै चकराया ये क्या हो रहा है।&amp;nbsp;सुबह&amp;nbsp;सुबह&amp;nbsp;गाने तो मै सूनता हुं, ये आज डिब्बा किसने शुरू कर दिया ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे कमरे की दिनचर्या कुछ ऐसी है, सबसे पहले मै उठ जाता हुं, नहा धो कर तैयार होने के बाद डिब्बा चालु करता हुं। आवाज इतनी तेज होती है कि नन्दी और अन्ना दोनो भुनभुनाते हुये उठ जाते हैं। किसी दिन मै देर से जागा तो बाकि दोनो भी देर से ही जागते है। लेकिन आज ये क्या …।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने अन्ना को आवाज लगायी&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;” क्या हुवा बे, इतनी जल्दी कैसे उठ गया, और डिब्बा भी चालू कर दिया ?”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;” दादा आज १४ फरवरी है ना !?”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;” तो इसमे क्या है कल १३ फरवरी थी कल १५ फरवरी होगी।”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;” दादा, इसलिये आपको पिछले २९ साल मे&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;नही मिली।”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;” क्यो&amp;nbsp;सुबह&amp;nbsp;सुबह&amp;nbsp;पिटने के काम कर रहा है, सीधे सीधे बोल चक्कर क्या है ?”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;” दादा&amp;nbsp;सुबह&amp;nbsp;सुबह&amp;nbsp;सूमन का फोन आया था।”&amp;nbsp;&lt;/blockquote&gt;सूमन अन्ना की मंगेतर है।&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;” तो इसमे नया क्या है ?”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;” दादा आज वेलेन्टाइन डे है ना!”&lt;/blockquote&gt;हमारा ट्युबलाईट जला। इतने मे नन्दी अपनी आंखे मलता हुआ आया। मुझे रात के कपडो मे देखा और अन्ना को तैयार देखा। उसको दिल का दौरा पडते पडते बचा।&lt;br /&gt;नन्दी महाराज बोले&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“आज सूरज पश्चिम से उगा क्या ?”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;” अरे नही यार,आज सूमन ने इसे सूबह फोन कर वेलेण्टाईन डे की बधाई दे दी इसलिये ये नमूना इतना उछल रहा है।”&lt;/blockquote&gt;नन्दी महाराज के जख्म हरे हो गये। उनका एकतरफा प्रेम कुछ दिनो पहले चकनाचूर हो गया था।&lt;br /&gt;नन्दी महाराज दहाडे&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;” अन्ना, साले अंगरेज, तूझे शरम नही आ रही है”&lt;/blockquote&gt;मै और अन्ना दोनो चकराये इसे अचानक क्या हो गया।&lt;br /&gt;अन्ना बोला&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&amp;nbsp;“अबे क्या हो गया तुझे सूबह सूबह ?”&lt;/blockquote&gt;नन्दी :&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“तु साले&amp;nbsp;पश्चिमी&amp;nbsp;संस्कृति&amp;nbsp;का पालन कर रहा है, वेलेंटाइन डे मना रहा है, तुझे शर्म आना चाहिये। तेरे जैसे लोगो के कारण हमारी&amp;nbsp;संस्कृति&amp;nbsp;पतन के रास्ते जा रही है।जब तक तेरे जैसे पश्चिमी गुलाम रहेंगे देश का भला नही हो सकता।”&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;मुझे याद था कि ये नन्दी खुद कुछ दिनो पहले तक वेलेन्टाईन डे के दिन एक कन्या को प्रेम प्रस्ताव देने की योजना बना रहा था। लेकिन जब वो कन्या उनके हाथ से निकल गयी नन्दी महाशय आडवाणी की तरह बदल गये थे। अपने बयानो से ठीक वैसे पल्टी मारी थी जैसे आडवाणी ने जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष करार दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नन्दी महाराज मेरी तरफ मुडकर बोले&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“आप बोलो मै गलत कह रहा हूं तो ?”&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;मैने बर्र के छत्ते को छेडना उचित नही समझा। वैसे भी अन्ना का समर्थन करने का&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;मतलब था नही। ऐसे भी चेन्नई मे हमारी कोई ऐसी कन्या थी नही कि हम वेलेण्टाईन डे मनाते। हम भी बजरंगदल मे शामिल हो गये। मेरा अनुभव रहा है कि बजरंग दल और शिवसेना के नाम इस दिन हुडदंग मचाने वाले वो कालेजवीर होते है जिन्हे कोई कन्या भाव नही देती।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;संत श्री १००८ श्री आशीष कुमार जी महाराज उवाच ;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“वेलेण्टाईन डे हमारी संस्कृती नही है। ये&amp;nbsp;भारतीय&amp;nbsp;संस्कृति&amp;nbsp;पर पाश्चात्य प्रभाव है। प्रेम की&amp;nbsp;अभिव्यक्ति&amp;nbsp;के लिये हमारा अपना वसंत उत्सव है, मदनोत्सव है। हमे अपने त्योहार मनाना चाहिये ना कि पश्चिमी।”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;” आप तो तोगडिया की भाषा बोल रहे हो, आपका बस चले तो आप महिलाओ को परदे के पिछे बंद कर दे!”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;” जी नही हम तोगडिया की भाषा नही कह रहे हैं। भारतिय संस्कृती ने प्रेम का विरोध कभी नही कीया। श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम तो विवाह बाह्य प्रेम था, लेकिन समाज उसे सम्मान से देखता है।&amp;nbsp;भारतीय&amp;nbsp;संस्कृती मे तो गंधर्व विवाह एक मान्यता प्राप्त विवाह पध्दति है। मदनोत्सव कुछ और नही वेलेंटाईन डे है। मदनोत्सव का प्रारम्भ पौराणिक काल में हुआ था । उसे कामसूत्र में ‘सुवसंतक’ कहा गया है । मूल रुप में यह ॠतु का उत्सव ‘ॠतूत्सव’ था, जो वसन्त ॠतु के आगमन पर होता था । ॠतु की अगवानी में पुरुष और स्त्रियाँ गीत-नृत्य करते थे । पुराणों ने ‘काम’ की पूजा को महत्त्व दिया, अतएव यह ‘मदनोत्सव’ हो गया । घर में ‘काम’ की पूजा आम के और टेसू के फूल से की जाती थी और बाहर आयु, रंग एवलं जाति के भेद-भाव को भुलाकर एक-दूसरे से प्रेम दर्शाते और मिलते-जुलते थे ।”&lt;/blockquote&gt;नन्दी महाराज उवाच&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;” इ़सका मतलब तो ये हुवा कि वेलेण्टाइन डे को प्रेम प्रस्ताव ना दे कर मदनोत्सव को देना चाहिये। लेकिन ये तो गलत है, अश्लिलता का प्रदर्शन है।”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;“प्रेम की स्वस्थ अभिव्यक्ति गलत नही हो सकती। समाज मे हम जितनी वर्जनाये रखेंगे, उल्लघंन उतना ज्यादा होगा। भारतिय संस्कृती मे धर्म और काम को समान माना गया है। खजुराहो और कोणार्क इसका उदाहरण है। हमारे यहां तो गणिका को भी समाज मे सम्मान्जनक स्थान दिया गया है, आम्रपाली इसका उदाहरण है”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;” आप वेलेंटाईन डे का विरोध करते है या समर्थन ?”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;“मै वेलेन्टाईन डे का विरोध नही करता हूं, लेकिन मै वेलेन्टाईन डे मदनोत्सव के मुल्य पर नही चाहता। मै तो १ जनवरी को नया साल भी नही मनाना चाहता, मेरा नया साल तो १ चैत्र से शूरू होता है। मै किसी पाश्चात्य परंपरा और त्योहार का विरोध नही करता बशर्ते वह भारतिय परंपरा और संस्कृती की किमत पर न हो”&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;2 टिप्पणीयां “वेलेंटाईन डे और हम” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;ड्यूड,&lt;br /&gt;यह सब कमाने-खाने का धंधा है और कुछ नहीं। हम में से कितने लोग यह जानते हैं कि सन्त वैलेंटाइन कौन थे और यह दिन क्यों मनाया जाता है? पर अधिकतर यही जानते हैं कि आज के दिन उपहार, फूल इत्यादि दिये जाते हैं। तो अन्त में यह डे किसका हुआ - हॉलमार्क या आर्चीज़ गैलरीज़ का &amp;nbsp;&lt;br /&gt;और आशीष भाई, कार्यालय दूर हुआ तो क्या हुआ, बाइक के और भी कई उपयोग हैं - वैलेंटाइन डे पर मोटरबाइक पर तो पीछे बिठा कर सब घुमाते हैं, आप आगे बिठा के घुमा सकते हो…&lt;br /&gt;&lt;b&gt;निशांत&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;निशांत द्वारा दिनांक फरवरी 14th, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने प्रेम को एक दिन के लिये मत रख बालक।साल भर प्रेमगीत गा।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक फरवरी 16th, 2006&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-302883969939341761?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/302883969939341761/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/02/blog-post_14.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/302883969939341761'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/302883969939341761'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/02/blog-post_14.html' title='वेलेंटाईन डे और हम'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-7193847137152818311</id><published>2006-02-08T13:35:00.000-08:00</published><updated>2011-10-23T19:35:59.526-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्य-व्यंग्य'/><title type='text'>कल शाम कुछ फोन आये।</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;फोन न १&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;“एक समस्या है यार”&lt;br /&gt;“पता चल गयी !”&lt;br /&gt;“कैसे”&lt;br /&gt;“तेरे फोन से ही।”&lt;br /&gt;“सुन”&lt;br /&gt;“सुना”&lt;br /&gt;“तेरे आसपास कोइ है तो नही ?”&lt;br /&gt;“तुझे कोइ आसपास चाहिये क्या ?”&lt;br /&gt;“नही”&lt;br /&gt;‘’तब नही है, बोल″&lt;br /&gt;“यार पर्सनल समस्या है, किसी को बताना मत”&lt;br /&gt;“नही बताता यार,सभी को यही समस्या है। काम की बात कर”&lt;br /&gt;“मै टूर से आया हूं और भूखा हूं।”&lt;br /&gt;“तो किसी होटल फोन करना ! ”&lt;br /&gt;“नही यार, ये बोल रही है ।।”&lt;br /&gt;“ये यानी कौन।”&lt;br /&gt;“बीबी, और कौन”&lt;br /&gt;“किसकी ?”&lt;br /&gt;“मेरी और किसकी बीबी मेरे से बात करेगी।”&lt;br /&gt;“ठीक है , काम की बात बोल″&lt;br /&gt;“ये लो, विषय मै बदल रहा हू कि तू !”&lt;br /&gt;“ठीक है ठीक है आगे बढ”&lt;br /&gt;“वो मायके जाने की बात कर रही है”&lt;br /&gt;“अरे बधाई हो, साले तू इसे समस्या बोल रहा है ?”&lt;br /&gt;“अरे मै अकेला अनाथ हो जाउंगा ना !”&lt;br /&gt;“कितने दिनो के लिये जा रही है ?”&lt;br /&gt;“१५ दिनो के लिये”&lt;br /&gt;“तो भाई मै क्या कर सकता हूं”&lt;br /&gt;“वो रात मे नही रहेगी ! क्या करू ?”&lt;br /&gt;“अबे क्या मतलब है तेरा मै ऐसे वैसे कोई काम नही करता!”&lt;br /&gt;“तू मेरी सुनेगा क्या कि अपनी हांके जायेगा ?”&lt;br /&gt;“झगडा किस बात पर हुआ ?”&lt;br /&gt;“झगडा किस बात का, मै तो अभी टूर से वापिस आया !”&lt;br /&gt;“तो वो जा क्यों रही है ?”&lt;br /&gt;“मै जब टूर पर गया था तब उसकी मां यहा साथ मे थी। अब उसकी मां उसे लेकर जा रही है”&lt;br /&gt;“अब तेरी बीवी के पिताजी भी टूर पर गये है क्या ?”&lt;br /&gt;“वो कभी वापिस नही आनेवाले टूर पर गये है !”&lt;br /&gt;“ओह″&lt;br /&gt;“मेरी बीवी को रोकना है”&lt;br /&gt;“सास को चार दिन बाद जाने के लिये बोलना , उसमे क्या है”&lt;br /&gt;“नही, मेरी सास को जाना चाहिये”&lt;br /&gt;“नही रे बाप मै ऐसा कोई काम नही करता। तू किसी भाई को पकड”&lt;br /&gt;“अबे हमेशा हमेशा के लिये नही।। अब तूझे कैसे बतांउ, तेरी शादी नही हुयी, तू कैसे समझेगा।”&lt;br /&gt;“जाने दे यार तू बोल।, मुद्दा ये है कि तेरी बीवी ने घर पर रहना चाहिये और सास ने वापिस जाना चाहिये। ठीक ?”&lt;br /&gt;“ठीक। बोल क्या कर सकते है।”&lt;br /&gt;“अच्छा कब निकलने वाले है ?”&lt;br /&gt;“दोपहर मे खाने के बाद”&lt;br /&gt;“यानी की चार घन्टे है।”&lt;br /&gt;“लेकिन सास घर पर है”&lt;br /&gt;“अबे मै प्लान के लिये बोल रहा हूं”&lt;br /&gt;“प्लान क्या है ?”&lt;br /&gt;“तेरे घर मे काम वाली बाई है क्या ?”&lt;br /&gt;“वो छूट्टी पर है इसलिये तो बीवी मायके जा रही है”&lt;br /&gt;“ठीक है, मै सब ठीक करता हू। सास जायेगी लेकिन तेरी बीवी तेरे बोलने पर भी नही जायेगी।”&lt;br /&gt;“थैंक्यु वेरी मच”&lt;br /&gt;“सूखा सूखा नही चलेगा !”&lt;br /&gt;“ठीक है यार”&lt;br /&gt;“तूने बीवी को नही जाने के लिये मनाया या नही”&lt;br /&gt;“वो असफल होने के बाद ही तो मैने तूझे फोन किया”&lt;br /&gt;“तू अपनी बीवी को बोल कि ठीक है जाओ मै सम्हाल लेता हूं। १५-२० दिन रह कर आना”&lt;br /&gt;“ओके लेकिन तू क्या करने वाला है ?”&lt;br /&gt;“तू आम खा पेड मत गीन”&lt;br /&gt;********************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;फोन न. २&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;“शांताबाई”&lt;br /&gt;“नमस्कार साहब, आ जाउ क्या ?”&lt;br /&gt;“नही, एक पता देता हू वहां जा”&lt;br /&gt;“साहब, ठीक है पता दे दो”&lt;br /&gt;“पता बाद मे पहले क्या बोलना है वो सून”&lt;br /&gt;“बोलो साहब”&lt;br /&gt;“वहां जाकर बोलना कि आपकी पूरानीवाली काम वाली ने भेजा है, और कहा है कि अगले १५ दिन काम करने को बोला है।”&lt;br /&gt;“साहब मै ऐसे लोअर डाउन काम नही करती”&lt;br /&gt;“काम नही करना है, सिर्फ ये वाक्य बोलना है”&lt;br /&gt;“ठीक है”&lt;br /&gt;“एक बात और ये बात साहब से मत करना, मालकिन से करना। साहब थोडा सर्किट है”&lt;br /&gt;“ठीक है साहब”&lt;br /&gt;“और हा साहब थोडा मार्डन है, कपडे वपडे अच्छे पहन कर जाना।”&lt;br /&gt;“साहब उसने किचन दिखा दिया तो ?”&lt;br /&gt;“अरे नही, तू मेमसाहब को नही जानती।”&lt;br /&gt;*********************************************&lt;br /&gt;&lt;b&gt;फोन न. ३&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;“मर गया यार !”&lt;br /&gt;“क्या हुआ ? बीवी मायके जा रही है क्या ?”&lt;br /&gt;“नही जा रही लेकिन तूने किया क्या?”&lt;br /&gt;*********************************************&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-7193847137152818311?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/7193847137152818311/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/02/blog-post_08.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/7193847137152818311'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/7193847137152818311'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/02/blog-post_08.html' title='कल शाम कुछ फोन आये।'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-7685053928373031687</id><published>2006-02-03T13:24:00.000-08:00</published><updated>2011-10-23T19:31:20.396-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कन्या पुराण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>कल रात सब्जी जल गयी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://pratyaksha.blogspot.com/"&gt;प्रत्याक्षाजी &lt;/a&gt;ने हमारे&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #0000ee;"&gt;&lt;u&gt;पुराने&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://khalipili.blogspot.com/2006/02/blog-post.html"&gt;&amp;nbsp;जख्म हरे&lt;/a&gt; कर दिये। हमने अपनी आधी अधूरी ही सही; दास्तान ए इश्क सुना दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल हमारी इस कहानी पर काफी सारी&amp;nbsp;टिप्पणियां&amp;nbsp;मिली। आगे लिखने का अनुरोध किया गया।&lt;br /&gt;कल का सारा दिन पूरानी हसीन यादो मे डूबा रहा। कहते है जब हमे हिचकी आती है तो उसका मतलब होता है कि कोई आपको याद कर रहा है। तब तो शायद उसे सारा दिन बिना रूके हिचकी आती रही होगी।&lt;br /&gt;शाम को घर गये। खाना बनाना&amp;nbsp;शुरू&amp;nbsp;किया।&amp;nbsp;रोटियाँ&amp;nbsp;सेकीं। और सब्जी बनाने की तैयारीया शुरू की।&lt;br /&gt;जब मै किसी की याद मे खाना बनाता हुं, तब खाना काफी अच्छा बनता है, लोग उंगलिया चाटते हुये खाते है। ऐसा मेरा नही अन्ना का मानना है।&lt;br /&gt;अब सब्जी बनाना शूरू किया, इतने मे अन्ना आ गया। अब उससे बाते चलती रही और खाना बनता रहा। वो भी मेरा चिठ्ठा कभी कभार पढ लेता है। और आज उसने पढा था।&lt;br /&gt;अन्ना उवाच :&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“दादा आपने ये कहानी तो कभी बतायी नही !”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;&amp;nbsp;” इसमे कुछ बताने लायक हो तो बताउ ना”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;&amp;nbsp;“नही दादा, आपकी वो&amp;nbsp;कहानियां&amp;nbsp;जिसमे आप कहते थे कि यदि आपको किसी की प्रेमकथा पता चल जाये वो कुछ ही दिन मे टूट जाता है. इसकी&amp;nbsp;शुरूआत&amp;nbsp;तो आपने ही कर दी थी”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;“ऐसा ही कुछ है…”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;” ये आपने पहले क्यों नही बताया ?”&lt;/blockquote&gt;हम शुरू हो गये… खो गये पूरानी यादो मे…….हम कहते रहे … अन्ना सुनता रहा………&lt;br /&gt;अचानक कुछ जलने की बू आयी, पता चला सब्जी जल गयी थी &amp;nbsp;. काफी रात हो चुकी थी. तय हुआ की अब इसी से काम चलाया जाये.&lt;br /&gt;खाने बैठे , सब्जी जलने के बाद भी स्वादिष्ट थी. आखीर कैसे नही होती…….&lt;br /&gt;सब्जी नही हमारा दिल जो जला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;3 टिप्पणीयां “कल रात सब्जी जल गयी” पर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;शादी कर लो . फिर जली हुई सब्ज़ियाँ नहीं खानी पडेगी.&lt;br /&gt;मतलब अकेले ! फिर दुकेले खानी पडेंगी. क्या पता बाद में भी जली हुई स्वादिष्ट सब्ज़ी बनाने का सौभाग्य तुम्हें ही मिलता रहे &amp;nbsp;)&lt;br /&gt;प्रत्यक्षा&lt;br /&gt;&lt;b&gt;pratyaksha द्वारा दिनांक फरवरी 3rd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हा हा हा, वाह, पुरानी यादें ताज़ा करने बैठे और सब्ज़ी जला बैठे, यार एक लड़के से ऐसी आशा नहीं थी मुझे, अमूमन यह काम लड़कियाँ ही करती हैं!! &amp;nbsp;वैसे यह बात सही है, कभी कभी थोड़ी जली सब्ज़ी या दाल अधिक स्वादिष्ट लगती है!! और प्रत्यक्षा जी का कहना भी ठीक है, ब्याह कर लो, फ़िर अकेले जली सब्ज़ी नहीं खानी पड़ेगी!!&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Amit द्वारा दिनांक फरवरी 3rd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढ के तो यही लगता है कि आज भी दुकेले ही खा रहे थै. आपका शिकार हलाल हो चुका है.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;Tarun द्वारा दिनांक फरवरी 3rd, 2006&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/11860813-7685053928373031687?l=khalipili.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khalipili.blogspot.com/feeds/7685053928373031687/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/02/blog-post_03.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/7685053928373031687'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/11860813/posts/default/7685053928373031687'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khalipili.blogspot.com/2006/02/blog-post_03.html' title='कल रात सब्जी जल गयी'/><author><name>आशीष श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02400609284791502799</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://2.bp.blogspot.com/-0XDBoSAscoI/TmstRH1cmkI/AAAAAAAABnk/29mCnD2bTyQ/s220/profile.jpeg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-11860813.post-7774226642209981037</id><published>2006-02-01T13:03:00.000-08:00</published><updated>2011-10-23T19:31:59.534-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कन्या पुराण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>आदर्श प्रेमिका के गुण ?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रस्तावना&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://pratyaksha.blogspot.com/"&gt;प्रत्यक्षा जी&lt;/a&gt; ने हमे प्रेम विषय का पंडित समझ लपेट दिया और इस पर कह दिया कि “&lt;b&gt;आदर्श&amp;nbsp;प्रेमिका&amp;nbsp;के गुण&lt;/b&gt;” बतायें। शायद उन्होने कबीर की तरह सोचा होगा “&lt;b&gt;ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित होय&lt;/b&gt;”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम तो इस प्रेम की जालिम , बेरहम दुनिया मे इतनी&amp;nbsp;ठोकर&amp;nbsp;खा चुके है कि हमारे दिल नुमा प्रेम ग्रंथ के हर पन्ने से सिर्फ आह ही आती है। दिल के इतने टुकडे हो चुके है जितने जनता दल के भी नही हुये होंगे। फिर भी हमने हिम्मत नही हारी है और लगे हुये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;हसीं हजारो भी हो खडे, मगर उसी पर नजर पढे&lt;br /&gt;हो जुल्फ गालो से खेलती, के जैसे दिन रात से लढे&lt;br /&gt;अदाओ मे बहार हो। निगाहो पर खुमार हो&lt;br /&gt;कबूल मेरा प्यार हो तो क्या बात है&lt;br /&gt;जरूरत है जरूरत है जरूरत है&lt;br /&gt;झटक के गेसूं जहां चलेतो साथ मे आसमा चले&lt;br /&gt;लिपट के कितने भी पांव से ये पूछते कहां चले&lt;br /&gt;प्यार से जो काम ले, हंस के सलाम ले&lt;br /&gt;वो हाथ मेरा थाम ले तो क्या बात है&lt;/blockquote&gt;अब आदर्श&amp;nbsp;प्रेमिका&amp;nbsp;के गुण पर लिखना है तो क्यो ना अपने पहले प्यार पर फिर से एक नजर डाली जाये। अब आप ही देखें की हमारी प्रेमिका मे क्या क्या गुण है(थे)!&lt;br /&gt;प्रस्तुत है हमारा शोध प्रबंध “&lt;b&gt;आदर्श प्रेमिका के गुण&lt;/b&gt;”।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वो पहला प्यार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;याद है जय साबून का विज्ञापन&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;पहला प्यार&lt;br /&gt;लाये जिवन मे बहार&lt;br /&gt;पहला प्यार&lt;/blockquote&gt;शायद कुछ ऐसा ही था हमारा पहला प्यार। प्यार ! पता नही वह प्यार था या कुछ और !&amp;nbsp;कब हुआ, कैसे हुआ, कब परवान चढा… पता ही नही चला।&lt;br /&gt;जब दोस्त&amp;nbsp;छेड़ते&amp;nbsp;तो हंस के कहते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“तुम भी यार बात का बंतगड बना देते हो वो मेरी एक अच्छी दोस्त है बस और कुछ नही।”&lt;/blockquote&gt;वो मेरी हमउम्र थी, शायद १-२ साल छोटी। दुबली पतली सी , सीधी सादी सी। । मेरे परिवार का उन लोगो के घर आना जाना था, वो लोग भी गाहे बगाहे मेरे घर आते जाते थे। वह चार बहनो और दो भाईयो मे से पांचवे क्रमांक पर थी, उससे बडी तीन बहने ,एक बडा भाई और एक छोटा भाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कद उसका नाटा था, मेरे बाजु मे खडी हो तो कन्धे से निचे ही ! इसका मुझे एक फायदा था। मै उसके कान खिंच सकता था, वो नही।&lt;br /&gt;शायद मै उससे पहली बार कक्षा ५ वी या ६ वी मे मिला। वैसे तो बचपन मे मै थोडा शर्मीला (विशेषतया लडकियो से) था लेकिन उससे बाते करने मे कभी कोई&amp;nbsp;झिझक&amp;nbsp;नही थी, ना उसे मुझसे बाते करने मे कोई&amp;nbsp;झिझक&amp;nbsp;होती थी। हम दोनो दिल खोल के बतियाते थे। वैसे वह कम बोलती थी, बोलते मै रहता था और वो सुनते रहती थी। मेरी हर बेसीर पैर की कहानीयो, गप्पो के लिये मुझे उससे बढिया श्रोता आज तक नही मिला। कभी कभार ईद के चांद की तरह वो भी शूरू हो जाती, तब मै भी सून लेता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके लंबे काले कमर तक के बाल मुझे अच्छे लगते थे। वह सिर्फ एक चोटी करती थी जो उसकी पिठ पर लहराते रहती थी। मुझे उसकी चोटी खिचने मे मजा आता था, यहां तक की कोई उसकी चोटी खिंचे वो बीना मुडे बोल पढती थी&lt;b&gt; “आशीष के बच्चे ! तुमसे कितनी बार कहा है मेरी चोटी मत खिंचा करो।&lt;/b&gt;”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे तो मुझे उसे तंग करने मे , उसके साथ रहने मे मजा आता था, उसे भी मेरे साथ रहने मे, मुझे तंग करने मे मजा आता था। नोंक झोंक चलते रहती थी। एक बार हम लोग (मै, मेरी बहने वह और उसकी बहने) कहीं जा रहे थे। वाहन के नाम पर हमलोगो के पास ४ साइकिले थी और हम लोग कुल ६। मेरी दोनो बहने एक साइकिल पर, उसकी दोनो बहने एक एक साइकिल पर थे। मेरे पास मेरी “&lt;b&gt;साबू&lt;/b&gt;” साइकिल थी। अब वो किस की साइकिल पर बैठे ? मैने अपनी साइकिल पर बिठाने के लिये मना कर दिया। मेरे मना करने की देर थी, कि वो अड गयी, अब तो मै इसी की साइकिल मे बैठुंगी। अब दोनो अपनी अपनी जिद पर अड गये। सब परेशान, ना मै पिछे हट्ने तैयार ना वो। अंत मे मै झुका और कहा&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“ठीक है बैठ मेरी साइकिल पर, रास्ते मे साइकिल से नही गिराया तो कहना।”&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;“ठीक है,ठीक है”&lt;/blockquote&gt;मै थोडे गुस्से मे साइकिल तेज च
